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पुलिस में साप्ताहिक अवकाश की पहल

छत्तीसगढ़ पुलिस

छत्तीसगढ़ पुलिस ने सरगुजा जिले में पुलिसकर्मियों के लिए साप्ताहिक अवकाश की शुरुआत कर एक कारगर व सार्थक पहल की है। इस अवकाश का सीधा लाभ पुलिसकर्मियों के साथ-साथ उनके परिवार के सदस्यों को इसलिए मिलेगा कि कामकाजी घंटे तय हो जाने से परिवारिक जीवन में संतुलन व सामंजस्य स्थापित होगा। इससे पुलिसकर्मी तथा परिवार के सदस्यों में लगभग तनावरहित वातावरण बनेगा जिसका असर सभी की कार्य कुशलता पर पड़ेगा। छत्तीसगढ़ में विधासभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने जन घोषणा पत्र में पुलिसकर्मियों के लिए साप्ताहिक अवकाश देने की बात कही थी जिसे पिछले रविवार से सरगुजा जिले में लागू कर दिया गया है। सूबे की चुनी हुई राजनीतिक सत्ता तथा पुलिस का यह एक सराहनीय कदम माना जाएगा। पुलिस में कामकाज के घंटे तय नहीं हैं। मौजूदा भारतीय पुलिस अधिनियम 861 के हिसाब से पुलिस को 24 घंटे ड्यूटी में माना जाता है। अमूमन ऐसा होता भी है। देखा गया है कि ऊपर अफसर से लेकर नीचे सिपाही तक एक ही वातावरण में काम कर रहे होते हैं। अधिकारी वर्ग तो वाहन, आवास जैसी सुविधाओं के बूते पर आराम वगैरह कर लेता है तथा मन शरीर को काम-काज के लायक बना लेता है। लेकिन निचले स्तर का स्टॉफ काम की अधिकता में अवकाश नहीं ले पाता। छुट्टियां न मिल पाने से वह कई-कई दिन घर नहीं जा पाता। बिना आराम किए ड्यूटी पर तैनाती का असर उनकी कार्यशैली पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।





दरअसल देखा जाए तो आज पूरे देश में पुलिस बल की भारी कमी है। देश का ऐसा कोई भी राज्य नहीं है जहां आबादी के अनुपात में प्रयाप्त पुलिस संख्या हो। केंद्रीय गृह मंत्रालय कि एक रिपोर्ट के मुताबिक तय पद के हिसाब से पूरे देश में 22,09,027 पुलिसकर्मी होने चाहिए लेकिन हैं मात्र 6,75,115 । रिक्त पदों की इतनी बड़ी खाई का असर मौजूदा पुलिसकर्मियों के व्यवहार व कामकाज पर पड़ना स्वाभाविक है। संविधान के मुताबिक पुलिस राज्य का विषय है। रिक्त पदों की भरने की जिम्मेदारी राज्यों की ही है। लेकिन राज्यों की अनदेखी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से बात वहीं की वहीं है। विडम्बना तो यह है कि पुलिसकर्मियों के रिक्त पदों को भरने के लिए सुप्रीम कोर्ट को आदेश देने पड़ रहे हैं। बावजूद इसके इस बाबत रफ्तार बेहद मंद है, यह चिंता का विषय है। राज्य सरकारों को इस मसले पर गंभीरतापूर्वक काम करने की पहल शीघ्र करनी होगी।

आम चुनाव संपन्न हो चुके हैं लिहाजा नई सरकार के गठन के बाद केंद्र सरकार की यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि पिछले साल देश की पुलिस को आधुनिक बनाने की शुरू की गई योजना को और गति दे। केंद्र और राज्यों को इस बात को बेहद संजीदगी से महसूस करना होगा कि पुलिस आंतरिक सुरक्षा की पहली कड़ी है। पुलिसकर्मियों के मन व शरीर को स्वस्थ्य बनाए बिना उनसे आदर्श कार्यकुशलता की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है? तनाव, दबाव और खिंचाव के बीच आठ घंटे से ज्यादा की ड्यूटी उन पर प्रतिकूल असर डालती है। फिर गली-मुहल्ले की चौकसी से लेकर नक्सलवाद, आतंकवाद, उग्रवाद जैसी चुनौतियों के बीच कानून-व्यवस्था को भला पुख्ता कैसे किया जा सकता है ? अभी केवल केरल पुलिस में शिफ्ट के आधार पर ड्यूटी होती है। मध्यप्रदेश के पांच थानों में इसका सफल प्रयोग किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय का दावा है कि सन् 2020 तक पुलिसकर्मियों की आठ घंटे की ड्यूटी तय हो जाएगी। लेकिन दावों को अतिशीघ्र जमीन पर उतारने का काम केंद्र व राज्य सरकारों को मिलकर करना होगा। यह तो तय है कि साप्ताहिक अवकाश से पुलिसकर्मिय़ों को घर-परिवार व समाज में सामंजस्य बिठाने में मदद मिलेगी। और यही सामंजस्य कार्य स्थल पर कार्य संस्कृति और बेहतर बनाने में सहायक होगा। छत्तीसगढ़ पुलिस की तरह देश के अन्य राज्यों की पुलिस को भी ऐसी पहल करने की जरूरत है।

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