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अरुणाचल सीमा पर अगला मोर्चा कैसा हो ?

अरुणाचल के नजदीक चीन सीमा
अरुणाचल के नजदीक चीन सीमा (सौजन्य- गुगल)

अरुणाचल प्रदेश में भारत से लगती सीमा पर चीन द्वारा बुनियादी ढांचे के विकास की खबरें लगातार सुर्खियों में रही हैं और भारत भी इसका जवाब इस क्षेत्र में सेना की तैनाती में बढ़ोतरी द्वारा देता रहा है। डोकलाम में लंबे समय तक चला गतिरोध भले ही एक बड़ा उदाहरण था, लेकिन कम अवधि की ऐसी घटनाएं अरुणाचल प्रदेश एवं लद्दाख में नियमित रूप से हो रही हैं। अरुणाचल प्रदेश की सीमा से सटे तिब्बत में चीनी सड़क ढांचा कई मायने में हमारी तुलना में हमेशा ही बेहतर रहा है और यही वजह है कि चीन की सेना में हमेशा बेहद तेजी से आगे बढ़ने की क्षमता मौजूद रही है। सैन्य टुकड़ियों के लिए सुविधाओं में बढोतरी हमेशा जारी रहने वाली कवायद रही है जिसे दोनों ही देश अक्सर अंजाम देते रहे हैं।





सैन्य संचालनों के पूर्व महानिदेशक एवं जीओसी 33 कोर जनरल विनोद भाटिया ‘फोर्स’ पत्रिका के एक लेख में लिखते हैं, ‘भारत तिब्बत सीमा से लगे हुए क्षेत्रों में सड़क बनाने तथा बुनियादी ढांचों के विकास से अब तक गुरेज इसलिए करता रहा कि सड़कों की गैरमौजूदगी से चीनी खतरा कम होगा और अगली बार लड़ाई होने की सूरत में यह उसे भारतीय क्षेत्र में और गहरे प्रवेश करने से रोकेगी।’ यही वजह थी कि कई दशकों तक भारत ने इस क्षेत्र में ढांचागत विकास कार्यों में धीमी गति बनाये रखी जबकि चीन इन क्षेत्रों में लगातार बुनियादी ढांचों के विकास में जुटा रहा।

हमारा सड़क निर्माण केवल घाटियों में है जहां हमारे सैनिक बड़ी तादाद में तैनात थे। सरकार द्वारा गठित चाइना स्टडी ग्रुप ने 73 सड़कों की संस्तुति की थी जिनका निर्माण 2012 तक पूरा हो जाना था, जिसे बाद में संशोधित कर 2019-2020 तक बढ़ा दिया गया। इनमें जुलाई, 2017 तक केवल 30 सड़कों का निर्माण हो पाया था। आसान लफ्जों में कहें तो, जहां चीनी सेनाएं तुरंत सड़कों पर आ धमकेंगी, वहीं भारतीय सेनाएं पैदल चल कर वहां पहुंचेंगी। स्वाभाविक रूप से इससे हम नुकसान की स्थिति में हैं। इसी प्रकार, ऐसे गतिरोध की स्थिति में सैनिकों की तैनाती का रखरखाव मुश्किल हो जाता है।

भारतीय मोर्चों और टुकड़ियों के रहने की जगहों का विकास किया गया है और वहां स्थित सैन्य टुकड़ियों के लिए सुविधाओं में बढोतरी की गई है। ज्यादातर मामलों में चीनी सेनाएं स्थायी रूप से वहां जमी रहीं हैं और आगे बढ़ कर उन क्षेत्रों की गश्त और चौकसी करती रहीं जिन पर वे दावा करते हैं। सीमा के निकट उनका सीमित बुनियादी ढांचा था। अब चीन ने भी भारतीय चौकियों के निकट अपने जवानों के लिए ऐसी संरचनाओं का निर्माण करना शुरु कर दिया है। इसका तात्पर्य यही होगा कि या तो उसकी योजना सेना को आगे बढ़ाने की है या वह तनाव की अवधियों समेत भविष्य में होने वाले किसी संभावित संघर्ष की स्थिति से निपटने के लिए रिहायशी जगहों का निर्माण कर रहा है।

बुनियादी ढांचों का मतलब केवल रिहायशी जगहों का निर्माण करना ही नहीं है बल्कि उनमें गोला बारूद, आपूर्तियों समेत युद्ध के समय के दूसरे भंडार भी शामिल हैं। ऑपरेशन शुरू करने की योजना बनाने वाली किसी भी सेना के लिए भंडारों एवं हथियारों को लाने-ले जाने में काफी समय लगता है। आम तौर पर पहले चीन की सेना सीमा से काफी पीछे रहती थी क्योंकि आगे रहने से उसकी आवाजाही पर नजर रखी जा सकती थी और कार्रवाई की जा सकती थी। लेकिन अब हथियारों एवं भंडारों को आगे बढ़ाने में इसमें कम समय लगेगा और इसलिए अब भारत को अधिक सावधान रहने की जरूरत है।

