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बेहद गंभीर मामला है ये..

आईटीबीपी
फाइल फोटो

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित नारायणपुर जिला स्थित कड़ेनार के भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के कैंप में हुई गोलीबारी के दौरान 06 जवानों की मौत एक बेहद गंभीर मामला इसलिए है कि देश की सुरक्षा सेना के साथ अर्ध सैनिकों पर भी टिकी हुई है। केंद्र सरकार को इस घटना की गंभीरता को देखते हुए तत्काल सभी कोणों से जांच करने की जरूरत है। फौरी तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि कैंप में तैनात मसुदुल रहमान ने साथी जवानों पर अंधाधुंध फायरिंग इसलिए कर दी की वह एक साल से छुट्टी पर नहीं गया था। लिहाजा वह तनाव में था या जवान को छुट्टी नहीं मिलने पर साथियों ने मजाक किया तो उसने आक्रोश में ऐसा कदम उठाया कि उसकी गोली से पांच अन्य साथियों की जान चली गई। बताया तो यह भी जा रहा है कि जुलाई में उसे छुट्टी मिली तो उसने दिसंबर के अंत में छुट्टी लेने की बात कही थी। उसकी 60 दिनों की छुट्टी मंजूर भी हो चुकी थी। यह सब जांच का विषय है।





हकीकत यह है कि बल के नियमों के अनुसार सभी कर्मचारियों को समय-समय पर छुट्टियां दी जाती हैं लिहाजा इस मामले में छुट्टी का न मिलना तनाव-आक्रोश के बाद साथियों को निशाना बना कर उनकी जान ले लेना भला यह कारण कैसे हो सकता है? अगर यह भी एक कारण बनता है तो इसकी भी जांच होनी चाहिए कि बल के जांबाज जवान तनाव, दबाव, खिंचाव में क्यों रहते हैं ? लेकिन जांच अन्य पहलुओं को ध्यान में रखकर भी होनी चाहिए। गौरतलब है कि नारायणपुर जिले के बारसूर पल्ली में सड़क बनाने का काम चल रहा है, जिसकी सुरक्षा में आईटीबीपी की बटालियन वहां एक साल से तैनात है। जवान मसुदुल एक साल से यही तैनात था और साल भर में कभी छुट्टी पर भी नहीं गया। अलावा इसके उसके खिलाफ अनुशासनहीनता या दूसरे जवानों से झगड़ा-झंझट का कोई मामला पहले कभी सामने नहीं आया। फिर उसने ऐसा जघन्य कदम क्यों उठाया ? आईटीबीपी के शीर्ष अधिकारियों के लिए यह चिंता और जांच का विषय है। इस तथ्य की जरा सी भी अनदेखी देश की एकता और अखंडता के साथ-साथ सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकती है।

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस अन्य अर्ध सैनिक बलों की तरह एक जांबाज, अनुशासित तथा उच्च कर्तव्यनिष्ठा के साथ देश की हिफाजत करता है। बेहद कड़ी ट्रेनिंग के बाद ये वीर-जवान तैयार होते हैं और देश के सेवा में समर्पित रहते हैं। इन जवानों में इस कदर परस्पर सहयोग, प्यार व भाई-चारा होता है कि बल सरहद से सड़क तक सबल-सशक्त दिखाई देता है। ऐसे में कड़ेनार शिविर की घटना एक जवान के इस तरह के आक्रोश का प्रतिफल कैसे हो सकती है ?

यह सही है कि सैन्यबलों व अर्ध सैनिक बलों में खुदकुशी तथा साथी जवानों को गोली मारने के मामले सामने आए हैं। आंकड़े बताते हैं कि बीते आठ वर्षों में यानी वर्ष 2011-18 के बीच भारतीय सशस्त्र बलों में 892 जवानों ने खुदखुशी की। इसमें सर्वाधिक संख्या भारतीय थल सेना की है। आंकड़े इस बात का भी खुलासा करते हैं कि साल 2012-15 के बीच आईटीबीपी व एसएसबी के 25 जवानों ने आत्महत्या की। यहां यह बात स्पष्ट रूप से हम सभी को समझनी होगी कि भारतीय सेना व सैन्यबलों के जांबाज जवान बदली चुनौतियों के बीच अपना कर्तव्य पालन कर रहे हैं। ऑपरेशनल एरिया में लतागार तैनाती मन पर प्रभाव डालती है। ऊपर से घर परिवार की जिम्मेदारियां, बच्चों की शादी-पढ़ाई, बूढ़े माता-पिता के प्रति कर्तव्य का निर्वहन तथा जमीन-जायदाद के मसले, पत्नी से अनबन-खींचतान, मन-मस्तिष्क को एक अंधेरी सुरंग की ओर ले जाता है और तनावग्रस्त सुरक्षाकर्मी आत्महत्या जैसा कदम उठा लेता है। लेकिन इस सब के बावजूद जरूरत इस बात की है कि आईटीबीपी के इस कैंप के हादसे की जांच गहन तरीके से होनी चाहिए।

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