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दो यु़द्ध स्मारक : एक के लिए दूसरा न हो नजर अंदाज

इंडिया गेट
इंडिया गेट (फाइल फोटो)

देश भर से मांग उठती रही है कि जिन सैनिकों ने देश की सेवा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए, उनके लिए एक युद्ध स्मारक बनाये जाने की जरूरत है। इस मांग के आधार पर सरकार ने अक्तूबर, 2015 में एक नए युद्ध स्मारक के निर्माण की घोषणा की। यह मुद्दा दशकों से लंबित रहा था और प्रत्येक सरकार के पास इसे लटकाए रखने की उनकी अपनी अपनी दलीलें थीं। यहां तक कि शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती दिल्ली सरकार ने इसके निर्माण को इसलिए मंजूरी नहीं दी थी कि उसका मानना था कि एक-दूसरे के निकट दो युद्ध स्मारकों से इंडिया गेट पर उपलब्ध खुले स्थान में कमी आ जाएगी।





अंततः इस स्मारक का निर्माण कार्य अब संपन्न होने के करीब है और उम्मीद है कि इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर इसका उद्घाटन भी हो जाएगा। इस स्मारक का निर्माण 22,600 सैनिकों को सम्मानित करने के लिए किया जा रहा है जिन्होंने स्वाधीनता प्राप्ति के बाद अपने प्राणों की आहूति दी है। इस स्मारक में इन सभी जवानों के नाम अंकित होंगे। इस स्थान के निकट ही एक युद्ध संग्रहालय का भी निर्माण किया जा रहा है जो जुलाई, 2020 तक तैयार हो जाएगा। इस परियोजना की कुल लागत 500 करोड़ रुपये आंकी जा रही है।

इंडिया गेट पर वर्तमान युद्ध स्मारक का निर्माण सन् 1931 में उन 82,000 सैनिकों को सम्मानित करने के लिए किया गया था जो प्रथम विश्व युद्ध तथा 1919 के Anglo-Afghan यु़द्ध के दौरान शहीद हुए थे। 1971 के युद्ध के बाद इसमें एक संयोजन किया गया था जिसमें काले संगमरमर में चबूतरे (प्लिंथ) पर एक उलटी राइफल पर लड़ाई में पहने जाने वाला हेलमेट लगाया गया।

सीएनजी द्वारा स्थायी रूप से प्रज्ज्वलित ज्योति और स्मारक के प्रत्येक ओर स्वर्णाक्षरों में ‘अमर जवान‘ उत्कीर्ण किए गए हैं। इसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा 26 जनवरी, 1972 को किया गया था और इसकी निगरानी चौबीसों घंटे तीनों सेनाओं के जवानों द्वारा की जाती है। ऐतिहासिक अवसरों पर यहां पुष्पांजलि अर्पित की जाती है और इसी स्मारक के आसपास गणतंत्र दिवस की परेड भी आयोजित की जाती है।

भारत को सशस्त्र बलों के अपने वीर जवानों, जिन्होंने आजादी के बाद देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर किए, को सम्मानित करने के लिए यु़द्ध स्मारक की आवश्यकता थी। प्रत्येक देश का अपना स्वयं का यु़द्ध स्मारक होता है और भारत सात दशक से प्रथम विश्व युद्ध के ब्रिटिश सरकार द्वारा निर्मित यु़द्ध स्मारक पर अपने शहीद जवानों को सम्मानित कर रहा था। नए यु़द्ध स्मारक के निर्माण के बाद इस मसले पर भी निर्णय करने की आवश्यकता होगी कि पहले वाले यु़द्ध स्मारक का क्या किया जाए और उसका किस स्तर तक रख-रखाव करने एवं देखभाल करने की जरूरत है।

दोनों यु़द्ध स्मारक भारतीय सैनिकों को ही सम्मानित करते हैं, हालांकि युद्ध काल की अवधि में अंतर हो सकता है लेकिन वे हैं तो भारतीय सैनिक ही। पहले के यु़द्ध स्मारक में 1971 के बाद किए गए संयोजन या बदलाव बने रहेंगे क्योंकि उन्हें हटाना या दूर करना मानकों के खिलाफ होगा। दोनों यु़द्ध स्मारकों में प्रज्ज्वलित ज्योति होंगी जिनका रखरखाव किए जाने की आवश्यकता है। हालांकि दोनों यु़द्ध स्मारक आसपास हैं, लेकिन युद्ध में अपनी जान की कुर्बानी देने वालों के प्रति सम्मान का भाव नए स्मारक के लिए ज्यादा होगा क्योंकि ये आजादी के बाद शहीद होने वाले जवानों को समर्पित स्मारक हैं। राजनीतिक रूप से वर्तमान सरकार पहले वाले यु़द्ध स्मारक की उपेक्षा कर सकती है क्योंकि नया स्मारक बनाने का फैसला उसी का है।

सशस्त्र बलों को अनिवार्य रूप से दोनों यु़द्ध स्मारकों की मर्यादा बरकरार रखनी चाहिए और इसलिए एक संयुक्त सेवा गार्ड स्थापित करने एवं दोनों में औपचारिक परंपराओं को बनाये रखने की आवश्यकता होगी क्योंकि दोनों ही स्मारक उन भारतीय जवानों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्होंने बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के लड़ाइयां लड़ीं। सेनाओं द्वारा किसी भी एक यु़द्ध स्मारक का नजरअंदाज किया जाना श्रेयस्कर नहीं होगा क्योंकि इसे विरोधों या प्रदर्शनों या यहां तक कि राष्ट्र विरोधी तत्वों द्वारा भी विरूपित या अपमानित किया जा सकता है।

इसलिए  सेनाओं के साथ मिल कर रक्षा मंत्रालय को दिशानिर्देश जारी करने की आवश्यकता होगी जिससे कि दोनों में किसी की भी उपेक्षा न हो सके। नए यु़द्ध स्मारक की स्थापना राष्ट्र की मांग थी, लेकिन आसपास में दो यु़द्ध स्मारकों की मौजूदगी से यह सवाल पैदा हो गया है कि पहले वाले यु़द्ध स्मारक के साथ क्या किया जाना चाहिए जिसने सात दशकों तक राष्ट्रीय यु़द्ध स्मारक की भूमिका का निर्वाह किया है। युद्ध संग्रहालय के तैयार हो जाने से नए यु़द्ध स्मारक की भव्यता और भी बढ़ जाएगी।

सेना मुख्यालय को इस मामले में आगे बढ़ कर कार्य करना चाहिए और प्रक्रियाओं की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए जो यह सुनिश्चित करे कि दोनों ही यु़द्ध स्मारकों का अच्छी तरह रखरखाव हो, उनका समुचित सम्मान किया जाए एवं उनकी समा देखभाल की जाए क्योंकि आखिरकार वे हमारे ही सैनिकों का तो सम्मान कर रहे हैं। एक के लिए दूसरे को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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