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रक्षा के क्षेत्र में हमें PSU की जरूरत क्यों है?

राफेल-विमान
फाइल फोटो

राफेल सौदे ने ऑर्डनेंस फैक्टरी बोर्ड (ओएफबी) के तहत कार्यरत ऑर्डनेंस फैक्टरियों सहित सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) से संबंधित कई पहलुओं को उजागर कर दिया है। जो मुद्दे प्रमुखता से उभर कर सामने आ रहे हैं, उनमें हिंदुस्तान एरोनॉटिकल लिमिटेड (एचएएल) की वित्तीय स्थिति, पीएसयू की यूनियनों द्वारा हड़ताल तथा सरकार द्वारा इन प्रतिष्ठानों में श्रमबल को घटा दिया जाना है।





एचएएल के भीतर झांकने पर एक अलग ही कहानी दिखेगी। साल 2012 की इसकी बैलेंस शीट में 2,339 करोड़ रुपये का मुनाफा दिखाया गया है। इस बारे में गहन अध्ययन करने पर पता चला कि इस लाभ में से 2,300 करोड़ रुपये भविष्य के ऑर्डर के लिए सेना मुख्यालयों द्वारा किए गए जमाओं से अर्जित लाभ के थे। इसका अपना लाभ महज 39 करोड़ रुपये का था। इसलिए, जब यह दावा करती है कि इसने अपना लाभ सरकार को दे दिया है, तो इसका आशय उस लाभ से होता है जो खुद सरकार से ली गई अग्रिम राशि द्वारा अर्जित की गई है। यह मामला भविष्य के उपयोग के लिए रक्षा कोष हड़पने का भी है जो अधिकांश नियत समय से पीछे है।

ज्यादातर पीएसयू तथा ऑर्डनेंस फैक्टरियां आजादी के बाद के शुरुआती सालों में स्थापित की गई थीं जब भारत में निम्न औद्योगिक आधार था और उसे विकसित किए जाने की जरूरत थी। यह तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा अपनाया गया समाजवादी दृष्टिकोण था। बहरहाल, समय गुजरने के साथ निजी क्षेत्र में तेजी से विकास हुआ और अधिकांश मामलों में वे प्रौद्योगिकी एवं विश्वसनीयता दोनों में ही सरकारी उपक्रमों से आगे हैं।

अलावा इसके सरकार की स्वामित्व वाली अधिकांश औद्योगिक इकाइयां बड़े शहरों के बीचोंबीच मुख्य भूमि पर स्थित हैं। सरकारी इकाइयां होने के कारण उनके रखरखाव की लागत भी निजी क्षेत्र की तुलना में अधिक होती है। ज्यादातर का आधुनिकीकरण नहीं किया गया है और वे अभी भी उत्पादन के लिए पुरानी प्रौद्योगिकी का भी उपयोग करती हैं। इन प्रतिष्ठानों में ‘ओवरटाइम संस्कृति‘ भी बड़े पैमाने पर व्याप्त है। श्रमिक काम के घंटों के दौरान मुश्किल से कोई उत्पादन करते हैं, ज्यादातर ओवरटाइम वेतन को ही तवज्जो देते हैं। इससे उत्पादन की लागत बढ़ जाती है जिसे इसके स्थायी ग्राहकों पर डाल दिया जाता है।

इसी के साथ इन प्रतिष्ठानों द्वारा उत्पादित उत्पादों की गुणवत्ता निम्न होने लगी है क्योंकि उनका बाजार निर्धारित है। इसलिए उसके ग्राहकों के पास और कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है। एक स्पष्ट उदाहरण पुलगांव डिपो से लीक कर रहे त्रृटिपूर्ण खदानों को दुरुस्त करने से ऑर्डनेंस फैक्टरी द्वारा इंकार किए जाने का है जिसके कारण मई 2016 में बड़ा विस्फोट हो गया था और 16 लोगों की जानें चली गईं थीं।

