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सेना प्रमुख को क्यों गलत समझा जा रहा है?

बिपिन रावत

राजनीतिक नेतृत्व और लुटियंस दिल्ली में रहने वाले सेना के आलोचकों की हमेशा से यह ख्वाहिश रही है कि सेना के प्रमुख मूक दर्शक बने रहें, कभी न बोलें और संभव हो तो कभी दिखाई भी न पड़ें। पहले के अधिकांश सेना प्रमुख मीडिया से बचते ही रहे हैं और इसी धारणा को मानते रहे हैं। बहरहाल अब चीजें बदलनी शुरू हो गई हैं। सेना प्रमुखों ने अपने विचारों को प्रकट करना शुरू कर दिया है। कभी कभी तो बिल्कुल निर्भीक तरीके से और यही वजह है कि राजनेता और सेना के आलोचक अब बेचैन होने लगे हैं।





सेना प्रमुख ने राफेल सौदे के बारे में खुल कर अपनी बातें रखीं जिससे कांग्रेस के खेमे में दहशत फैल गई। सेना प्रमुख ने वही कहा जिसकी उनसे उम्मीद की जाती थी, न कि वह जो राजनेता उनसे सुनना चाहते थे। उन्होंने तथ्यों को साझा किया जबकि राजनेताओं और उनकी समर्थक मीडिया ने उसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया। इसकी वजह से कांग्रेस के नेताओं ने उन्हें हताशा में झूठ बोलने वाला करार दिया और उनसे गुजारिश की कि वह बहस में पड़ने से बचें।

सभी सेनाओं के प्रमुखों में वर्तमान में सबसे मुखर थलसेना अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत रहे हैं। ऐसे मुद्वों पर उनकी टिप्पणियों, जो कभी कभार सरकार के भीतर की विचारधारा के खिलाफ भी जा सकती है, लेकिन जो न्यायोचित तरीके से राष्ट्रीय सुरक्षा की दिशा में केन्द्रित होती हैं, के कारण कई लोगों द्वारा उनकी आलोचना की गई है। उन्होंने कभी भी दिल से बोलने से परहेज नहीं किया है, जो ऐसे लोगों के लिए एक दुर्लभ बात है जो सेना में इतनी ऊंचाई तक पहुंच चुके हैं,  लेकिन सोशल मीडिया और फर्जी खबरों के इस युग में जरूरी है।

बिपिन रावत ने असम में बदलते जनसांख्यिकीय स्वरूप के बारे में कहा, जिससे स्थानीय राजनेता उनसे नाराज हो गए और उन पर सरकार के पक्ष में राजनीतिक बयान देने का आरोप लगाया। जब उन्होंने कश्मीर में पत्थर फेंकने वालों को ओवर ग्राउंड वर्कर्स (ओजीडब्ल्यू) करार दिया तो घाटी आधारित राजनेता उन पर पक्षपाती होने और स्थानीय संवेदनशीलताओं की अनदेखी करने का इल्जाम लगाया। जब उन्होंने सेना के लड़ाकू बलों में महिलाओं को शामिल करने की समस्या को उजागर किया तो उन्हें महिला विरोधी बताया गया और जब उन्होंने जिक्र किया कि सेना में एलजीबीटी समुदाय एवं व्याभिचार के लिए कोई जगह नहीं है तो उन पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करने का आरोप लगाया गया।

हर मामले में विश्लेषण से यह सामने आएगा कि उन्होंने जो कुछ कहा है, वह बिल्कुल सही और सटीक है। असम में  राज्य के भीतर के कुछ जिलों को छोड़कर अधिकांश जिलों में स्थानीय निवासी लगभग अल्पसंख्यक हो चुके हैं और अगर समय रहते इस समस्या का समाधान न निकाला गया तो वहां की पूरी जनसांख्यिकीय संरचना बदल जाएगी और असमी द्वितीय भाषा बन कर रह जाएगी। यह बात कोई नहीं है। जनरल सिन्हा ने नवंबर 1998 में जब वह असम के राज्यपाल थे  तब इसे उजागर करते हुए राष्ट्रपति को एक पत्र लिखा था लेकिन उस वक्त कांगेस सरकार ने उसकी अनदेखी कर दी थी। समय गुजरने के साथ यह समस्या और अधिक विकराल बन चुकी है।

कश्मीर में  स्टिंग वीडियो ने साबित कर दिया है कि पत्थरबाजी एक उद्योग है जिसे हुर्रियत द्वारा वित्त पोषित किया जाता है और उस पैसे का इस्तेमाल किया जाता है जो हवाला के जरिये पाकिस्तान से आता है। अलावा इसके, हाल की मुठभेड़ों से वैसे आतंकियों का खात्मा हुआ है जो पत्थर फेंकने से शुरुआत कर आतंकी बन गए थे। जब यह सच्चाई उभर कर सामने आई तो वैसे किसी भी व्यक्ति ने अपनी गलती मान कर इस पर टिप्पणी नहीं की जो पहले इसके लिए सेना की आलोचना किया करते थे, उन्होंने बस खामोशी अख्तियार कर ली।

लड़ाकू बल में महिलाओं एवं एलजीबीटी समुदाय को शामिल करने पर उनकी टिप्पणियां सुदूर सीमावर्ती क्षेत्रों की चौकियों में रहने के हालात, नियंत्रण रेखा के समीप की न युद्ध, न शांति के माहौल तथा इस तथ्य के बारे में उनकी गहरी समझ थी कि भारतीय जवान ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं जहां एलजीबीटी समुदाय को अभी भी स्वीकार नहीं किया जाता। इसका यह अर्थ नहीं था कि वह या संगठन उनके खिलाफ है बल्कि यह कि वर्तमान में सेना संरचना उनके लिए अनुपयुक्त और संस्थान के लिए बाधक है। समय गुजरने के साथ  जब भारत इस मामले में परिपक्व हो जाएगा, तो ऐसे पविर्तन भी स्वीकार्य हो सकते हैं।

बिपिन रावत ने कभी भी प्रेस के साथ बात करने से मना नहीं किया है। वह इस बात से बखूबी वाकिफ हैं कि वह क्या बोल रहे हैं। वह बेबाक और निर्भीक रहे हैं जैसीकि किसी भी सेना के जवान को होना चाहिए। वह ‘राजनीतिक रूप से‘ सही होने की परवाह नहीं करते और उन्हें ऐसा करना भी नहीं चाहिए। आलोचकों और राजनेताओं ने उनकी बातों को तोड़ मरोड़ कर अपने लिए कुछ तुच्छ लाभ हासिल करने की कोशिश की है।

जटिल मुद्दों को स्पष्ट तरीके से सामने रखने के लिए उनकी सराहना करने के बजाए उन्हें गलत समझा गया है और गलत संदर्भित किया गया है। उन्हें गलत उद्धृत किए जाने से अप्रत्यक्ष रूप से सेना प्रभावित हुई है क्योंकि कई लोगों का विश्वास है कि वह जवानों तक मीडिया के जरिये अपनी बातें पहुंचाना चाहते हैं। ऐसा नहीं है क्योंकि वह उसी का उत्तर देते हैं जो उनसे पूछा जाता है। सच्चाई यह है कि मीडिया के कई लोग सेना में आंतरिक रूप से चलने वाली बहसों से अवगत होते हैं और इसलिए वे उनसे वही पूछते हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि जनरल रावत हाल के दिनों में सबसे अधिक गलत समझे जाने वाले सेना प्रमुख बन चुके हैं जबकि इसके विपरीत वह खुले, बेबाक और सच्चे व्यक्ति हैं।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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