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Veterans Day Special: पूर्व सैनिक क्यों असंतुष्ट है सरकार से ?

सेना के पूर्व सैनिक
पूर्व सैनिक (सौजन्य- गूगल)

एक समुदाय के रूप में पूर्व सैनिक वर्तमान केंद्र सरकार से दिन प्रतिदिन अधिक से अधिक मायूस होते जा रहे हैं। 2013 में रेवाड़ी (हरियाणा) में मोदी द्वारा किए गए वायदों के बाद 2014 में जब इस सरकार ने सत्ता संभाली तो पूर्व सैनिकों को उम्मीद बंधी कि यह सशस्त्र बलों के न्यायसंगत बकायों को बहाल करेगी। सरकार ने धीरे धीरे और लगातार न केवल अपने वायदों को तोड़ा बल्कि सशस्त्र बलों के दर्जे को गिराने, उनके मनोबल को तोड़ने, उसके संस्थानों में अतिक्रमण करने तथा उनके उचित बकायों को अस्वीकार करने की पुरानी सरकारों की प्रक्रिया को भी बरकरार रखा।





सबसे अधिक प्रभावित पूर्व सैनिक समुदाय हुआ है जो हमेशा सशस्त्र बलों के कुछ संस्थानों पर निर्भर रहता है। उनके संस्थानों में अतिक्रमण करने या उनकी वर्तमान क्षमताओं को कमतर करने के द्वारा, सरकार ने पूर्व सैनिक समुदाय को नाराज कर दिया है।

ये संस्थान हैं सशस्त्र बल ट्रिब्यूनल (एएफटी), सैन्य अस्पताल और कैंटीन सेवा विभाग (सीएसडी)। इनमें से प्रत्येक संस्थान में सरकार द्वारा अतिक्रमण किया जा रहा है और उन्हें वास्तव में पूर्व सैनिक समुदाय के लिए लगभग निरर्थक बनाया जा रहा है।

एएफटी का निर्माण संसद के एक अधिनियम द्वारा किया गया था और इसमें प्रशासनिक सदस्य के रूप में एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ सैन्य अधिकारी के साथ साथ उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में पीठ शामिल हैं। इस संयोजन के पीछे वजह यह थी कि प्रशासनिक सदस्य विशेष रूप से सेना से संबंधित मामले में पीठ की अध्यक्षता करने वाले न्यायाधीश की सहायता करता। पेंशन, विकलांगता पेंशन एवं गलत दंडात्मक कार्रवाई से संबंधित मामलों में पूर्व सैनिक एएफटी की शरण लेते थे। एएफटी द्वारा सुनाए गए अधिकतर फैसले रक्षा मंत्रालय के खिलाफ होते थे जो मनमाना तरीके से बर्ताव करता और उनके न्यायोचित दावों को भी स्वीकार करने से मना कर देता।

इसके बाद सरकार ने मनमाने तरीके से इस अधिनियम में संशोधन करने और किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त करने की कोशिश की जिसे वह एक प्रशासनिक सदस्य के रूप में उचित समझता। ऐसी कोई भी कार्रवाई उस मूल भावना के ही खिलाफ जाती जो एएफटी के गठन के पीछे का उद्वेश्य था। सर्वोच्च न्यायालय, जो एएफटी के फैसलों के खिलाफ अपील करने का एकमात्र प्राधिकारी है, ने सरकार की इस मंशा को विफल कर दिया। तब सरकार ने दूसरा कदम उठाया, जो एएफटी के सदस्यों की नियुक्ति रोकने से संबंधित था। ज्यादातर पीठ गैर-कार्यशील हैं और जो कुछ पीठ कार्यशील हैं, वे भी इस वर्ष के अंत तक व्यर्थ हो जाएंगे जिससे पूर्व सैनिकों के लिए एक दरवाजा बंद हो जाएगा।

सशस्त्र बल ही ऐसा एकमात्र संगठन है जिसे अपने सदस्यों की सहायता करने के लिए किसी एसोसिएशन का हक प्राप्त नहीं है। इसीलिए उन्हें सहायता के लिए एएफटी पर निर्भर रहने की आवश्यकता पड़ती है। यह संभव है कि एएफटी की प्रभावोत्पादकता को कम करने का फैसला उसके द्वारा लगातार किए गए रक्षा मंत्रालय विरोधी फैसलों के कारण लिए गए हों। हालांकि हाल की एक बैठक में केंद्रीय रक्षा मंत्री ने विकलांगता पेंशनों पर निर्णयों को शीर्ष न्यायालय में चुनौती देने को रोकने की घोषणा की, लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव आगे आने वाले महीनों में ही दिखेगा।

