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क्यों खाली हैं देशभर में पुलिस के पद ?

यूपी पुलिस
फाइल फोटो

केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी यह आंकड़ा परेशानी पैदा करने के साथ-साथ राज्यों की काहिली भी दर्शाता है, जिसमें कहा गया है कि पूरे देश में पुलिस के 5.28 लाख पद खाली हैं। इनमें सर्वाधिक खाली पद उत्तर प्रदेश में हैं जहां 1.29 लाख पदों पर भर्ती की दरकार है। इसी तरह देश के अन्य कई राज्यों के बारे में खाली पुलिस पदों के बारे में आंकड़ा पेश किया गया है। यहां हैरानी की बात यह है कि अक्सर ही ऐसे आंकड़े जारी होते हैं और उसके बाद कई राज्यों में पुलिस में रिक्तियां भरने का काम ऊंट के मुंह में जीरे की तरह होता है। जिसका नतीजा यह होता है कि लगभग रोज ही राज्यों की कानून-व्यवस्था की कलई खुलती है। सरकारें लीपापोती के बाद वही कदमताल करती दिखाई देती हैं।





सवाल यह है कि जब यह बात नीति-नियंताओं, आला-अफसरों को पता है कि कानून-व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने, आंतरिक सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए पर्याप्त पुलिस बल को होना बेहद जरूरी है तो इन पदों पर भर्तियां क्यों नहीं की जाती ? क्यों योग्य, प्रतिभावान, कर्मठ युवाओं को पुलिसबल का हिस्सा नहीं बनाया जाता ? देश के सबसे बड़े सूबे में कानून-व्यवस्था को ठीक करने के नाम पर केवल आईपीएस अफसरों, मातहतों को इधर-उधर कर दिया जाता है। क्या यह प्रक्रिया पर्याप्त है ? क्या इतने भर से राज्य के हर गांव, हर गली-मोहल्ले की सुरक्षा चाक-चौबंद हो जाएगी ? बढ़ती आबादी के बीच जरूरी यह है कि कानून-व्यवस्था को धार देने के लिए सशक्त बीट सिस्टम से लेकर संचार, ट्रांसपोर्ट आदि से लैस पर्याप्त संसाधन हों। लेकिन सूबे में इनकी पर्याप्त उपलब्धता न होने से अपराध में नकेल कसने में दिक्कत आ रही है। अगर सरकार इस बात की अनदेखी कर रही है तो कानून व्यवस्था में पर्याप्त सुधार आ पाना संभव नहीं है। इस पर सोचने और काम करने की जरूरत है।

सवाल यह भी है कि उत्तर प्रदेश के साथ-साथ वे राज्य़ भी हैं जो आतंकवाद, नक्सलवाद, उग्रवाद की चुनौतिय़ों का सामना अपर्याप्त बल के साथ क्यों कर रहे हैं ? क्य़ा धन की कमी है ? नहीं। कमी है तो उच्च इच्छा-शक्ति की। आतंकवाद से प्रभावित जम्मू-कश्मीर में 87,822 स्वीकृत पदों में से 10,044 पद खाली हैं। इसी तरह उग्रवाद प्रभावित असम राज्य में 11,452 तथा नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ में 11,916 पद खाली हैं। सुप्रीम कोर्ट भी पुलिस सुधारों के बाबत रिक्त पदों की भर्ती का निर्देश दे चुका है। समय की मांग है कि सत्तारूढ़ पार्टियां इस बात को भलीभांति समझें और पुलिस पदों पर भर्ती करें।

पुलिस समवर्ती सूची का विषय है जिसपर केंद्र व राज्य दोनों की ही काम करने की जिम्मेदारी है। यह बात भी सभी को समझनी होगी कि पुलिस आतंरिक सुरक्षा की पहली कड़ी है और सुरक्षा व कानून-व्यवस्था के बिना विकास संभव नहीं है। संतोषजनक बात यह है कि केंद्र की नई सरकार ने पुलिस सुधार से जुड़ी बातों को गौर करना शुरू किया है। पुलिस के लिए आधारभूत ढांचा बनाने, आधुनिकीकरण के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा धनराशि के बढ़ाए जाने से मंशा स्पष्ट है कि केंद्र इस दिशा की ओर बढ़ रहा है। साथ ही पुलिस आधुनिकीकरण तथा पुलिस सुधार के लिए काम करने वाले राज्यों को ज्यादा धनराशि देकर उन्हें प्रोत्साहित करने का काम एक अच्छी पहल है। राज्यों को भी पूरी गंभीरता से ईमानदार भरी पहल करने की जरूरत है ताकि लचर कानून-व्यवस्था को दुरुस्त किया जा सके। राज्यों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्ष 2017 में पुलिस की स्वीकृत संख्या करीब 28 लाख थी पर वह केवल 19 लाख कर्मियों की भर्ती कर पाए। यह भला काहिली और दृढ़ इच्छा-शक्ति की कमी नहीं तो फिर क्या है ?

 

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