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ऑर्डनेंस फैक्टरियां क्यों हैं निजीकरण के खिलाफ ?

आयुध डिपो
फाइल फोटो

एक रिपोर्ट के अनुसार ऑर्डनेंस फैक्टरियों के लगभग 80,000 कर्मचारी निजीकरण पर आपत्ति जताते हुए 20 अगस्त से एक महीने की हड़ताल पर जाने की योजना बना रहे हैं। कर्मचारियों को लिखे एक पत्र में अखिल भारतीय रक्षा फेडेरेशन के महासचिव जी श्रीकुमार ने कहा कि हड़ताल का उद्वेश्य सरकार के ऑर्डनेंस फैक्टरियों के निजीकरण के फैसले का विरोध करना है। उन्होंने इस पर आपत्ति जताते हुए रक्षा मंत्री को भी एक पत्र लिखा। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस कदम के खिलाफ प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा क्योंकि ऑर्डनेंस फैक्टरी बोर्ड (ओएफबी), जो भारत में सभी ऑर्डनेंस फैक्टरियों को नियंत्रित करता है, कोलकाता में है।





ओएफबी के तहत 41 ऑर्डनेंस फैक्टरियां, पिछले कुछ वर्षों से रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र के विकास में एक बड़ी बाधा रही हैं जबकि सरकार ने उनमें निवेश करना बंद कर दिया है। जैसाकि वर्तमान हड़ताल से संकेत मिलता है, वे किसी के अधीन रहने और आधुनिकीकरण किए जाने के खिलाफ हैं, मांग के स्तर से नीचे उत्पादन करना चाहते हैं और सहमत मात्राओं को पूरा करने में भी विफल हो जाते हैं जिससे उत्पादन में कमी आ जाती है।

सप्ताहांत में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया कि जुलाई, 2019 में उत्पादन का मूल्य 20 प्रतिशत था जो लक्ष्य की तुलना में 39 प्रतिशत कम था, जबकि सेना को ईश्यू (आपूर्ति) का मूल्य केवल 15 प्रतिशत था जो अनुमानित लागत की तुलना में 55 प्रतिशत कम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गोला बारूद एवं विस्फोटकों के 24 प्रकारों में और धनुष गन और टी-90 युद्ध टैंकों सहित जैसे प्रमुख महत्वपूर्ण मदों के 21 प्रकारों में कमी थी।

इसके साथ-साथ उत्पादन की गुणवत्ता से जुड़े मुद्दे भी रहे हैं। उनके द्वारा उत्पादित त्रृटिपूर्ण गोला बारूद और बारूदी बमों की वजह से कई दुर्घटनाएं हुई हैं। कई अवसरों पर तो उन्होंने डिपो से त्रृटिपूर्ण उत्पादों को संग्रहीत करने से भी मना कर दिया जिससे दुर्घटनाएं हुई और जवान हताहत हुए। वे बख्तरबंद वाहनों सहित निम्न गुणवत्ता के वाहन बना रहे हैं। सभी करारों के बावजूद बिक्री के बाद की उनकी सेवा ने सशस्त्र बलों को हतोत्साहित कर दिया है।

इसके उलट, एक यूनियन के उपाध्यक्ष रविन्द्र पिल्लई ने कहा, ‘कोई भी निजी विनिर्माता केवल लाभ देखता है। राष्ट्रीय हित उसके लिए अंतिम मसला होगा। निजी क्षेत्र में गुणवत्ता आश्वासन तीसरे पक्ष की जांच और स्व-प्रमाणन द्वारा किया जाएगा। इससे हमारे जवानों और सशस्त्र बलों का जीवन खतरे में पड़ जाता है। ओएफबी केवल देश हित के लिए काम करता है।‘ ओएफबी का प्रदर्शन बेहद निम्न है और उनमें से अधिकांश के पास स्व प्रमाणन है जिससे सशस्त्र बलों की समस्या और भी बढ़ जाती है। उनके उत्पादों को लेकर सेना के बीच विश्वास में काफी कमी आई है।

