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किन उम्मीदों को पूरा कर पाएगा शंघाई सहयोग संगठन सम्मेलन ?

पीएम मोदी शंघाई सहयोग संगठन सम्मेलन में
फाइल फोटो

शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) सम्मेलन, किग्रीस्तान की राजधानी बिशकेक में 13-14 जून को आयोजित किया जाएगा। एससीओ चीन की अगुवाई वाला आठ सदस्यीय आर्थिक तथा सुरक्षा ब्लॉक है। इसके संस्थापक सदस्यों में चीन, रूस, कजाकिस्तान, किग्रीस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान शामिल हैं।  चीन चाहता था कि पाकिस्तान इस ब्लॉक में शामिल हो क्योंकि उस  ने हमेशा उसका समर्थन किया है जबकि रूस की इच्छा थी कि चीन का प्रतिरोध करने के लिए भारत इस ब्लॉक में शामिल हो। भारत और पाकिस्तान दोनों को साल 2017 में बीजिंग स्थित इस क्षेत्रीय सुरक्षा समूह में शामिल कर लिया गया। दुबारा प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद मोदी के लिए यह पहला सम्मेलन होगा।





भारतीय मीडिया का सारा ध्यान इस बात पर है कि क्या भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हाथ मिलाएंगे और कुछ बात करेंगे जैसाकि मोदी ने नवाज शरीफ के साथ किया था या फिर दोनों दूरी बनाये रखेंगे। मोदी के लिए पाकिस्तान से बातचीत बस एक छोटा मसला होगा क्योकि इस सम्मेलन में कहीं ज्यादा बड़े और महत्वपूर्ण मुद्दे कवर किए जाएंगे। इन मुद्दों में पाकिस्तान की कोई भूमिका नहीं होगी क्योंकि पाक आर्थिक रूप से बमुश्किल जीवित रहने की स्थिति में है और उसे बहुत अधिक अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

इस सम्मेलन का आयोजन उस वक्त हो रहा है जब रूस और चीन ने अपनर रणनीतिक साझीदारी को बड़ी ऊंचाई तक पहुंचा दिया है और अमेरिका चीन और रूस दोनों को ही टारगेट कर रहा है। साथ ही अमेरिका और चीन के बीच तनाव भी लगातार बढ़ ही रहा है। हाल ही में चीन के विवादित समुद्री क्षेत्र में एक रूसी नौसेना जहाज एक अमेरिकी डिस्ट्रॉयर के करीब पहुंच गया था जो एक तरफ अमेरिका और दूसरी तरफ एक साथ रूस और चीन के बीच बढ़ती दूरी का संकेत मिलता है। यह घटना यह बताने का एक माध्यम है कि किसी खतरे की सूरत में रूस और चीन सैन्य रूप से हाथ भी मिला सकते हैं।

विवाद के दूसरे मुद्दों में ईरान और वेनेजुएला पर प्रतिबंध शामिल हैं। इन दोनों देशों को रूस और चीन का समर्थन हासिल है और इन पर प्रतिबंधों के कारण रूस और चीन की प्रोक्योरमेंट (खरीद) बाधित हो गई है। अफगानिस्तान भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है जिसके मामले में रूस और चीन दोनों ही अमेरिका पर इल्जाम लगा रहे हैं कि वह आईएसआईएस को अपनी मौजूदगी दर्ज करने में सक्षम बना रहा है और तालिबान को उनसे निपटने में रोक रहा है। अफगानिस्तान की रूस से निकटता है और उसकी सीमाएं चीन के शिनजियांग से लगती हैं जहां चीन वर्तमान में अपनी मुस्लिम आबादी से सख्ती से पेश आ रहा है।

