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जेलें क्यों बन रही हैं हिंसा, आतंक और खौफ की पर्याय ?

बागपत जेल
बागपत जेल (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश की बागपत जिला जेल में पूर्वांचल के माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी की गोलियों से भूनकर की गई हत्या यह कहने के लिए पर्याप्त है कि अब जेलें न केवल असुरक्षित हैं बल्कि वहां खतरनाक षडयंत्रों को अंजाम दिया जा रहा है, आपराधिक योजनाएं बनाई जा रही हैं। इस जेल में हालात यहां तक पहुंच गए कि जेल के भीतर गैंगस्टर सुनील राठी का खौफ बढ़ गया है। हत्या के बाद वहां बंदियों से लेकर बंदी रक्षक और यहां तक की जांच अधिकारी भी उसकी बैरक में बगैर बुलेट प्रूफ जाने से इनकार कर रहे हैं। आखिर यह सब क्या दर्शाता है?





बागपत जिला कारागार की खौफ पैदा करने वाली यह घटना जेल प्रशासन, सरकार तथा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को सीधे तौर पर कठघरे में खड़ा करती है। कैदी जेल में रात को दाखिल होता है और सुबह उसकी हत्या हो जाती है। ऐसे मे भला जिम्मेदार एजेंसियां कैसे मुंह मोड़ सकती हैं? आनन-फानन में जेलर, डिप्टी जेलर, वार्डन, डिप्टी वार्डन का निलंबन और मजिस्ट्रेट जांच का आदेश वारदात की गंभीरता को कैसे खत्म कर सकता है? घटना हो जाने के बाद पिस्टल आने, शराब पीने, कैदी का स्वागत सत्कार होने जैसी तमाम बातें की जा रही हैं पर जिम्मेदार अफसरों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की? जब पता था ऐसे डॉन-माफिया कहे जाने वाले बंदी यहां पर हैं, उसके गिरोह के तमाम सदस्य यहां बंद हैं, जेल में 860 बंदियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी 135 की बजाए केवल 20 बंदी रक्षक संभाल रहे हैं और जेल में सीसीटीवी कैमरे और जैमर जैसी सुविधाएं भी नहीं हैं तो जेल प्रशासन क्यों हाथ पर हाथ धरा बैठा रहा।

जेल में हत्या और गैंगवार की यह पहली घटना नहीं है। संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो जाने की तमाम घटनाएं देशभर की जेलों की चारदीवारी के भीतर कैद हैं, दफन हैं। एक समय उत्तर प्रदेश में ही कुख्यात अपराधी ब्रजेश और राजेश टोटा गैंग के बीच हुए गैंगवार ने वहां की जेलों में कैदियों की सुरक्षा पर बड़ा प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया था। वर्ष 2015 में राजस्थान की बीकानेर जेल में गैंगवार के दौरान तीन कैदियों की मौत हो गई थी। दिल्ली की तिहाड़ जेल में ऐसी घटनाएं कई बार हो चुकी हैं। अति सुरक्षित मानी जाने वाली दिल्ली की इस जेल में अभी भी सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। पिछले दिनों यह जेल नॉनवेज पार्टी होने, सुरक्षाकर्मी द्वारा कैदियों से मारपीट, सीसीटीवी कैमरों की कमी की वजह से सुर्खियों में रही।

बागपत जेल की इस घटना से देश की तमाम जेलों को सबक लेने और उस पर पुख्ता काम करने की सख्त जरूरत है। डेरा प्रमुख राम रहीम को हरियाणा की सुनारियां जेल में लाए जाने के बाद इसे उत्तर भारत की सबसे संवेदनशील जेलों में माना जा रहा है और कहा जा रहा है कि बागपत जेल की घटना के बाद डेरा प्रमुख से मिलने से पहले जेलर तक की तलाशी ली जा रही है। बात देखने सुनने में ठीक लगती है पर जब तक जेलों को पूरी तरह से यानी चारदीवारी, मेन गेट से लेकर भोजन, थाली, गिलास, सींकचे, हथियार आदि गहन निगरानी के जरिए अतिसुरक्षित नहीं बनाया जाएगा ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहेगी। हत्याओं और मौतों का सिलसिला जारी रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट बार-बार राज्य सरकारों को निर्देश देकर उन्हें आईना दिखा रहा है, पर सरकारें हैं कि दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ आगे नहीं बढ़ रही हैं लिहाजा बागपत जेल में हत्या जैसी वारदात हो रही हैं। यह वक्त चेत जाने का है। संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत जेलों का प्रबंधन तथा रख-रखाव राज्य सरकारों का विषय है। राज्यों को खासतौर पर हर सूबे के कारागार मंत्री को वरिष्ठ अधिकारियों की मदद से बदहाल औऱ बदनाम होती जेलों को चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत है।

 

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