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आखिर क्यों बढ़ रहा है नक्सलियों का दुस्साहस ?

नक्सली
फाइल फोटो

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में नक्सलियों द्वारा आईईडी विस्फोट कर पुलिस के त्वरित कार्रवाई दस्ते पर हमला कर 15 जवानों की हत्या कर देना इस बात की ओर इशारा करता है कि नक्सलियों का दुस्साहस बरकरार है और वे धता बताकर सुरक्षाकर्मियों पर हमला कर सकते हैं। इतना ही नहीं इस घटना के अगले दिन भी नक्सलियों का दुस्साहस जारी रहा। उन्होंने जिले की कई जगहों पर बैनर लगाकर संदेश ये दिया कि विकास का काम स्थानीय बाशिंदों के लिए नहीं बल्कि कुछ अमीर लोगों के फायदे के लिए है। बैनर में ठेकेदारों को पुल तथा सड़क निर्माण का काम बंद करने की भी चेतावनी दी गई है। नक्सलियों की ऐसी हरकतों को पूरी गंभीरता से लेने और ठोस कार्रवाई करने की जरूरत है। आखिर क्यों तमाम कोशिशों के बावजूद देश के तमाम जिलों में नक्सली सिर उठा ले रहे हैं और हिंसा का खूनी खेल खेल पाने में सफल हो जा रहे हैं ? अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब बीते 09 अप्रैल को बीजेपी के विधायक भीमा मंडावी और तीन पुलिसकर्मी आईईडी विस्फोट में शहीद हो गए थे। इससे पहले भी ऐसी घटनाएं हुईं हैं।





लिहाजा यह बात बेहद गंभीरतापूर्वक समझनी होगी और समझकर इस ओर चलना होगा कि आखिर एक लंबे समय बाद भी नक्सली समस्या का समाधान पूरी तरह सिरे क्यों नहीं चढ़ पा रहा है? बार-बार नक्सली एक विशेष रणनीति के तहत कदम उठाते हैं और हिंसा को अंजाम देते हैं। एक आंकड़े के मुताबिक बीते पांच वर्षों में करीब तीन सौ जवान नक्सलियों का निशाना बन चुके हैं। क्या यह उचित है ? गढ़चिरौली की इस घटना ने एक तरह से पुलवामा आतंकी हमले की याद दिला दी जिसमें अपने कर्तव्य का पालन कर रहे सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे। आखिर रोज-रोज की इन घटनाओं के बीच खुफिया तंत्र को बेहद कारगर व मजबूत क्यों नहीं किया जा रहा ? क्यों नक्सली मौके का फायदा उठाकर सुरक्षाबलों को निशाना बना रहे हैं और अपने मंसूबों में कामयाब हो रहे हैं।

राजनीतिक दलों के नेताओं को भी यह बात गांठ बांध लेनी होगी कि नक्सलवाद और आतंकवाद पर राजनीति एक तरह से देश की सुरक्षा से ही खतरा है। केंद्र व राज्य सरकारों को मिलकर नक्सलवाद के खिलाफ एक बार फिर आक्रामक रणनीति बनानी होगी और ईमानदारी से उस पर चलना होगा। तभी इस समस्या से निजात पाया जा सकेगा। जब यह बात स्पष्ट है कि नक्सली अपने-अपने इलाकों में पुल-सड़क बनाने, संचार माध्यमों के खंभे आदि लगाने के दुश्मन हैं तो उनसे सख्ती से निपटना जरूरी है। नक्सली तो यह भी नहीं चाहते कि स्थानीय नागरिक वोट डालने जाएं। धमकियों और दहशत के बावजूद आम मतदाता बूथ तक जाता है और वोट डालता है। नक्सल प्रभावित इलाकों में इस बार मतदान का प्रतिशत बढ़ा है। 2014 के मुकाबले इस बार मतदान का प्रतिशत ज्यादा है। उदाहरण के तौर पर झारखंड के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में इस बार 07 प्रतिशत मतदान अधिक हुआ। पिछली बार लोहारदगा, पलामू और चतरा में 57 प्रतिशत मतदान हुआ था। लोकसभा की ये तीनों सीटें नक्सल प्रभावित 06 जिलों में फैली हैं। यह समझना होगा कि जब आम नागरिक लोकतंत्र पर निष्ठा रख आगे बढ़ रहा है तो भला इन नक्सलियों को देश के संविधान व नियम-कानूनों के दायरे में क्यों नहीं लाया जा सकता ?

इस मसले पर जरूरत सख्ती व सहानुभूति दोनों की है। लोकसभा चुनाव संपन्न होने के बाद केंद्र की नयी सरकार को इस ओर विशेष ध्यान देने की जरूरत है ताकि नक्सली नासूर का खात्मा किया जा सके। याद रहे कि सहानुभूति व हमदर्दी का अभिप्राय नक्सलियों को देश के कानून व संविधान के दायरे में बातचीत के लिए आमंत्रण देने तथा मुख्यधारा में जोड़ने से होना चाहिए। इसके बाद भी अगर कुछ नक्सली हिंसा का रास्ता अपनाते हैं, बर्बरता करते हैं तो उनका दमन होना चाहिए। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सरकार की नीतियों से नक्सलियों का प्रभाव कम हुआ है। फिर भी उन्हें समझाया जाना चाहिए कि बातचीत का रास्ता ही सर्वश्रेष्ठ रास्ता होता है न कि हाथ में बंदूक पकड़कर घने जंगलों में घुस जाने का रास्ता। देश में हो रहे आम चुनाव के इस दौर में राजनीतिक दलों को यह बात नक्सलियों को समझाने की जरूरत है।

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