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पुलिस सुधारों पर राज्य सरकारें क्यों दिखा रही हैं बेरुखी

यूपी पुलिस

यह मीडिया रिपोर्ट चौंकाने वाली कम और चिंताजनक अधिक है जिसमें कहा गया है कि लचर ट्रेनिंग तथा प्रस्तावित पुलिस सुधारों पर राज्य सरकारों की बेरुखी से पुलिस बल का व्यवहार कटघरे में है। लखनऊ पुलिस की उस कारगुजारी को इसी परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है जिसमें उत्तर प्रदेश पुलिस के ड्यूटी पर तैनात वर्दीधारी पुलिसकर्मी ने आधी रात लखनऊ शहर में ही कार के भीतर मौजूद एक व्यक्ति पर सीधे गोली इसलिए मार दी कि उसने अपनी कार नहीं रोकी थी। मामला पुलिस के पास है। बाद में अदालत में भी जायेगा। सवाल यह है कि ऐसी घटनाएं पुलिस पर सवाल नहीं खड़े करती। यूं तो इतने बड़े देश में इसी तरह की या इससे मिलती-जुलती घटनाएं होती रहती हैं और आम नागरिक कुछ दिनों के बाद इन घटनाओं को भूल जाता है पर सोचने की बात यह है कि खाकी वर्दी पर ऐसे दाग क्यों लग रहे हैं और कब तक लगते रहेंगे तथा आम जनता खाकी का खौफ कब तक बर्दाश्त करती रहेगी।





पुलिस तथा कानून व्यवस्था राज्य का विषय है। पर चिंताजनक बात यह है कि राज्यों की सरकारों का रवैया ऐसा है कि वह दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ आगे बढ़ने को तैयार नहीं है। कुछ राज्यों को छोड़ दें तो अधिकांश राज्यों के तमाम इलाकों की पुलिस का व्यवहार आज भी गुलाम भारत की पुलिस जैसा है। आम नागरिक डर के मारे थाने तक नहीं जाता। और किसी तरह हिम्मत बटोर कर जाता भी है तो वहां पुलिस के बात करने का अंदाज बेहद अपमानजनक होता है। रिपोर्ट तो यहां तक कहती है गैर दोस्ताना व्यवहार की वजह से देश के 75 फीसदी लोग रिपोर्ट दर्ज कराने से गुरेज करते हैं। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी तथा रिटायर्ड पुलिस अफसर कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए जाने वाले स्पष्ट निर्देश तथा ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट (BPRD) की अलग-अलग रिपोर्टों को कई राज्य अभी तक लागू नहीं कर पाये हैं। नतीजा यह है कि आम आदमी गाहे-बगाहे भ्रष्ट पुलिसकर्मियों का शिकार होता रहता है। यह मामला चिंताजनक है और गंभीर भी। सरकारों विशेषकर सूबे के मुखिया को इस ओर सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ काम करने की जरूरत है।

BPRD की ओर से पुलिस के व्यवहार और उसकी कार्यप्रणाली पर विस्तार से अध्ययन करवाए गये हैं। रिपोर्ट में साफ-साफ खाकी के बर्ताव और व्यवहार पर सवाल उठाये गये हैं। यह बात आज दिखाई भी दे रही है कि पुलिस किस तरह अपनी वर्दी में तरह-तरह के दाग अपने ही हाथों से लगा रहे हैं। दाग लगाने की चरम सीमा तो यह है कि वह खुद ही निर्णायक बन हत्या करने पर उतारू हो रही है। ये घटनाएं घोर अनुशासनहीनता की श्रेणी में आती हैं। साथ ही ये घटनाएं किसी भी सूरत में उचित नहीं हैं। पुलिस को पहला पाठ यही सिखाया जाता है कि अनुशासन के साथ कर्तव्य का पालन हो। चाहे वह हाल ही में भर्ती किया गया साधारण सिपाही हो या भारतीय पुलिस सेवा का वरिष्ठ अधिकारी। लचर प्रशिक्षण का परिणाम यह है कि पुलिस को कानून व्यवस्था के पालन में दिक्कत आ रही है। और समाज का सीधा-सच्चा नागरिक पीड़ित, परेशान और उत्पीड़ित हो रहा है तथा बदमाश, चोर, उचक्के व खूंखार अपराधी बेखौफ होकर समाज के लोगों को बेधड़क अपना निशाना बना रहे हैं।

जरूरत है सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों तथा पुलिस शोध से जुड़ी एजेंसियों की सिफारिशों को हर हाल में लागू करने की। इसकी पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। भला ऐसे पुलिसकर्मी किस अधिकार से पुलिसतंत्र का हिस्सा हैं जो अनुशासन से कोसों दूर हैं। किस आधार पर वे खाकी वर्दी पर बांह में काली पट्टी बांधकर ड्यूटी करने की हिमाकत कर रहे हैं। दिक्कत वही कि उनका मानसिक प्रशिक्षण इस प्रकार का नहीं है कि वे नैतिकता भरे कठोर अनुशासन का आचरण कर सकें। वह तो खाकी पहनकर दूसरे ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ बेहद निष्ठा भरा आचरण करने वाले पुलिसकर्मियों की आड़ में धन उगाही से लेकर अपराध तक में संलिप्त हैं।

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