कई दशक तक निजी क्षेत्र को रक्षा बाजार में प्रवेश करने से प्रतिबंधित कर दिया गया था उस पाबंदी को अब उठाया जा रहा है। रक्षा क्षेत्र में निजी क्षेत्र का प्रवेश सरकारी संस्थानों के लिए एक खुली चुनौती बन गई है क्योंकि सशस्त्र बलों को निजी क्षेत्र के उत्पाद किफायती और बेहतर गुणवत्ता के लग रहे हैं।

तोपखाना के लिए ‘मेक इन इंडिया‘ बंदूकों में निजी क्षेत्र का एक बड़ा घटक शामिल है। उनकी टेकनॉलोजी उच्च स्तर की है, गुणवत्ता बहुत अच्छी है और विश्वसनीयता काफी अधिक है। गोला बारूद के उत्पादन के ऑर्डर अब निजी क्षेत्र को आउटसोर्स किए जा रहे हैं। ऐसा ही मामला सशस्त्र बलों के लिए रोजमर्रा के अधिकांश उत्पादों का है जिस पर कभी सरकारी संगठनों का एकाधिकार था। इस तरह धीरे-धीरे सरकार ने पीएसयू में अपने निवेशों को कम करना शुरू कर दिया है।

निवेश में इसी कमी की वजह से इन प्रतिष्ठानों की यूनियनें अब हड़ताल पर जाने लगी हैं। उनकी मांग है कि सरकार उनमें अधिक निवेश करे, बजाए निजी क्षेत्र पर निर्भर रहने के। उनका दावा है कि वे अभी भी रक्षा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण बने हुए हैं और इसलिए उनका विकास किया जाना चाहिए। यह हड़ताल स्पष्ट रूप से इस सफेद हाथियों को बनाये रखते हुए ‘मेक इन इंडिया‘ मॉडल के विकास की अनदेखी करने के लिए सरकार पर दबाव बनाने की उनकी मंशा को दर्शाती है।

सरकार भले ही इन सरकारी प्रतिष्ठानों को बंद करने में हिचकिचा रही है लेकिन उसे निजी क्षेत्र का समर्थन करना चाहिए तथा उसे अपनी खुद की औद्योगिक इकाइयों को समान बोली द्वारा प्रतिस्पर्धा करने के लिए विवश करना चाहिए।  यह जल्द ही स्पष्ट हो जाएगा कि पीएसयू कभी भी लागत और प्रौद्योगिकी के मामले में निजी क्षेत्र के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अब ढीले पड़ गए हैं, दशक से उन्होंने न तो किसी प्रतिस्पर्धा का सामना किया है और न ही आधुनिकीकरण की आवश्यकता ही महसूस की है। अलावा इसके वर्तमान में मौजूद ‘ओवरटाइम संस्कृति‘ के कारण उनकी लागत कभी भी प्रतिस्पर्धी नहीं हो सकती।

पीएसयू और ऑर्डनैंस फैक्टरियों को बंद करना या उनका निजीकरण करना सरकार को कई प्रकार से लाभ पहुंचा सकता है। पहला, यह रक्षा बाजार को खोल देगा और बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेशों को आमंत्रित करेगा। वर्तमान में निवेशक सरकार के दीर्घकालिक लक्ष्यों और यूनियन के कदमों पर आधारित उसके फैसलों के प्रभाव को लेकर आशंकित रहते हैं।

दूसरा, इससे प्रौद्योगिकीय स्तर में बढोतरी होगी क्योंकि निवेश से आधुनिक प्रोद्योगिकी भी आएगी। तीसरा, पीएसयू और ऑर्डनैंस फैक्टरियों के स्वामित्व वाली बेशकीमती जमीनों की बिक्री से अतिरिक्त फंड उपलब्ध होगा। अंत में, यह रक्षा बजट को इसके वास्तविक उद्वेश्य, सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण की दिशा में मोड़ देगा।

पर सवाल यह है कि क्या सरकार बिल्ली के गले में घंटी बांधने की इच्छुक है या जैसे कि पहले की ही तरह अपने सीमित रक्षा बजट को इन उपक्रमों पर यूं ही लुटाती रहेगी क्योंकि वे सरकारी संगठन हैं और वोट बैंक को प्रभावित कर सकते हैं।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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