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कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन पर यूएन की रिपोर्ट पूरी तरह छलपूर्ण

UN की कश्मीर की रिपोर्ट

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (यूएनएचआरसी) ने 14 जून को पहली बार कश्मीर सीमा के दोनों तरफ मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर एक रिपोर्ट जारी की। चूंकि दोनों में से किसी भी देश ने आयोग को अपने हिस्से तक पहुंचने की इजाजत नहीं दी थी, इसलिए यह रिपोर्ट ‘सुदूर निगरानी‘ पर आधारित थी। ‘सुदूर निगरानी‘ शब्द अपने आप में सवाल खड़े करने वाला है क्योंकि इसमें रिपोर्ट के किसी भी एजेंसी, देश या व्यक्तियों द्वारा प्रभावित होने की पूरी गुंजाइश रहती है। किसी भी एजेंसी, देश या संगठन द्वारा प्रस्तुत डाटा को इसके अंतिम निष्कर्षों को निर्धारित करने के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकता है। जाहिराना तौर पर यह डाटा पेश करने के पीछे राष्ट्रविरोधी तत्वों की भूमिका है।





इस रिपोर्ट में 16 जुलाई से 18 अप्रैल तक की अवधि को शामिल किया गया है। इस सवाल का जवाब दिया जाना अभी बाकी है कि 16 जुलाई क्यों? दशकों तक अपेक्षाकृत शांत बने रहने के बाद एक खूंखार आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद आंतरिक हिंसा में अचानक काफी तेजी आ गई और यह स्पष्ट था कि पाकिस्तान उन हिंसक लपटों को भड़काने के लिए पैसे अपने छद्म प्रतिनिधियों के माध्यम से दे रहा था। इस रिपोर्ट की शुरुआत 2013 से या इससे भी पहले से की जानी चाहिए थी। ऐसा लगता है कि इस तारीख का चुनाव सोच समझ कर किया गया था और यूएनएचआरसी को दिया गया था। रिपोर्ट में कायदे से छद्म युद्ध सहित हिंसा में अचानक आई तेजी के पीछे के तर्कसंगत कारणों को शामिल किया जाना चाहिए था, लेकिन इन पहलुओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।

इसके अतिरिक्त, दुनिया इससे बखूबी वाकिफ है कि भारत को पाकिस्तान या अन्य देशों की तरह अपनी जमीन से पैदा हुए आतंकियों से नहीं लड़ना पड़ रहा है बल्कि यह भारत पर थोपा गया एक छद्म युद्ध है। एक राष्ट्र के रूप में भारत को आतंकवादियों की घुसपैठ से अपनी सीमाओं की हिफाजत करने की जरूरत है। दूसरी तरफ, पाकिस्तान के सामने ऐसा कोई खतरा नहीं है। इसलिए भारत को पाकिस्तान में पैदा, प्रशिक्षित और वित्तपोषित आतंकियों का सामना करना पड़ता है। यह एक ऐसा पहलू है जिसे रिपोर्ट में नजरअंदाज कर दिया गया है, क्योंकि रिपोर्ट बनाने का उद्देश्य इसे भारत विरोधी ही बनाना था।

दिलचस्प बात यह है कि रिपोर्ट में सेना पर मानवाधिकार उल्लंघनों का आरोप लगाया गया। अगर इसने सुदूर निगरानी के जरिये आंकड़ों का मिलान किया होता तो इसे भारतीय सेना के खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघनों के विवरणों का भी मिलान करना चाहिए था जो सार्वजनिक क्षेत्र (पब्लिक डोमेन) में भी उपलब्ध हैं। वर्ष 1994 से मई 2018 तक देश के सभी भागों से सेना के खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघनों के कुल 1770 आरोप लगाए गए हैं। इनमें से 1725 की गहराई से जांच की गई है। जांच के बाद, 1625 आरोप निराधार पाए गए। जो शेष मामले सही पाए गए उनमें 153 जवानों को दंडित किया गया है एवं 53 मामलों में पीडि़तों को मुआवजा भी दिया जा चुका है। इन विवरणों का जिक्र किया जाना चाहिए था लेकिन इनकी अनदेखी कर दी गई है।

