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जवानों के मामले में संजीदगी की तत्काल जरूरत

कश्मीर में सीआरपीएफ

कई बार बेहद अजीब और हैरत में डालने वाली खबरें आती हैं कि सरहद और आंतरिक सुरक्षा में तैनात तथा मुस्तैदी से अपने कर्तव्य का पालन कर जवानों को स्वयं के इलाज और कई बार अन्य मसलों में उचित न्याय नहीं मिल पाता। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के जख्मी जवान मनोज तोमर की घटना को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। वर्ष 2014 में छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी में नक्सलियों से लोहा लेते हुए सीने तथा पेट पर सात गोलियां झेलने वाले जवान मनोज तोमर अपने पेट से बाहर आंतों को पालिथिन में लपेटे हुए उचित इलाज के लिए दर-दर भटकते रहे और उन्हें न्याय तब मिला जब पूरा मामला मीडिया में आया। यह सैनिकों-जवानों के मानवाधिकार तथा उनके सम्मान से जुड़ा मामला है। निश्चय ही इस मसले पर और इस तरह के अन्य मसलों पर सरकार और समाज दोनों को ही खुले मन से विचार करने की जरूरत है ताकि भविष्य में इस तरह की बेचैनी पैदा करने वाली घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।





इस पूरे मसले में हैरानी की बात यह है कि जख्मी जवान चार वर्ष तक उचित न्याय तथा जरूरी इलाज के लिए अपने सशस्त्र बल के अधिकारियों समेत बल के मुखिया केन्द्रीय गृहमंत्री के दरवाजे तक भटकता रहा तथा उसे केवल आश्वासन मिलता रहा और इलाज के संबंधित पूर्व नियमों का हवाला दिया जाता रहा। क्या यह उचित था, न्याय संगत था? आज जब पूरा मामला मीडिया में आ गया है तो जवान के गृहनगर मुरैना (मध्य प्रदेश) में घर जाकर वहां के कलेक्टर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की 10 लाख रुपये की आर्थिक मदद तथा जरूरत पड़ने पर विदेश में चिकित्सा कराने की बात कह रहे हैं। संबंधित सशस्त्र बल के आला अधिकारी भी जवान के घर जाकर बेहतर इलाज करवाने की बात कर रहे हैं।

यह ठीक है इस पीड़ित जवान के समुचित इलाज का मामला जल्द निबट गया। जवान मनोज तोमर नई दिल्ली एम्स में भर्ती हैं और उनका इलाज चल रहा है। पर ऐसे ही अन्य मामलों पर सरकार, सशस्त्र बलों, सेना के सभी प्रमुखों को बारीकी से गौर करने की है। इस जख्मी जवान का सही इलाज इसलिए नहीं हो रहा था कि सशस्त्र बल के इलाज संबंधी नियम कानून आड़े आ रहे थे। ऐसे में सोचने की बात और अमल करने की बात यह है कि जो भी जवान या सैन्यकर्मी देश की रक्षा के लिए अदम्य साहस, जाबांज मनोदशा के साथ हर पल मौत का सामना करने को तत्पर रहते हैं, उनके घायल होने या शहीद हो जाने की स्थिति में सर्वोच्च नियम तो घायल के बेहतर इलाज अथवा शहीद परिवार के बाल-बच्चों की उचित देखभाल व परवरिश का होना चाहिए। हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि बर्फीले पहाड़, तपते रेगिस्तान, खतरनाक जंगलों, सुदूर आकाश तथा सागर की गहराइयों में उनके जाबांज कर्तव्य पालन से ही हम उत्सव मनाते हैं, चैन की नींद सोते हैं तथा सामान्य जीवन जीते हैं।

लिहाजा समाज को भी तार्किक ढंग से और खुलेमन से सोचना होगा कि शहादत के बाद या सरहद में तैनाती के दौरान परिवार व माता-पिता की स्थिति क्या होती है और हमें किस तरह का सहयोग करना चाहिए ताकि बच्चों की परवरिश, भूमि विवाद, बूढ़े माता-पिता की देखभाल, आश्रितों की लिखाई-पढ़ाई सुचारू रूप से हो औऱ सैनिक का परिवार दोबारा जिन्दगी जीने की राह पर चल सके। कई बार देखा गया कि गांव-देहात कोर्ट-कचहरी, थाना-पुलिस से जुड़े कर्मचारी भी सैनिक या सैन्य परिवारों को संबंधित मामले में बेवजह परेशान करते हैं। ऐसे में सभी को इस तरह के मसलों में संजीदगी से सोचने की जरूरत है।

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