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सशस्त्र बलों को कमतर दिखाने की कोशिश ?

सशस्त्र बल

राज्यसभा सांसद श्री चंद्रशेखर द्वारा हाल में पूछे गए एक प्रश्न कि, क्या सरकार सशस्त्र बलों के लिए गैर-कार्यशील उन्नयन (एनएफयू Non-Functional Upgradation) को स्वीकृति देने पर विचार कर रही है, का रक्षा राज्य मंत्री ने नकारात्मक उत्तर दिया और कहा कि यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है। इस बीच, सशस्त्र बलों की आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए एक अलग एनएफयू का मुद्दा उठाने के मसले पर रक्षा मंत्रालय (MoD) ने अभी विचार भी नहीं किया है।





इसी के साथ-साथ रक्षा संसदीय समिति द्वारा एक रिपोर्ट भी जारी की गई जिसमें सेना के उप प्रमुख जनरल शरत चंद का हवाला देते हुए कहा गया कि रक्षा बजट आंवटन लंबित देनदारियों के भुगतान और सेना के रखरखाव के लिए भी अपर्याप्त था। यह सेना की तकलीफ भरी पुकार थी क्योंकि आज जब सेना के आधुनिकीकरण की सख्त जरूरत है, फंड की कमी से ऐसा हो नहीं पा रहा। अलावा इसके अनुबंध देनदारियों के भुगतान में डिफॉल्ट का अर्थ होता है शर्मिंदगी और कानूनी पचड़े जिससे सेना और राष्ट्र की छवि को नुकसान पहुंचता है।

ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी सेना प्रमुख ने फंड की कमी के प्रभाव के बारे में अपनी जुबान खोली है, जिसका सेना की तैयारी और आधुनिकीकरण से सीधा वास्ता है। उन्होंने बड़ी तकलीफ के साथ राष्ट्र को यह बताने की कोशिश की कि रक्षा बजट के 35 प्रतिशत हिस्से का उपयोग राष्ट्रीय विकास एवं सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है, जहां राज्य सरकारें पहुंचने में विफल रह जाती हैं। उन्होंने देश को फिर से इसका भरोसा दिलाया कि सेना के पास जो भी हथियार हैं, वह उनके साथ लड़ने को पूरी तरह प्रशिक्षित है।

लगभग इसी वक्त, सरकार ने एक पत्र भी जारी किया जिसमें कहा गया कि सशस्त्र बल के अधिकारियों को राशन के बदले राशन भत्ते के रूप में 97 रुपये का भुगतान किया जाएगा। इस पर कर भी लगेगा। कई लोगों का कहना था कि यह राशि जेल में बंद कैदियों को प्राप्त भत्ते से भी कम है जो 135 रुपये के हकदार हैं और सरकार का यह कदम सैन्य अधिकारियों के रूतबे को कम कर रहा है। ओआरओपी आंदोलन के 1,000 दिन से अधिक बीत चुके हैं पर सरकार की तरफ से उनकी उचित मांगों को स्वीकार करने के मामले में कोई भी प्रगति नहीं हुई है।

ऐसा लगता है कि उपरोक्त कार्रवाइयां सशस्त्र बलों की साख और क्षमता को कम करने की सरकार की व्यापक पहल का एक हिस्सा है। यह अकस्मात नहीं हो सकता कि वित्त मंत्री जो सभी वित्तीय व्यय को मंजूरी देते हैं तथा स्वयं दो बार इस सरकार में रक्षा मंत्री रह चुके हैं और सेना की शिकायतों एंव तकलीफों से पूरी तरह वाकिफ हैं।

एक साथ लिए जाने वाले इन फैसलों के विविध प्रभाव पड़ सकते हैं। सबसे पहली बात तो यह कि देश के सामने दो बड़े दुश्मनों से बढ़ रहे खतरों को देखते हुए सशस्त्र बलों की क्षमता जरूरत से कम हो सकती है। जिससे कि जोखिम बढ़ सकता है। संपूर्ण युद्ध होने की राह में बेशक नाभिकीय हथियार बड़ी बाधा बने हुए हैं लेकिन यह दुश्मनों से किसी स्थानीय स्तर पर किए जा रहे हमलों के प्रति सुरक्षा की गारंटी नहीं देंगे जैसा कि वर्तमान में हो रहा है।