इस रिपोर्ट में पीओके को आजाद कश्मीर कहा गया है। इस लफ्ज का इस्तेमाल केवल पाकिस्तान द्वारा किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र समेत दूसरे देश इसके लिए पाकिस्तान की हुकूमत वाला कश्मीर शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। सवाल फिर खड़ा होता है कि आखिर इस शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया? गिलगिट बाल्टिस्तान को अंतरराष्ट्रीय रूप से पीओके के एक हिस्से के रूप में स्वीकार किया गया है। इस रिपोर्ट में इसके बारे में एक अलग प्रांत का संकेत दिया गया है। इसलिए, यह जाहिर है कि इस रिपोर्ट को यूएनएचआरसी द्वारा तोड़ा-मरोड़ा गया है जिससे कि यह पाकिस्तान की जरूरतों को पूरा करे या पाक द्वारा इसे छद्म तरीके से लिखा गया है।

इस रिपोर्ट में कश्मीर में सशस्त्र समूहों की बात की गई है। सशस्त्र समूहों से देश में पैदा आतंकियों से अराजकता का संकेत मिलता है, किसी छद्म युद्ध का नहीं। जब नगालैंड में अराजकता अपने चरम पर थी, उस वक्त सशस्त्र समूहों का वजूद था। कश्मीर के आतंकी समूह पाकिस्तान में पैदा, वहीं प्रशिक्षित, वित्तपोषित तथा पाकिस्तान द्वारा भारत में घुसपैठ कराए गए और इस क्षेत्र में भेजे गए आतंकवादी हैं।

रिपोर्ट में कश्मीर में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (अफस्पा) लागू किए जाने की आलोचना की गई। किसी छद्म युद्ध से निपटने, किसी आंतरिक अराजकता को शांत करने के लिए किस प्रकार, प्रकृति या स्तर के बल का उपयोग किया जाए, इसका निर्धारण सरकार करती है। वास्तविकताओं से अनभिज्ञ, इच्छुक दलों द्वारा उपलब्ध कराई गई सीमित सूचनाओं पर निर्भर किसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी को टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। सेना कभी भी किसी अशांति से निपटने का अंतिम उपाय होती है और हमेशा रहेगी। किस प्रकार की सुरक्षा उपलब्ध कराई जानी है, इसका निर्धारण सरकार द्वारा ही किया जाता है।

यूएनएचआरसी के प्रमुख ZeidRa’ad Al Hussein ने इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर में अपनी रिपोर्ट को न्यायसंगत ठहराने का भी प्रयास किया। अपने लेख में उन्होंने सही शब्दावलियों का प्रयोग किया, जिसकी रिपोर्ट में अनदेखी की गई थी। अपनी बात को न्यायसंगत ठहराने का उनका प्रयास महज इधर-उधर की बात करने की कोशिश थी क्योंकि उसमें सरकार द्वारा की गई किसी भी आलोचना या आपत्तियों का कोई समाधान या जवाब नहीं दिया गया था।

भारत सरकार और सेना प्रमुख ने इस रिपोर्ट की बिल्कुल सही आलोचना की है कि यह भेदभावपूर्ण, एकतरफा और क्षेत्र की वास्तविकताओं को समझे बिना बनाई गई है। जाहिर है कि यह रिपोर्ट पाकिस्तान की किसी एजेंसी द्वारा तैयार की गई है। कुछ समूहों के यह कहने के बावजूद कि सरकार को निश्चित रूप से इस रिपोर्ट पर कार्रवाई करनी चाहिए, असली मसला यही है कि आप कैसे किसी रिपोर्ट पर विचार या कार्रवाई करेंगे जिसमें आधी सच्चाई ही बयां की गई है और जो किसी ऐसे देश को संतुष्ट करने के लिए बनाई गई है जहां आतंकी समूहों का प्रयोग सरकार की नीति के एक हिस्से के रूप में किया जाता है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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