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VETERANS DAY: पूर्व सैनिकों की भूमिका

सेना के पूर्व सैनिक

14 जनवरी सशस्त्र सेना के पूर्व सैनिक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन उन्हें वर्तमान में सेवारत सैनिकों द्वारा सम्मानित किया जाता है और उन्हें प्रभावित करने वाली वर्तमान में जारी योजनाओं से उन्हें अवगत कराया जाता है। सशस्त्र बल ही संभवतः ऐसी एकमात्र सेवा है जहां पूर्व सैनिकों का ताउम्र सम्मान किया जाता है और उनकी चिंता तथा देखभाल की जाती है। ऐसा उनके और सेवारत जवानों के बीच एक घनिष्ठ रिश्ते के कारण है। अधिकांश पैदल सेना रेजीमेंटों में, जहां पुरुषों की भर्ती समान क्षेत्र से की जाती है, पूर्व सैनिक और सेवारत जवान हमेशा एक ही गांव के रहने वाले होते हैं, जिसकी वजह से पूर्व सैनिक उस बटालियन में हो रही घटनाओं से वाकिफ रहते हैं जहां उन्होंने अपने जीवन काल के अधिकतर समय तक सेवा की।





पिछले कुछ वर्षों के दौरान, पूर्व सैनिकों की भूमिका एवं भागीदारी में नाटकीय बदलाव देखने में आया है। अपने वाजिब हकों के लिए सरकार को चुनौती देने तथा संघर्ष करने, जिसका एक प्रमुख उदाहरण ओआरओपी है, के अतिरिक्त, पूर्व सैनिकों ने जवानों के हकों के लिए खुद ही लड़ने का फैसला किया है। पूर्व सैनिकों द्वारा अपने वाजिब हकों के लिए लड़ने का औचित्य है क्योंकि यह वर्तमान में सेवारत जवानों के लिए भी उपयोगी है जो कल पूर्व सैनिक बन जांएगे।

बहरहाल, सेवारत जवानों को प्रभावित करने वाली वर्तमान नीतियों के लिए पदक्रम में रहे लोगों की ओर इंगित करना या उनकी आलोचना करना गलत हो सकता है। कई मामलों में, पूर्व सैनिकों को न तो सेना मुख्यालय में हो रही गतिविधियों के बारे में कोई जानकारी होती है और न ही पदक्रम द्वारा इन मुद्दों के समाधान के लिए ही कोई प्रयास किए जाते हैं। सोशल मीडिया का रास्ता अख्तियार करने या प्रतिकूल टिप्पणी करने से संगठन के भीतर सुलग रहे असंतोष के शोले और भड़क उठते हैं क्योंकि इनका नतीजा अफवाहों के और अधिक फैलने के रूप में सामने आता है। चूंकि बहुत सारे मामलों में पूर्व सैनिक और सेवारत सैनिक सोशल मीडिया साइट्स पर एक साथ बने रहते हैं, सीमित ज्ञान पर आधारित उनकी टिपण्णियों से उनके मनोबल पर प्रभाव पड़ता है।

हालांकि पूर्व सैनिकों का आंदोलन लंबे समय से अस्तित्व में था लेकिन ओआरओपी आंदोलन के आरंभ होने से पहले तक वे न तो प्रसिद्ध थे और न ही सुर्खियों में थे। आंदोलन के पहले चरण से वे राष्ट्रीय खबरों में आ गए। उम्रदराज युद्ध महारथियों के नेतृत्व में चलाए गए इस अनुशासित आंदोलन को समाज के सभी वर्गों की सहानुभूति और समर्थन हासिल हुआ। 2015 में स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर उन पर पुलिस द्वारा किए गए हमले की घटना को सरकार का जुल्म माना गया और नतीजतन पुलिस अधिकारियों को माफी मांगने को मजबूर होना पड़ा।

इसने सरकार पर कदम उठाने और ओआरओपी की घोषणा करने पर दबाव डाला। हालांकि घोषित ओआरओपी अपेक्षाओं से बहुत कम थी और विषमताएं बनी ही रहीं, लेकिन अधिकांश प्रदर्शनकारी संतुष्ट थे और ऐसा महसूस करते हुए कि मानों उन्होंने जंग जीत ली हो, विरोधों से खुद को अलग कर लिया। कोर ग्रुप अभी भी बना हुआ है और लड़ाई जारी है और वे जानते हैं कि भविष्य के पूर्व सैनिकों की सेवा करने के लिए उन्हें इस अंतिम लड़ाई में भी जीतना जरूरी है।

सरकार ने इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि एक लड़ाकू बल के रूप में सशस्त्र बलों के पूर्व सैनिक, जिनमें से कई पहले ही सेवा निवृत हो गए थे, उनकी प्रोफाइल निश्चित रूप से उस वक्त युवा रही होगी, जब वे सेवानिवृत हुए होंगे। हालांकि लगभग सभी वर्गों में जॉब रोजगार योजनाओं में उनके लिए आरक्षण है, इसकी निगरानी करने या इसे लागू करने से संबंधित कोई भी एजेंसी नहीं है। इस प्रकार, राज्य सरकारों एवं केंद्र सरकार ने इस नीति को नजरअंदाज कर दिया और पूर्व सैनिकों को उनके सीमित पेंशन के सहारे छोड़ दिया, जो किसी अन्य सरकारी सेवा के मुकाबले कम है क्योंकि उनके सेवा काल की अवधि भी तुलनात्मक रूप से कम होती है।

