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घाटी में अब बदलाव की बयार के संकेत

Jammu-kashmir

जम्मू-कश्मीर घाटी में संपन्न हुए स्थानीय निकाय चुनाव में भले ही कम मतदान हुआ हो या विभिन्न कारणों से यहां के बाशिंदों ने आगे बढ़-चढ़कर हिस्सा न लिया हो लेकिन इस दौर के चुनाव खत्म होने के बाद सरकार की उम्मीदें बढ़ गई हैं। चुनाव के बाद सूबे के स्थानीय निकायों तथा पंचायतों को केन्द्र सरकार से 4,335 करोड़ रुपये की धनराशि मिलने का रास्ता साफ हो जायेगा। इस धनराशि से शहरी निकाय और पंचायत स्तर पर विकास के काम हो सकेंगे। और अगर इस विपुल धनराशि का इस्तेमाल नेता और जिम्मेदार एजेंसियां पूरी प्रतिबद्धता व ईमानदारी से करेंगी तो कहा जा सकता है कि घाटी में जमीनी स्तर पर बदलाव की बयार बहेगी। यह शुभ संकेत है। घाटी में चुनाव का दूसरा दौर अभी बाकी है। नवंबर माह में पंचायत चुनाव होने हैं। हो सकता है कि हताशा और घोर निराशा से भरे आतंकी तथा इनसे जुड़े तत्व हिंसा की घटनाओं को अंजाम दें। लेकिन स्पष्ट संकेत इस बात के हैं कि राज्य का आम आदमी सुकून व विकास से जुड़ी जिंदगी जीना चाहता है।





दरअसल केन्द्र सरकार और राज्य के तमाम नेता यही चाहते हैं कि घाटी में हालात तेजी से सामान्य हों ताकि खून-खराबे का माहौल खत्म हो, आम आदमी मुख्यधारा में शामिल होकर सूबे व देश के विकास में सहभागी सके। कई दशक से घाटी में स्थितियां बेहद असामान्य हैं। युवाओं की एक पूरी की पूरी पीढ़ी ने वहां सामान्य जनजीवन नहीं देखा है। ये युवा हिंसा से भरी अप्रत्याशित घटनाओं को देख रहे हैं और उकसावे, बहकावे में आकर उन्हीं की हिफाजत में तैनात सैन्य बलों, सुरक्षा बलों और पुलिसकर्मी निशाना बना रहे हैं। यह चिंता का विषय है। सरकार ने सोची-समझी योजनाओं को जमीन पर उतारऩे के लिए नीतियों में इसीलिए बदलाव किया है। विकास कार्यों को रफ्तार देने के लिए पंचायतों के वित्तीय अधिकार बढ़ाए गए हैं। पहले पंचायतों को दस हजार रुपये खर्च करने का अधिकार था जो अब बढ़ाकर एक लाख रुपये कर दिया गया है। अलावा इसके इस बात की भी प्रबल संभावना जताई जा रही है कि मनरेगा, मिड-डे मील, आंगनबाड़ी, प्राथमिक उपचार जैसी 29 योजनाएं भी पंचायत के माध्यम से लागू की जाएंगी। यह विकास के जरिए शांति बहाली की ओर बढ़ता कदम होगा।

उधर सेना तथा सुरक्षा बलों द्वारा चलाया जा रहा ‘ऑपरेशन ऑल आउट’ आतंकवादियों पर बेहद भारी पड़ रहा है। आतंकवादियों की कमर टूटने लगी है। इस वर्ष 210 से भी ज्यादा आतंकवादी मौत के घाट उतारे जा चुके हैं। सर्दी से पहले उनके द्वारा की जाने वाली घुसपैठ सुरक्षा बल लगातार नाकाम कर रहे हैं। लिहाजा आतंकवादियों के आका भी चिंता, परेशानी और निराशा में हैं। मनोबल टूटने की वजह से वह अब मदद के लिए पाकिस्तान के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं। निश्चय ही यह केन्द्र सरकार और सुरक्षा बलों की मेहनत का परिणाम है। पर अभी भी लगातार सधे हुए आक्रामक तेवर से आगे बढ़ने की जरूरत है। यह समझना होगा कि सुरक्षा, शांति बहाली, विकास से जुड़ी चुनौतियां अभी बाकी हैं।

चुनाव के बाद जाहिर तौर पर आम नागरिक के वोट के बाद लोकतंत्र की ओर बढ़ने का रास्ता साफ होता है। सूबे में पंचायत चुनाव का आखिरी चरण 11 दिसंबर को पूरा होगा। उसके बाद केन्द्र व राज्य के नेताओं, जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल, सेना व सुरक्षा बलों की जिम्मेदारियां और बढ़ जायेंगी। घाटी के आम नागरिकों को भी इस बदलाव की बहती हवा के रुख को और तेज करने की जरूरत होगी।

 

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