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जेल में हो रही मौतों पर सरकारें संवेदनशील क्यों नहीं

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट

पंजाब और हरियाणा की जेलों में अप्राकृतिक मौतों से हालात किस कदर चिंताजनक हैं यह तथ्य पंजाब तथा हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा संबंधित राज्यों से तलब की जाने वाली रिपोर्ट से पता चलेगी। कोर्ट ने दोनों राज्यों से इस बारे में रिपोर्ट देने को कहा है। यह निर्देश तब दिया गया जब न्यायमित्र रीता कोहली ने चीफ जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस अरुण पल्ली की खंडपीठ को बताया कि हरियाणा की जेलों में 90 प्रतिशत मौतें फंदे पर लटकने से हुईं और पंजाब में 99 प्रतिशत जानें जहर खाने से हुईं। खास बात यह है कि खंडपीठ के सामने पेश सीनियर वकील ने पंजाब की जेलों में आसानी से जहर की उपलब्धता और हरियाणा की जेलों में फंदे पर लटकने के मामले पर सवाल उठाए। ऐसे चिंताजनक हालात पर भी दोनों सरकारों और जेल प्रशासन संवदेनशील क्यों नहीं हुआ और क्यों नहीं हो रहा यह बात समझ से परे है।





क्या दोनों ही राज्यों-पंजाब और हरियाणा की सरकारों और जेल विभाग को इस बात का पता नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपने 11 सूत्री निर्देश में कैदियों के स्वतंत्रता के अधिकार, जेलों में मानवीय व्यवहार, जेलों में अप्राकृतिक मृत्यु वाले बंदियों के परिवारों को मुआवजा देने, एकाकीपन व कैद से निपटने के लिए बंदियों की काउंसलिंग पर विचार करने को स्पष्ट रूप से कह चुका है। आखिर सुप्रीम कोर्ट के इन दिशा-निर्देशों पर इन दोनों सरकारों ने क्या कदम उठाए? क्यों वहां की जेलों में अभी अस्वाभाविक मौतें हो रही हैं? क्यों जहर जैसी घातक वस्तु की उपलब्धता वहां पर है? इन मुद्दों पर सरकार को अपने गिरेबां में झांकने की जरूरत है। कैदी भी आखिर इनसान हैं। जीते-जागते मानव हैं। यह ठीक है कि किसी अपराध की सजा में वहां पर कैद हैं। वह किन मनोस्थितियों के बीच जेल की सलाखों के पीछे हैं। और वह किस तरह दबाव, खिंचाव, तनाव में आकर अपने जीवन से छुटकारा पाने की सोच रहे हैं। इस पर सोचने और तत्काल कदम उठाने की जरूरत सरकारों को है, जेल प्रशासन को है।

दरअसल पूरे देश की जेलों में कमोबेश स्थिति यह है कि तमाम सुधारों, चर्चाओं और सुप्रीम कोर्ट के बार-बार जारी निर्देशों के बावजूद अपेक्षित बदलाव दिखाई नहीं दे रहा। आए दिन जेलों में संदिग्ध परिस्थितियों में मरने, हंगामा करने, मारपीट की खबरें आती रहती हैं। वर्ष 2015 में प्रतिदिन औसतन चार कैदियों की मौत हुई। कुल मिलाकर 1,584 कैदियों की जेल में मौत हुई। जिसमें 1,469 स्वाभाविक बाकी अस्वाभाविक थी। अस्वाभाविक मौतों में दो-तिहाई यानी 77 आत्महत्या के मामले थे जबकि 11 की हत्या साथी कैदियों द्वारा की गई। क्या ये आंकड़े यह साबित नहीं करते कि इस ओर लक्षित,गंभीर व ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे।

ऐसे में जरूरत है कि सभी सरकारें और जेल प्रशासन इस बात पर ध्यान दें और कदम उठाएं कि कारागार में बंद जीवित कैदी का जीवन (मन व शरीर के साथ) किस तरह बेहतर बनाया जाये। योग, प्राणायाम, आसन, ध्यान, संगीत तथा अन्य गतिविधियां देश की तमाम जेलों में सक्रिय रूप से की जा रही हैं जिसका सीधा लाभ बंदियों को मिल रहा है। अहमदाबाद, जयपुर, यरवदा और तिहाड़ की जेलों में विपश्यना ध्यान के अभ्यास से कैदियों की जिंदगी ही बदल गई है। काउंसलिंग भी एक प्रभावी कदम है। हमें याद रखना होगा कि कैदियों को कारागार में स्वस्थ और सुरुचिपूर्ण वातावरण देकर ही हम उन्हें बेहतर नागरिक बना सकते हैं, यही हमें करना होगा फिर चाहे वह हरियाणा सरकार हो या पंजाब की। अच्चे प्रयासों से ही अपेक्षित सफलता मिलती है।

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