भारत एक बड़ी शक्ति है जो अमेरिका, चीन एवं रूस जैसी सभी बड़ी ताकतों के साथ अपने संबंधों को संतुलित बन कर रखने में सफल रहा है। वह ईरान से तेल और रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम की खरद पर अमेरिकी दबाव से जूझ रहा है। भारत ने ईरान से तो तेल की खरीद में कटौती कर दी है लेकिन रूस से अपनी खरीद पर झुकने से इनकार कर दिया है। इसके साथ-साथ  भारत अमेरिका का एक रणनीतिक सहयोगी देश भी है और बड़े सैन्य अभ्यासों में अमेरिकी बलों के साथ सहभागिता करता है जिसमें से अधिकांश अभ्यासों का उद्देश्य चीन पर अंकुश लगाना है।

भारत आतंकी समूहों खासकर पाकिस्तान की जमीं से पैदा होने वाले आतंकियों पर अंकुश लगाने का भी जोरदार पक्षधर रहा है। चीन, जिसने हर अवसर पर पाकिस्तान का समर्थन किया है, कभी नहीं चाहेगा कि भारत इस फोरम में पाकिस्तान को जलील करे। पाकिस्तान का हमेशा एक ही एजेंडा रहा है कि वह भारत के साथ बातचीत करना चाहता है और सौदेबाजी के अपने पक्ष को स्वीकार किए बिना चाहता है कि कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव लागू हो जाए। भारत पाकिस्तान की मांगों की अनदेखी करता है क्योंकि शिमला समझौते ने इसे विवाद को द्विपक्षीय बना दिया है। इसलिए, भले ही मोदी और इमरान खान के बीच बातचीत होती भी है तो यह केवल औपचारिकता होगी या इसका कूटनीतिक रास्ता खोलने पर केवल सीमित प्रभाव पड़ेगा। भारत तबतक बातचीत के लिए तैयार नहीं होगा जबतक पाकिस्तान द्वारा आतंकी समूहों पर शिकंजा कसने के इरादे स्पष्ट और भरोसेमंद प्रतीत नहीं होते।

दूसरे सदस्य देशों के साथ बातचीत व्यापार को बढ़ाने एवं सहायता करने से संबंधित होगी जैसाकि भारत ने किर्गीस्तान को तब 100 मिलियन डॉलर की रक्षा ऋण सहायता उपलब्ध कराई थी जब उसके राष्ट्रपति मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में उपस्थित हुए थे। प्रमुख चर्चाएं भारत, चीन और रूस के बीच होंगी जिसका प्रभाव वर्तमान में अमेरिका द्वारा पैदा किए जा रहे वैश्विक दबाव पर पड़ सकता है।

इस जटिल परिदृश्य में  हम एससीओ से क्या उम्मीद कर सकते हैं? पाकिस्तान और आतंकवाद का केवल नाम मात्र जिक्र किया जाएगा जबकि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध एवं हाल ही में ट्रम्प द्वारा शुरू किया गया अमेरिकी व्यापार सुरक्षावाद को अधिक महत्व दिया जाएगा। भारत, चीन और रूस के बीच जिस दूसरे पहलू पर बातचीत की जाएगी, वह ईरान और वेनेजुएला जैसे देशों के साथ भुगतान के वैकल्पिक रास्तों के सृजन के द्वारा अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों से बचने या बाईपास करने के माध्यमों से निर्धारण से संबंधित होगा।

आगामी प्रमुख चर्चाओं में भारत एक प्रमुख भूमिका का निर्वाह करेगा क्योंकि उसके पास वैश्विक परिदृश्य को बदलने की अर्थव्यवस्था एवं क्षमता है। इसलिए, रूस तथा चीन दोनों ही भारत का समर्थन और सहयोग चाहेंगे। सवाल यह है कि क्या इस सम्मेलन से ऐसा कुछ ठोस परिणाम हासिल होगा जो एकतरफा प्रतिबंधों में संशोधन ला सके और अमेरिका द्वारा थोपे हुए दबावों को कम कर सके? अगले दो दिनों में इसका जवाब मिल जाएगा।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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