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घाटी में किशोरों का आतंकी बनना चिंता का विषय

आतंकी

जम्मू-कश्मीर घाटी में किशोरों का लगातार आतंक का रास्ता पकड़ना इसलिए चिंता का विषय है कि अगर इस उम्र में ही वे अपने हाथों में बंदूक थामकर जंगलों में कूद रहे हैं तो वहां के समाज का क्या होगा। बीते 09 दिसंबर को श्रीनगर के बाहरी क्षेत्र मुजगुंड में दो किशोर आतंकियों की मौत सभी के लिए चिंतन का विषय है जिन्हें एक मुठभेड़ के दौरान सुरक्षाबलों ने मार गिराया था। इसमें एक 9वीं कक्षा का छात्र था दूसरा 11वीं कक्षा का। इस उम्र में किशोरों का आतंकी बनने पर पूरे राज्य और समाज को खुले मन के साथ गहन चिंतन और मनन करने की आवश्यकता है। साथ ही यह घटना समाजशास्त्रियों तथा मनोविज्ञानिकों के लिए शोध और उसके बाद आए परिणाम पर समाज के बीच काम करने की जरूरत होगी। तभी गहन अंधकार और निराशा की गुफा की ओर जाते किशोरों को समाज के लिए उपयोगी बनाया जा सकेगा। वरना ऐसी घटनाएं आने वाले समय में और बढ़ती रहेंगी। और हम तमाम कोशिशों के बाद भी अपने वांछित मुकाम पर नहीं पहुंच सकेंगे। मारे गए दोनों आतंकी महज 17 तथा 14 बरस के थे। कश्मीर रेंज के आईजी एसपी पाणी भी इस 14 वर्ष के आतंकी मुदस्सिर अहमद पर्रे की मौत पर इसलिए हैरान हैं कि पढ़ने-लिखने, घर-परिवार, समाज के लिए आगे बढ़ने के इस उम्र में उसके हाथों में कलम की बजाय बंदूक थी। चिनार की इस घाटी में कम उम्र के बच्चों में आतंकवाद से लगाव एक बेहद खतरनाक संकेत हैं।





ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस हालात से कैसे निपटा जाए? सवाल जितना गंभीर है उसका उत्तर भी बेहद सधे कदमों से आगे बढ़ने वाला होना चाहिए। कोशिश तो यह हो कि जम्मू-कश्मीर के लोगों की भावनाओं को पूरे देश के साथ जोड़ने की पहल हो। तभी स्थाई सफलता होगी। कश्मीर घाटी के स्थानीय नागरिकों को भी मजबूत मन और देश की एकता की जज्बे के साथ आगे आना होगा। माता-पिता को इस बात की निगरानी करनी होगी कि उनका बेटा हाथ में कलम-कागज के बजाय कहीं गोला बारूद की दुनिया से तो बावास्ता नहीं हो रहा ?  उसके मनोभावों तथा कार्यकलाप को भी बेहद संजीदगी और गंभीरता से समझने की कोशिश करनी होगी। केंद्र तथा सूबे के राष्ट्रपति शासन में राज्यपाल तथा शीर्ष अधिकारियों को भी इन बदली स्थितियों में किशोर मन को समझने, उन्हें बदलने वाले कई कार्यक्रमों को संचालित की पहल करनी होगी। स्कूलों में बच्चों तथा अभिभावकों की लगातार काऊंसिलिंग एक रचनात्मक कदम हो सकता है।

यह सही है कि घाटी में एक लंबे समय़ इन किशोरों, युवाओं तथा समूची एक पीढ़ी ने सामान्य हालात नहीं देखे हैं। हिंसा खून-खराबा, भय व खौफ का वातावरण यहां पर है। ताजा आंकड़ें बताते हैं कि केंद्र या राज्य के हुक्मरानों की तमाम कोशिशों के बावजूद इस साल आतंकी हिंसा की घटनाएं बढ़ीं हैं। दो दिन पहले ही राज्यसभा में सरकार ने स्वीकार किया है कि इस साल दो दिसंबर तक आतंकी हिंसा की 587 घटनाएं हुईं। जबकि पिछले साल यह संख्या 342 थी। इसी तरह इस साल 238 आतंकी मारे गए, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 213 का था। आतंकियों को मौत के घाट उतारे जाने के बाद भी यह सिलसिला साल दर साल बढ़ रहा है। यह चिंता और परेशानी का विषय है। ऊपर से कोमल मन का किशोर बालक अगर आतंक की ओर कदम बढ़ा रहे हैं तो यह खतरनाक संकेत है। सन् 2000 के अप्रैल महीने की 21 तारीख को कश्मीर में पहले मानव बम ने कार बम विस्फोट कर खुद को उड़ाया था। यह घटना उस समय सिहरन पैदा करने वाली इसलिए थी कि उस मानव बम की उम्र महज 18 साल की थी और वह 12वीं का छात्र था। लिहाजा इस मसले पर घाटी में तेजी से काम करने की तत्काल जरूरत है।

 

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