दूसरा, इस कदम से भारत के सैन्य बलों की अंतर्राष्ट्रीय ख्याति पर भी प्रभाव पड़ सकता है। दुनिया भारत को चीन के विरूद्ध शक्ति संतुलन बनाये रखने के लिए एक बड़ी ताकत के रूप में देख रहा है। अंतर्राष्ट्रीय सैन्य बलों में भारत के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की होड़ सी मची हुई है और वे भारत के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास करने की योजना बना रहे हैं। इसके पीछे धारणा यही है कि भारत में चीन का मुकाबला करने की ताकत है। फंड की कमी से यह धारणा जल्द ही कम हो सकती है और दूसरे देशों की भारतीय समर्थन पाने की इच्छा क्षीण पड़ने लगेगी।

तीसरी बात यह है कि सशस्त्र बलों के अधिकारियों को NFU की मंजूरी नहीं देना उनके नैतिक बल को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारण रहा है। यह केंद्र सरकार की ऐसी एकमात्र सेवा है जिसे इस विशेषाधिकार से वंचित रखा गया है। रक्षा मंत्री को अपने नौकरशाह सलाहकारों को परे रख कर सेना की इस मांग को एक अलग मामले के रूप में आगे भेजने पर विचार करना चाहिए। वैकल्पिक रूप से, वे ऐसी अधिसूचना जारी करने में विफल रहे हैं जिसमें यह कहा गया हो कि एनएफयू किसी व्यक्ति के रुतबे को प्रभावित नहीं करता। इस प्रकार, वे नौकरशाही के दायरे के भीतर उस प्रभाव को खत्म कर सकते थे जो इसने पैदा किया है।

राशन भत्ते के रूप में 97 रुपये के भत्ते की घोषणा सैन्य अधिकारियों का सीधे तौर पर निरादर है। यह सरकार द्वारा आवंटित आंकड़ा था जब सेना के राशन के लिए सभी चीजों को केंद्र स्तर पर खरीद लिया गया था, जो राष्ट्रीय स्तर पर अनुबंधित था। व्यक्ति विशेष के तौर पर विचार करने पर यह राशि किसी कैदी को मिलने वाले भत्ते से भी कम है जिसने समाज के विरूद्ध कोई अपराध किया है। इस प्रकार आवंटित राशि एक तरह का निरादर है,  बजाए सरकार द्वारा दिए गए किसी अनुदान के। इससे यह धारणा जाहिर होती है कि सरकार सशस्त्र सैन्य अधिकारी की भोजन की जरूरतों को किसी सजायाफ्ता कैदी की जरुरत से भी कम आंकती है।

आश्चर्य की बात यह है कि रक्षा मंत्रालय, जिससे यह उम्मीद की जाती है कि वह सशस्त्र बलों की समस्याओं को दूसरे मंत्रालयों के सामने उजागर करेगा और उन्हें उनका न्यायोचित अधिकार दिलाने का प्रयास करेगा, ने इस मुद्दे पर पूरी तरह चुप्पी साध रखी है। उसने ऐसी टिपण्णी भी नहीं की है कि वह संबंधित मंत्रालय से संपर्क कर इस मुद्दे का समाधान करेगा। केन्द्रीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को यह विचार करने की जरूरत है कि उनके द्वारा उठाए गए कदमों से ही यह तय होगा कि सशस्त्र बल कितना सक्षम बना रहेगा और उसका मनोबल कितना ऊंचा होगा। क्षमता और मनोबल, दोनों ही सेना की ताकत को प्रभावित करते हैं। इनमें से किसी की भी अनदेखी नहीं की जा सकती।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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