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तिहाड़ जेल में पर्याप्त CCTV कैमरे लगाने में देरी क्यों?

तिहाड़ में सीसीटीवी

तिहाड़ जेल में कैदियों के साथ मारपीट को लेकर दाखिल याचिका पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए जेल प्रशासन पर जो टिप्पणी की है वह सीधे तौर पर जेल प्रशासन की लापरवाही, नाकामी और गैर जिम्मेदारना रवैये को रेखांकित करती है। कोर्ट ने कहा है कि वहां सीसीटीवी लगाने में देरी क्यों की जा रही है?





तिहाड़ जेल प्रशासन के लिए यह शर्म का विषय होना चाहिए कि एशिया की अतिसुरक्षित तथा शानदार जेलों में शुमार इस जेल में निगरानी के लिए लगाए जाने वाले कैमरे पर्याप्त मात्रा में नहीं लगे हैं। आखिर प्रशासन कैदियों और कर्मचारियों की गतिविधियों की निगरानी तथा जानकारी किस आधार पर जुटाएगा। पांच महीने पहले जून माह में जेल प्रशासन ने स्वीकारा था कि तिहाड़ समेत अन्य जेलों में सीसीटीवी कैमरों की संख्या नाकाफी है। इस स्वीकारोक्ति के बाद भी कैमरों का न लगाया जाना सीधे तौर पर कामचोरी, निठल्लेपन की श्रेणी का मामला कहा जायेगा। कायदे से तो इतने दिनों में वहां कैमरे लग जाने चाहिए थे।

दरअसल 200 एकड़ क्षेत्र में फैले तिहाड़ जेल परिसर में 10 अलग-अलग जेलों की निगरानी वहां के 500 सीसीटीवी कैमरों की कृपा पर है। यानी औसतन एक जेल पर 30 कैमरे ही हैं। बाकी जेल के अधिकारियों के दफ्तरों और मेन गेट पर लगे हैं। ऊपर से कैदी भी हर जेल में क्षमता से अधिक हैं। क्षमता 5200 कैदियों की है पर वर्तमान में 11 हजार कैदी हैं। ऐसे में निगरानी रख पाना टेढ़ा काम है। यह बात समझते और जानते हुए अगर प्रशासन कदम नहीं उठाता तो क्या यह अपराध नहीं कहा जायेगा। वैसे भी कैदियों और कर्मचारियों के बीच मारपीट तथा जेल में पार्टी आदि को लेकर यह जेल बीते दिनों सुर्खियों में रही है।

कमोबेश इसी तरह पूरे देश की 1382 जेलें ऐसे ही हालात से गुजर रही हैं। सुरक्षा और निगरानी का सिस्टम इस कदर चौपट है कि जेलों के अंदर गैंगवार हो जाती है। हत्याएं तक हो जाती हैं। और बाद में पुष्टि होती है कि अमुक जगह पर सीसीटीवी नहीं लगा था। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की बागपत जेल में मुन्ना बजरंगी की हत्या को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। निश्चित तौर से ऐसे मामले जेल प्रशासन के साथ-साथ सरकारों की काहिली की दास्तान लिखते रहते हैं और उनके कान में जूं तक नहीं रेंगती। यानी कोर्ट की टिप्पणियों के बावजूद ढाक के तीन पात।

ऐसे हालात चिंताजनक, दुखद और शर्मनाक हैं सरकार, जेल प्रशासन और शीर्ष अधिकारियों के लिए कि वह अपनी तय जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं कर पा रहे। उन्हें इस बात का इल्म होना चाहिए कि जब निगरानी तंत्र मजबूत होता है तो कार्य करने, नीति बनाने और कैदियों को बेहतर सुविधा देने में प्रशासन और सक्षम हो जाता है। सरकार और राज्य के कारागारों की जिम्मेदारी संभालने वाले आईपीएस अधिकारी चाहें तो जेल कर्मचारियों की कार्यशैली पर रोक लगा सकते हैं। अगर गैर जिम्मेदाराना रवैया अपनाने वाले मझौले स्तर के अधिकारियों को दोषी पाये जाने और तत्काल सजा देने की मुहिम चलने लगे तो अदालतों को सख्त टिप्पणी नहीं करनी पड़ेगी।

तिहाड़ जेल के कैदियों का हाईकोर्ट में दाखिल शिकायत पत्र इसी बात को तो लेकर है कि जेल परिसर के भीतर उनके साथ न केवल मारपीट की गई बल्कि जान से मारने की कोशिश भी गई। यह मामला जांच का विषय हो सकता है लेकिन अगर निगरानी तंत्र मौजूद तथा मुस्तैद है तो कैमरे में कैद तमाम सबूत मौके पर काम आते हैं। लिहाजा जेल प्रशासन को यह बात अच्छी तरह समझनी होगी कि समय सीमा के भीतर अगर काम नहीं हुआ तो हाईकोर्ट की चेतावनी भारी पड़ सकती है। देश के अन्य जेल प्रशासनों को भी इस बात से सबक लेने की जरूरत है।

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