पूर्व सैनिक, जो शारीरिक और मानसिक रूप तथा पेशेवरगत तरीके से योग्य, प्रेरित और दृढ़ संकल्प हैं, उन्हें नजरअंदाज किया जाता है एवं जिनकी भर्ती  की जाती है, उन्हें महंगे प्रशिक्षण कार्यक्रमों के दौर से गुजरना पड़ता है। उन्हें केंद्रीय पुलिस बलों, राज्य पुलिस, ऑर्डिनेंस फैक्टरियों समेत बहु औद्योगिक प्रतिष्ठानों में उन्हें शामिल किए जाने से इन संगठनों की रूपरेखा बदल जाएगी क्योंकि जहां तक पूर्व सैनिकों की आस्था, अनुभव, संस्कृति एवं समर्पण का सवाल है तो वह सिविलियन सैनिकों की तुलना में काफी अधिक है। पूर्व सैनिकों, जिन्हें अपने परिवार का पालन पोषण करना होता है और पेंशन ही जिनकी आजीविका का एकमात्र सहारा होता है, को विकल्प के रूप में काफी निम्न आय वाले सुरक्षाकर्मियों का काम करने को मजबूर होना पड़ता है।

यह सच्चाई है कि प्रत्येक सरकार द्वारा पूर्व सैनिकों के मुद्दों की अनदेखी की गई है क्योंकि वे एक ऐसी ताकत नहीं है जो वोट बैंकों को प्रभावित कर सकते हैं क्योंकि राजनीतिकों को केवल वोट बैंक की ही फिक्र होती है। देश भर में फैले होने, जिला स्तर पर शाखाओं के साथ किसी भी केंद्रीय संगठन का न होना, एकजुट होने और एक दूसरे से संवाद करने की अक्षमता ने उन्हें प्रभावहीन बना दिया है। जबतक देश भर में फैले, विभिन्न सेनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले विभिन्न पूर्व सैनिक संगठन एक-दूसरे के साथ हाथ नहीं मिलाते, एक अराजनीतिक स्वरूप नहीं अपनाते, पूर्व सैनिकों विरोधी दृष्टिकोण पर सरकार को चुनौती नहीं देते, उनकी अनदेखी की जाती रहेगी और उनकी मांगों को निम्न प्राथमिकता दी जाती रहेगी। उन्हें अपने मुद्दों को लेकर, जिसका समाधान कोई भी सरकार आसानी से कर सकती है, अदालतों की शरण लेने को मजबूर होना पड़ेगा।

उनकी फिक्र केवल सशस्त्र बल ही करती रही हैं जो उनके साथ संपर्क बनाए हुए हैं और उनके कल्याण के लिए अनेक प्रकार की सुविधाओं के मार्ग खोलती हैं। चूंकि सेना उनकी देखभाल करती है इसलिए पूर्व सैनिकों का यह फर्ज है कि वे भी सेना के कल्याण के लिए ऐसा ही भाव बनाये रखें। सशस्त्र बल की अपने पूर्व सैनिकों से बहुत अधिक अपेक्षा नहीं है, सिवाये इसके कि वे उनके प्रवक्ता बन जाएं, देश के लोगों के बीच सेना के सकारात्मक पक्ष, सैनिकों की कुर्बानी को सामने रखें और उनकी बेहतर और सच्ची छवि प्रदर्शित करें। सशस्त्र बल को उनसे यह भी उम्मीद है कि पूर्व सैनिक उन लोगों को चुनौती दें जो सशस्त्र सेना विरोधी दृष्टिकोण रखते हैं क्योंकि वे वर्तमान में सेवारत हैं, उनका फर्ज उन्हें मुंह खोलने की इजाजत नहीं देता।

मूलभूत रूप से, पूर्व सैनिक और वर्तमान में सेवारत सैनिक एक ही परिवार हैं, एक ही बिरादरी हैं जो साथ मिल कर देश भर में सशस्त्र सेनाओं के सही संदेश को फैला सकते हैं। अगर पूर्व सैनिक एक राष्ट्रीय ताकत के रूप में स्वीकार किया जाना चाहते हैं तो विविध पूर्व सैनिक संगठनों को एकजुट होने, राजनीतिक झुकाव से बचने और सरकार के पूर्व-सैनिक विरोधी दृष्टिकोण को चुनौती देने की आवश्यकता है। एकजुट होने के बाद ही पूर्व सैनिकों का आंदोलन लाभकारी सिद्ध हो सकता है।

लेखक का blog: harshakakararticles.com है और उन्हें @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

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