पहले जब चीन अपनी सेना को सीमा से पीछे काफी दूरी पर रखता था तो उसकी वजह यह थी कि उसे भारत की तरफ से किसी प्रकार के हमले का कोई खतरा या आशंका नहीं थी क्योंकि भारत का तिब्बत के किसी भूभाग पर कोई दावा नहीं है। उसकी रक्षात्मक ढांचागत संरचनाएं भी बेहद कम थीं। दूसरी तरफ, भारत को हमेशा अपनी सेनाओं को तैयार रखना पड़ता था क्योंकि उसे चीन द्वारा किसी हमले की सूरत में हमेशा तैयार रहने की जरूरत थी। अगर दर्रों की लगातार हिफाजत नहीं की जाती तो उन पर कब्जा कर लिया जाता और चीन को बढ़त हासिल हो जाती।

यही वजह है कि भारतीय सेनाएं बेहद दुष्कर प्रकृति व मौसम, दुर्गम घाटियों तथा निम्न गुणवत्ता वाली सड़कों के बावजूद हमेशा वहां तैनात रहती हैं। कुछ भारतीय चौकियों को हमेशा वायुसेना की निगरानी के तहत रखा जाता है जबकि सैन्य टुकड़ियां पैदल गश्त लगाती रहती हैं। किब्बिटु पर मीडिया की खबरों में इस ओर इंगित किया गया है कि नदी के एक ओर ही सड़क है जबकि सैन्य टुकड़ियां नदी के दोनों तरफ तैनात हैं।

भारत हमेशा ही चीनी इरादों को लेकर आशंकित रहा है और उसने प्रमुख सामरिक स्थलों पर सेना की तैनाती में बढ़ोतरी करनी शुरू कर दी है। हम चीन द्वारा उसके अपने क्षेत्र में बुनियादी ढांचों के निर्माण पर सवाल नहीं उठा सकते, लेकिन उसके वास्तविक इरादों पर संदेह की वजह से हमें तैयार रहने की भी जरूरत है। हमसे बेहतर होने की वजह से चीनी सड़कें दुर्गम घाटियों तक उनकी पहुंच आसान बना देती हैं जबकि हम केवल कुछ अवसरों पर ही गश्त द्वारा उन तक पहुंच पाते हैं और हमेशा उन पर नजर नहीं रख पाते।

आखिर चीन के इरादे हो क्या सकते हैं? 1962 की तरह अब पूरे युद्ध की आशंका नहीं है क्योंकि अब भारत तब की तरह कमजोर देश नहीं है। एक संभावना यह हो सकती है कि भारतीय सीमा तक मजबूत गश्त उनके उन दावों को सही ठहराने की कोशिश हो सकती है। इस प्रकार की गश्त लंबे समय तक बनी रहेंगी या इस क्षेत्र में अपने इरादों की मजबूत झलक प्रदर्शित करने के बाद वे वापस लौट जांएंगे, यह एक मूक प्रश्न है। एक संभावना यह भी हो सकती है कि इस प्रकार कम जगहों तक सीमित, छोटी-छोटी झड़पें उनके द्वारा एक प्रकार का संदेश देने की कोशिश भर है। किसी भी सूरत में दोनों देश बहुत अधिक तनाव बढ़ाने का प्रयास नहीं करेंगे जिससे कि खुल कर युद्ध करने के हालात पैदा हो जाएं।

इसी इरादे से भारत अब इस क्षेत्र में अपनी गश्त बढ़ा रहा है और सेना की तैनाती में और बढ़ोतरी कर रहा है जिसकी खबरें लगातार मीडिया में आ रही हैं। डोकलाम ऐसी इकलौती घटना थी जिसे कोई भी देश अब दुहराना नहीं चाहेगा। इसके अलावा कोई भी देश स्थानीय स्तर से अधिक तनाव बढ़ाने का इच्छुक नहीं होगा। दोनों देशों द्वारा घोषित ‘पहला उपयोग नहीं (नो फर्स्ट यूज)’ की नाभिकीय नीति के कारण इस बात की कोई आशंका नहीं है कि एक खास बिंदु से अधिक तनाव बढ़ पाएगा।

इस बीच, सड़क ढांचा, जो सेनाओं को त्वरित गति से आवाजाही में सक्षम बनाएगा, के विकास में विशेष निगरानी के साथ तेजी लाए जाने की जरूरत है। पहले इसमें इसलिए देरी हुई थी कि भारत के पास चीनी खतरे का मुकाबला करने के लिए जरूरी सामर्थ्य और क्षमता नहीं थी। जैसे ही इस सामर्थ्य में बढ़ोतरी होने लगी, चीन का मुकाबला करने का भारत का साहस भी बढ़ता गया। चीन की आक्रामक भाव-भंगिमाओं और कार्रवाइयों का मुकाबला करने की क्षमता विकसित करने में कामयाब होने के बाद ही चीन भारत को एक बराबरी वाला प्रतिद्वंदी मानेगा और इस प्रकार के दुस्साहसों से परहेज करेगा।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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