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नई तोपों के आने से और बढ़ी तोपखाने की ताकत

K-9-Vajra-&-M-777

पिछले सप्ताह महाराष्ट्र के देवलाली में आयोजित एक समारोह में केंद्रीय रक्षा मंत्री तथा सेना प्रमुख की मौजूदगी में तोपखाना ने अपने हथियारों में दो नई शस्त्र प्रणालियां शामिल कीं। ये थीं के-9 वज्र व एम- 777 एमएम तोपें। के-9 वज्र एक स्वचालित तोप है जो दक्षिण कोरिया की डिजायन पर निर्मित है तथा एम- 777 इसी क्षमता की एक हल्के वजन की होवित्जर है। दोनों का आंशिक रूप से आयात किया जाता है और बाद में इन्हें भारत में असेंबल किया जाता है।





तोपखाना किसी भी लड़ाई को जीतने का कारण होता है। जैसाकि संभवतः नेपोलियन ने कहा था, ‘ ईश्वर सर्वश्रेष्ठ तोपखाने वाले के पक्ष में होता है। ‘घोटाले के दागों से जूझ रहे‘ बोफोर्स ने 105 फील्ड गन एवं बीएम 21 रॉकेट प्रणालियों के साथ उस गोलाबारी की कमान संभाली थी जिसने कारगिल कर पहाडि़यों पर पाकिस्तान के बंकरों को नेस्तनाबूद कर दिया और पैदल सेना पर हमला करने के काम को आसान बना दिया।

तोपखाने में लगभग 30 साल पहले बोफोर्स को शामिल किए जाने के बाद से कोई नई तोप शामिल नहीं की गई थी। इसके अस्त्रों में बोफोर्स के सीमित रेजीमेंट के अलावा मुख्य रूप से जबलपुर में गन कैरेज फैक्टरी (जीसीएफ) द्वारा निर्मित 105 एमएम फील्ड गन एवं 1960 एवं 1970 के दशक में रूस से आयातित 130 एमएम गन ही थे। 105 एमएम की कमी उसकी रेंज थी जो अधिकतम 17 किमी की थी, हालांकि 130 एमएम की रेंज 29 किमी की थी लेकिन पहाड़ों में इसकी तैनाती कठिन थी, साथ ही छोटे गोलों के साथ इसका विखंडन (फ्रैगमेंटेशन) भी कम था।

हाल के वर्षों में नई बंदूकें में केवल पिनाका एवं स्मर्च रॉकेट सिस्टम्स तथा मानवरहित एरियल वाहन (यूएवी) ही शामिल किए गए थे। अग्नि एवं पृथ्वी वर्गों से निर्मित रणनीतिक मिसाइलों में हालांकि तोपखाने के जवान शामिल हैं, पर वे सामरिक बल कमान के नियंत्रण एवं कमान के तहत हैं। यूएवी टार्गेट की पहचान करने, उपयुक्त कार्रवाई करने एवं हमले के बाद हुए नुकसान का आकलन करने के लिए ये आदर्श हैं। उनकी तैनाती नियमित रूप से आतंकवादियों के लांचिंग पैड के इर्द गिर्द उनकी गतिविधियों का पता लगाने एवं उन पर निगरानी रखने के लिए की जाती है।

सीमित रेंज गहराई में टार्गेट पर हमले करने का अवसर सीमित कर देती है हालांकि इसे अपने आक्रमणकारी पैदल सेना को करीब से सहायता पहुंचाने का लाभ मिलता है। अलावा इसके, मौजूदा दोनों ही तोपों में अधिक विखंडन के साथ बड़े गोलों की कमी है जिसकी वजह से उनका विस्तार कम होता है और दुश्मनों को कम नुकसान पहुंचता हे। वर्तमान नई बंदूकों को शामिल किए जाने के बाद यह कमी दूर हो गई है। दोनों प्रकार की बंदूकों में 8 किग्रा से अधिक के टीएनटी कंटेंट तथा बेहतर रेंज के साथ बड़े गोलों की वजह से इसकी विखंडन शक्ति में तीन गुना इजाफा हो गया है। इसका रेंज भी 30 किमी से अधिक है।

बंदूकों के कई अन्य प्रकारों पर भी काम चल रहा है जो परीक्षण के विभिन्न स्तरों से गुजर रहे हैं। ये सभी अधिक सटीकता, उच्चतर क्षमता तथा बेहतर रेंज के साथ और अधिक आधुनिक हैं। इनमें बोफोर्स का एक बेहतर प्रकार- धनुष, डीआरडीओ द्वारा निजी क्षेत्र के सहयोग से विकसित एडवांस्ड टाउड आर्टिलरी गन सिस्टम्स (एटीएजीएस) एवं जीसीएफ द्वारा विकसित माउंटेड गन सिस्टम शामिल है। इनमें से कितनों को शस्त्रागार में शामिल किया जाएगा, यह देखना अभी बाकी है।

खरीद एवं विकास के तहत सभी बंदूकें ‘मेक इन इंडिया‘ या ‘मेड इन इंडिया‘ वर्ग के तहत आएंगी। जो बंदूकें तोपखाने में शामिल नहीं हो सकेंगी, वे निर्यात के लिए उपलब्ध रहेंगी। इसके अलावा तोपखाना तीन सौ 130 एमएम बंदूकों को 155 एमएम में अपग्रेड कर रहा है। प्रत्येक अपग्रेडेशन की लागत 70 लाख रुपये की आएगी, जो किसी नई बंदूक की कीमत का पांचवां हिस्सा है। इन्हें शामिल करने की प्रक्रिया 2022/23 तक पूरी हो जाएगी। इस प्रकार आगामी वर्षों में एक परिवर्तित तोपखाना संरचना नजर आएगी जो भारी मात्रा में गोला बारूद केंद्रित होगी।

नई शामिल बंदूकों से गोलीबारी और पाकिस्तान के साथ जुड़ी समस्याग्रस्त सीमाओं के साथ अवक्रमण (Degradation) के बाद क्षमताओं में बढोतरी होगी। जिन टार्गेट के लिए पहले सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत होती थी, वे अब तोपखाना रेंज के तहत होंगे। इस प्रकार, पाकिस्तान के प्रशासनिक शिविरों, मुख्यालयों एवं नियंत्रण रेखा के निकट स्थित आतंकी शिविरों को अब आसानी से निशाने की जद में आ जाएंगे।

यह पाकिस्तान को अपने आतंकी लांचिंग पैडों को अपने भीतरी हिस्सों में ले जाने तथा अपने प्रशासनिक स्थानों को भी स्थानांतरित करने को विवश करेगा जो अब तोपखाना के रेंज के भीतर आ जाएंगे। बेहतर विध्वंसात्मक क्षमता के साथ एक अधिक ताकतवर तोपखाना नियंत्रण रेखा पर तैनात सैन्य टुकडि़यों के आत्मविश्वास को बढ़ाएगी तथा उधर पाकिस्तान सेना के आत्मविश्वास को क्षीण करेगी।

वास्तव में अब लड़ाई में फतह हासिल करने वाली सेना के इस हिस्से का आधुनिकीकरण शुरू हो गया है और यह पाकिस्तान के नापाक मंसूबों के खिलाफ भारतीय प्रतिकार की प्रकृति को बदल देगा। इससे उत्तरी सीमाओं के साथ भी जुड़ाव में बढ़ोतरी होगी जिससे हमारे रक्षा बल दुश्मनों के हमलों का मुंहतोड़ जबाव मुख्य प्रतिरक्षा सेना के पहुंचने से पहले ही दे पाने में समर्थ हो जाएंगे।

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ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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