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फौज में आत्महत्या गंभीर चिंता का विषय

भारतीय जवान
प्रतीकात्मक फोटो

भारतीय सेना के तीनों अंगों में लगातार आत्महत्या की प्रवृति गंभीर चिंता का विषय इसलिए है कि आत्मविश्वास, उच्च पराक्रम क्षमता और पेशेवर ट्रेनिंग के बावजूद सैनिक जीवन से निराश होकर खुद को खत्म कर रहे हैं। इस सप्ताह केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे द्वारा राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया आंकड़ा हैरान-परेशान करने वाला है। उन्होंने बताय़ा कि बीते साल 2018 के दौरान थल सेना में 80, नौसेना में 08 और वायुसेना में 16 जवानों ने आत्महत्या की। यह आंकड़ा सेना तथा पूरे देश के लिए आंख खोलने वाला है।





यह सही है कि आत्महत्या जैसी प्रवृति को रोकने के लिए सरकार और सेना द्वारा उठाए गए कदमों से लाभ हुआ है लेकिन बावजूद इसके अभी ऐसे और सधे कदम उठाने की जरूरत है जिससे जांबाज सैनिक इस मनोस्थिति से दूर रह सकें। सरकार ने संसद में कहा कि पिछले तीन वर्षों के दौरान सेना का मनोबल ऊंचा रखने के लिए कई कदम उठाए गए। इन कदमों में शामिल हैं- बेहतर क्वॉलिटी के कपड़े, भोजन, विवाहितों के लिए आवास, यात्रा की सुविधाएं, बच्चों की स्कूली सुविधा, मनोरंजन तथा कल्याण कार्यक्रम आदि। निश्चय ही लगातार की जा रही ऐसी पहल से सैनिकों को लाभ होता है। सच्चाई तो यह है कि ऐसी सुविधाएं किसी भी सैनिक के मनोबल को ऊंचा रख कर्तव्य पालन को बेहतर ढंग से कर पाने में मदद करती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार आत्महत्या का सीधा संबंध लगातार मन की उदासी से है। यही लगातार उदासी बाद में अवसाद में बदल जाती है। अवसाद एक मानसिक विकार है जो लगातार तनाव, खिंचाव और दबाव से पैदा होता है। कोई भी व्यक्ति इन हालात में जब घर परिवार तथा नौकरी के बीच उचित तालमेल बिठाने में स्वयं को असहाय पाता है तो हारकर आत्महंतात्मक कदम उठा लेता है। फिर चाहे वह आम नागरिक हो यह सैन्य बलों में शौर्य और पराक्रम का परिचय का देने वाला सैन्यकर्मी। सेना समय-समय पर आत्महत्या की ओर उन्मुख होने वाले कारणों का खुलासा करती है जिनमें मुख्य रूप से पारिवारिक घरेलू मसले, वैवाहिक संबंधों में अनबन और व्यक्तिगत मुद्दे प्रमुख रूप से शामिल होते हैं। अर्धसैनिक बल बीएसएफ ने पिछले साल इस बात की रिसर्च शुरू की थी कि इस बल के जवान सरहद की हिफाजत में तैनाती के दौरान आत्महत्या क्यों करते हैं। यह बल पहले भी कल्याण अनुपात मूल्यांकन परीक्षण कर चुका है। जिसके सार्थक परिणाम निकले हैं। तीनों सेनाओं को भी अति गहनता के साथ आत्महत्या के कारणों को जानने की कोशिश करनी होगी और कारगर पहल करनी होगी।

सरकार ने कहा है कि इन सुविधाओं के अलावा सैनिकों को तनावमुक्त रखने के लिए योग्य और ध्यान का अभ्यास तथा संबंधित जानकारी दी जाती है। निश्चित रूप में ध्यान और योग का अभ्यास शरीर और मन दोनों  चुस्त दुरुस्त रखता है। निरंतर अभ्यास से मन में ऐसे रसायन पैदा होते हैं जो मन को अवसाद से मुक्त रखते हैं। सेना ने देश की कई हिस्सों में सैनिक मनोवैज्ञानिक चिकित्सा केंद्र भी स्थापित किए हैं। लेकिन इन सब के बावजूद समस्या के मूल में जाने की खास जरूरत है, क्योंकि इन समस्याओं की वजह से खीझ, आक्रोश और दबा हुआ तनाव सामने आ जाता है और वर्दीधारी हथियारबंद सैनिक अथवा सशस्त्र बल कर्मी खुद और साथी को मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। ऐसी घटनाओं से सबक लेने की जरूरत है।

आज भारतीय सेना और सैन्यबल देश-दुनिया के बदले हालात में जान जोखिम से भरी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऑपरेशनल एरिया में लगातार तैनाती मन पर प्रभाव डालती ही है। ऊपर से घर-परिवार की जिम्मेदारियां, बच्चों की लिखाई-पढ़ाई और शादी, घरेलू जमीन के मसले और बूढ़े माता-पिता के प्रति कर्तव्य का निर्वहण सैनिक के मन- मस्तिष्क को एक अंधेरी सुरंग की ओर ले जाता है। और कई बार विकारग्रस्त सैनिक आत्महत्या जैसा कदम उठा लेता है।

सरकार, सेना और समाज तीनों को इस ओर संवेदनशील होकर ध्यान देने की जरूरत है। सरकार को यह सोचना होगा और तीनों सैन्यबलों को बारीकी से समझना होगा कि तमाम कोशिशों के बावजूद सैनिक आत्महत्या क्यों कर रहें हैं। कोई कमी है तो उसे तत्काल दूर करने की जरूरत है। समाज को भी यह समझना होगा कि फौज है तो देश है। अगर एक सैनिक सीमा की सुरक्षा में तैनात है तो आस-पड़ोस और पूरे गांव के लोगों को सैनिक के घर-परिवार के हर मामले में सहयोग की जरूरत है। यही सहयोग उसके लिए सम्मान है और यही सहयोग उसे मानसिक रूप से तनावमुक्त कर पाने में सक्षम है।

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