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जम्मू-कश्मीर के युवा अब लिख सकेंगे विकास की नई इबारत

सेना प्रमुख रावत से छात्रों ने की मुलाकात
फाइल फोटो

यह वर्तमान केंद्र सरकार की प्रबल, सुदृढ़, दीर्घकालीन सोच वाली राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रतिफल है कि अब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए हटाने के बाद वहां हालात सामान्य होने की ओर बढ़ेंगे। प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में यह बात बिल्कुल स्पष्ट और पारदर्शी तरीके से रेखांकित की कि केंद्र जम्मू-कश्मीर व लद्दाख में विकास की ताजी हवा बहाने के लिए आगे बढ़ चुका है। इस बात में संदेह नहीं कि जम्मू-कश्मीर पर लिया गया फैसला सीधे तौर अलगाववाद, आतंकवाद, परिवारवाद और भ्रष्टाचार को खत्म कर घाटी में विकास और रोजगार को बढ़ावा देकर वहां नई इबारत लिखने से जुड़ा है। नए फैसले से स्थानीय युवा मुख्य धारा से जुड़ेंगे, उन्हें रोजगार के नए अवसर मिलेंगे और वे काम धंधे में लगकर सूबे और देश की सेवा कर सकेंगे। प्रधानमंत्री की यह सोच पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के सुझाए इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत के सूत्रों से जुड़ी है।





यह सही है कि कई दशक से घाटी के युवाओं ने वहां सामान्य हालत नहीं देखे हैं। खून, हिंसा, हत्या, भय, खौफ के वातावरण ने उन्हें कभी विकास की मुख्यधारा से पूरी तरह जुड़ने नहीं दिया। आतंक और भय का ऐसा माहौल बार-बार बनाया गया कि उन्हें रोजगार के अवसर नहीं मिल पाए। जेहाद के नाम पर बरगलाने वालों ने पहले उनका ब्रेनवाश किया फिर हाथों में पत्थर थमाए और बाद में बंदूक और आतंक की अंधेरी गुफा की ओर धकेल दिया। सेना के आंकड़े बताते हैं कि घाटी में जो आतंकी बने, उनमें 83 प्रतिशत पत्थरबाजी की घटनाओं में शामिल थे। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद युवाओं के लिए वातावरण उनके भविष्य को उज्ज्वल बनाने व देश से जुड़नेवाला बनेगा। शिक्षा और रोजगार ये दो बातें किसी भी समाज व समुदाय को आगे बढ़ाने में बेहद कारगर होती हैं। प्रधानमंत्री ने संबोधन में साफ तौर पर कहा कि अब केंद्र और राज्य के रिक्त पदों को भरने का काम होगा। सार्वजनिक उपक्रम, निजी कंपनियों को रोजगार के नए-नए क्षेत्र मुहैया कराने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। सेना और अर्धसैनिक बलों में स्थानीय युवाओं की भर्ती के लिए रैली आयोजित की जाएंगी। इन कदमों से बड़ी संख्या में जब स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा, नौकरी पाने की संतुष्टि मिलेगी, सम्मान जनक वेतन मिलेगा तो वे स्वत: विकास की मुख्यधारा से जुड़ेंगे और दूसरे के लिए नजीर बनेंगे।

यह ठीक है कि केंद्र का इस बाबत पूरा रोडमैप तैयार है लेकिन युवाओं को आगे बढ़ाने का वातावरण वहां जल्द से जल्द बनाने की जरूरत है। घाटी में युवाओं ने बहुत कुछ खोया है। कई दशक से चले आ रहे आतंकवाद ने ‘धरती के स्वर्ग’ पर ऐसा ग्रहण लगाया कि आज सब कुछ हाशिये पर दिखाई दे रहा है। आतंकवाद की काली छाया ने युवाओं की नैसर्गिक प्रतिभा व नैसर्गित वातावरण को इस कदर चौपट कर दिया कि वहां का पर्यटन उद्योग सांसे गिनने पर मजबूर हो गया। बरगलाए गए स्थानीय युवा आतंकी फंडिंग के धन को ही सब कुछ समझ बैठे और जेहाद के नाम पर मौत के घाट उतार दिए गए। पिछले तीन दशक में 42,000 जानें गई हैं, इसका उल्लेख प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में किया।

जम्मू-कश्मीर पर लिए गए फैसले के बाद जरूरत इस बात की है कि घाटी के बाशिंदों खासतौर पर युवाओं को शिक्षा तथा रोजगार के अवसर तेजी से उपलब्ध करवाए जाएं। साथ ही उन्हें इतिहास, संस्कृति, राजनीति, पर्यटन व अर्थ-व्यवस्था पर विस्तार से बताया जाए। वे जानें कि आखिर सच्चाई क्या है । यह काम सिर्फ केंद्र सरकार, राज्यपाल शासन का ही नहीं बल्कि उनका भी है जो घाटी को फिर से पुष्पित, पल्लवित, विकसित होता हुआ देखना चाहते हैं। पिछले साल स्वतंत्रता  दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से कहा भी था कि सरकार कश्मीर की समस्या को गाली व गोली से नहीं, गले लगाकर हल करना चाहती है। आइये, 15 अगस्त के मौके पर एक-दूसरे को गले लगाएं।

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