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घाटी के भटके युवाओं को मुख्यधारा में लाना ही होगा

कश्मीरी युवा

पिछले सप्ताह सेना के शीर्ष कमांडरों की कांफ्रेंस में आर्मी के सीनियर अफसरों की जम्मू-कश्मीर घाटी में युवाओं के भटकाव पर विशेष चिंता और उन्हें भटकने से रोकने के लिए सिविल सोसायटी, नेताओं समेत सामूहिक प्रयासों की बात से यह साफ जाहिर है अब वहां युद्ध स्तर पर हरसंभव कोशिश दो स्तरों पर करनी होगी। पहला, हर हाल में वहां के लोगों खासतौर पर युवाओं व किशोरों को मुख्यधारा में लाना और दूसरा, आतंकवादियों के सफाए के दूसरे चरण की शुरुआत। ऐसा करने के बाद जाहिर है कि घाटी में कदम अमन-चैन की तरफ बढ़ने लगेंगे। कुछ दिन पहले संसदीय समिति ने भी इस बाबत रिपोर्ट संसद को सौंपी थी जिसमें कहा गया था कि अधिकांश युवाओं ने अपने जीवन में घाटी में सामान्य हालात नहीं देखे हैं।





लिहाजा वहां हालात सामान्य बनाने के लिए युवाओं को मुख्यधारा में लाने के प्रयास करने होंगे। कुछ दिन पहले थलसेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत की टिप्पणी भी इस ओर स्पष्ट संकेत देती है कि कश्मीर की समस्या का समाधान बंदूक से नहीं निकलेगा। उपलब्ध आंकड़े भी इस बात की ओर इशारा करते हैं कि कई ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से घाटी के युवा बंदूक-राइफल पकड़ कर आतंकवादी बनने की राह पर बढ़ रहे हैं। वर्ष 2016 में जहां 88 युवक आतंकी बने थे वहीं 2017 में आतंक के रास्ते पर 126 युवा चले। इस बात को समझ कर अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन रणनीति अपनाने की विशेष जरूरत है।

यह सही है कि मुख्यधारा में युवाओं को लाने के प्रयास पहले भी होते रहे हैं लेकिन कारगर ढंग से किए गए सामूहिक प्रयासों के परिणाम कुछ विशेष किस्म के होते हैं। इसी बात पर चर्चा व चिंता सेना कमांडरों की कांफ्रेंस में की गई है। पूर्व में किए गए प्रयासों से बने मौजूदा हालात बता रहे हैं कि रोजगार के अवसर मुहैया न करा पाने व स्वच्छ-पारदर्शी प्रशासन देने में विफल रहने की वजह से युवा हताश होकर हाथ में बंदूक थाम रहे हैं। घाटी में आज 30 वर्ष से कम आयु के 60 प्रतिशत से अधिक युवक हैं। इन्हीं युवाओं की सोशल मीडिया में अधिक सक्रियता तथा यहां मनोरंजन के अवसरों की कमी पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। ऐसे ही तमाम बारीक व छोटे-छोटे पहलू है जिन पर ध्यान देकर तथा गहन निगरानी तंत्र विकसित कर उन्हें दुरस्त करने की आज दरकार है।

केन्द्र व राज्य सरकार समेत अन्य सुरक्षा एजेंसियों तथा जुड़े हुए विभागों को यह समझना होगा कि अप्रैल से अक्तूबर का समय जम्मू-कश्मीर घाटी के लिए महत्वपूर्ण होता है। इन्हीं महीनों में अमरनाथ यात्रा आरंभ होती है, सेब की सप्लाई शुरू होती है, पर्यटकों की आवाजाही होती है। इसी अवधि में युवाओं के बीच सामूहिक रूप से कैंपेन चलाकर मुहिम को आगे बढ़ाने की जरूरत है। लगातार काउंसलिंग मन की तमाम गांठें खोलकर जीवन जीने का नजरिया देती है। साथ ही सेना तथा सुरक्षा बलों की आतंकियों के सफाए के दूसरे चरण की शुरुआत पुरजोर ढंग से करनी होगी। पिछले दिनों जिस तरह सुरक्षा बलों और पुलिस ने नक्सलियों की कमर तोड़ी है उसी तरह दोहरी रणनीति घाटी में एक कामयाब इबारत लिखने में पूरी तरह सक्षम है। यह बात समझनी होगी।

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