हालांकि सैन्य अस्पतालों में ठसाठस भीड़ रहती है लेकिन पूर्व सैनिक समुदाय के लिए वे चिकित्सकीय सहायता के लिए अंतिम सहारा थे। चूंकि ये अस्पताल पूर्व सैनिकों की बढ़ती संख्या के बोझ को बर्दाश्त नहीं कर सके, इसलिए पूर्व सैनिक क्षतिपूर्ति स्वास्थ्य स्कीम (ईसीएचएस) नामक एक नई स्कीम शुरू की गई और अधिकतर शहरों में पूर्व सैनिकों को संबद्ध अस्पतालों में रेफर किया गया। सरकार की योजना अब बेहद भीड़भाड़ वाले इन अस्पतालों को उनके लिए खोलने की है जिन्हें वह ‘आयुष्मान भारत‘ जिसे ‘मोदीकेयर‘ चिकित्सा बीमा योजना के नाम से भी जाना जाता है, के तहत भरती करती है।

क्षमता में कमी के आधार पर सरकार द्वारा इस सुविधा को शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारियों को उपलब्ध कराने से मना करने का फैसला असंगत था और सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल इसे निरस्त कर दिया। विडंबना यह है कि सरकार वैसे लोगों को इस सुविधा से मना करने का प्रयास कर रही थी जो वर्दीधारी हैं जबकि दूसरे लोगों को यह सुविधा प्रदान कर रही थी क्यांेकि उन्हें निजी अस्पतालों ने सहायता देने से अस्वीकार कर दिया था। वह बस यही सुनिश्चित कर रही थी कि सेना का एक और संस्थान पूर्व सैनिकों की पहुंच से दूर हो जाए।

उनके लिए सीएसडी रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुएं खरीदने का एक स्रोत था जो सेना के गौरवशाली जवान थे और देश की सेवा के लिए अपने जान की कुर्बानी देने के लिए तैयार थे। सरकार ने सशस्त्र बलों को हकदार सदस्यों, नागरिकों जिन्हें रक्षा व्यय से भुगतान किया जाता था, के समान ही स्वीकार करने को विवश किया और उन्हें भी वैसी भी विशिष्ट सुविधाएं देने की कोशिश की जैसी सैनिकों को मिलती थी।

इसे भी स्वीकार कर लिया गया लेकिन इससे संबंधित हाल के उसके दो कदमों ने सरकार के प्रति पूर्व सैनिकों की नाराजगी को बढ़ा दिया है। पहला कदम सेना मुख्यालयों को महंगी वस्तुओं की खरीद के लिए नागरिक समुदायों के लिए खोलना था, जिनका भुगतान रक्षा व्यय से होता था। इससे उनके लिए इनकी उपलब्धता कम हो जाती जिनके लिए यह सेवा आरंभ की गई थी। दूसरा कदम संस्थान के प्रमुख के रूप में एक नौकरशाह की नियुक्ति का प्रयास था जिससे सेना के एक और संस्थान को उसी से वंचित कर दिया जाता।

सशस्त्र बल ऐसा एकमात्र समुदा है जो बहुत कम उम्र में ही सेवानिवृत्त हो जाता है जब सैनिक के सामने उसकी व्यक्तिगत जिम्मेदारियां सबसे ज्यादा होती हैं। यह एकमात्र ऐसी सेवा है जो खुद अपने वेतन के लिए भुगतान नहीं करती, सबसे अधिक परेशानी सैनिकों को ही होती है क्योंकि उसके पास नौकरी का और कोई दूसरा विकल्प नहीं रह जाता। सरकार द्वारा अपनी नीति में निर्धारित जितने भी कोटा हैं, उनकी सबसे ज्यादा अनदेखी दूसरे कैरियर के रूप में सैनिकों को भर्ती करने में उसके अपने ही संस्थानों एवं संगठनों द्वारा की जाती है। यही मुख्य वजह है कि ओआरओपी सैनिकों के लिए अनिवार्य है। यह आंदोलन अपने 1300वें दिन में प्रवेश कर चुका है।

पूर्व सैनिक समुदाय ने 2014  में बड़ी उम्मीद से नरेंद्र मोदी को वोट दिया था। बहरहाल, जैसे जैसे समय गुजरता गया, उनकी उम्मीदें खत्म होने लगीं। मौजूदा सरकार न केवल अपने वायदों से मुकर गई है बल्कि वह वर्तमान सैन्य संस्थानों को कमतर बनाने की कोशिश भी कर रही है जिनपर पूर्व सैनिक समुदाय निर्भर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अहसास होना चाहिए कि उनकी सरकार ने उस समुदाय को नुकसान पहुंचाया है जिसने उनकी निष्ठा की कसम खाई थी। इसे सुधारने एवं उनका विश्वास फिर से हासिल करने का अभी भी समय है। इस समुदाय की अनदेखी बहुत भारी भी पड़ सकती है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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