सशस्त्र बलों के उनके स्थायी ग्राहक होने के कारण वे अपनी गणना के अनुसार मनमाने तरीके से मूल्य लगाते हैं। यहां तक कि रक्षा लेखा महानियंत्रक ने मई 2016 में रक्षा मंत्रालय को एक रिपोर्ट में कहा था कि ऑर्डनेंस फैक्टरियां सेना से कई सौ करोड़ अधिक वसूल रही हैं। उदाहरण के रूप में उन्होंने  हेवी वेहिकल्स फैक्टरी, अवदी में रूस के लाईसेंस के अधीन निर्मित्त टी-90 टैंक का मामला उद्धृत किया। इस उत्पादन में ओएफबी सेना से 21 करोड़ प्रति टैंक वसूल रही थी जो आयात की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत अधिक था।

निजीकरण पर वर्तमान सरकार की विचार प्रक्रिया के अनुसार, वह पांच वर्षों तक कर्मचारियों को वेतन और भत्तों का भुगतान करेगी जिसके आगे यह निगम की जिम्मेदारी होगी। यूनियन इससे भी संतुष्ट नहीं हुए हैं। यूनियनों द्वारा निजीकरण को लेकर आपत्ति का कारण रोजगार सुरक्षा के अतिरिक्त यह है कि यह देश की सुरक्षा के लिए एक खतरा होगा। यह अतार्किक है क्योंकि निजी क्षेत्र कई क्षेत्रों से जुड़ा है और समय पर मांगों को पूरा करने में अपनी दक्षता प्रदर्शित कर चुका है।

यह वास्तविकता है कि ऑर्डनेंस फैक्टरियों के कर्मचारी सुस्त और निम्न गुणवत्ता उत्पादन के अभ्यस्त हो गए हैं जोकि निजी क्षेत्र के तहत संभव नहीं होगा। अपने सारे प्रयासों के बावजूद सरकार इन दशकों पुराने ऑर्डनेंस फैक्टरियों के कामकाज में सुधार लाने में विफल रही है। ओएफबी के एक अधिकारी ने बताया कि ऑर्डनेंस फैक्टरियों को व्यावसायिक आधार पर चलाया नहीं जा सकता क्योंकि एक ‘वॉर रिजर्व‘ रखना जरुरी है। उन्होंने बताया कि ‘निजी क्षेत्र की कोई भी कंपनी सुस्त क्षमता को वॉर रिजर्व के रूप में नहीं रख सकती।‘ दुनिया भर में सेनाएं निजी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहती हैं और वहां कोई भी समस्या उत्पन्न नहीं हुई तो भारत में कोई समस्या क्यों पैदा होनी चाहिए।

उपलब्ध सूचना के अनुसार, पहले चरण में सरकार की इच्छा कुछ फैक्टरियों को सार्वजनिक-निजी साझीदारी को सौंपने की है। पहले भी कई समितियों द्वारा निजीकरण की अनुशंसा की गई है लेकिन प्रत्येक सरकार ने वोटबैंक पर इसके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए इस पर कदम उठाने में हिचकिचाहट दिखाई। यह पहली सरकार है जिसने मामले को सीधे सुलझाने की दिलेरी दिखाने का फैसला किया है। सरकार ने महसूस किया है कि ये फैक्टरियां रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा हड़प जाती हैं लेकिन इसके मुकाबले उनका योगदान बहुत कम है।

उनके कामकाजी चरित्र में सुधार लाने में विफल रह जाने की हताशा में, सरकार सेना के नियंत्रण के अधीन रूस के साथ संयोजन में एके 203 बनाने के लिए अमेठी में फैक्टरी की स्थापना कर रही है। उनके यूनियनों की सांठगांठ़ को तोड़ने के लिए, अमेठी फैक्टरी के कर्मचारियों में क्षेत्र से संबंधित पूर्व सैनिक शामिल होंगे। सरकार उम्मीद करती है कि यह मॉडल सफल हो जिससे कि वे दूसरे अनिवार्य आर्डनेंस फैक्टरियों में इसी का अनुसरण हो सके।

सरकार ‘मेक इन इंडिया‘ के लिए भी प्रेरित कर रही है। अगर इसे सफल होना है तो आर्डनेंस फैक्टरियों जिनकी रक्षा उत्पादन पर मजबूत पकड़ है, का निश्चित रूप से निजीकरण किया जाना चाहिए। जब तक सरकार उनके दबावों एवं हड़तालों को नजरअंदाज नहीं करती, वह कभी भी रक्षा जरूरतों के लिए निजी क्षेत्र को खोलने और सही गुणवत्ता और मात्रा की उपलब्धता सुनिश्चित करने में सफल नहीं होगी।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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