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पद, पैसे की बढ़ोत्तरी केवल नौकरशाहों को ही क्यों?

CAPF
फाइल फोटो

कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी), जो सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के तहत आता है, ने 30 अप्रैल को नॉन-फंक्शनल अपग्रेडेशन यानी गैर-कार्यशील उन्नयन (एनएफयू) पर सातवें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) की सिफारिशों की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति के गठन से संबंधित पत्र जारी किया। इस समिति में न तो सशस्त्र बलों का और न ही केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) का कोई प्रतिनिधि शामिल था। यह कदम  आश्चर्यजनक था। क्योंकि वर्तमान में सशस्त्र बलों को एनएफयू की मंजूरी प्रदान करने का मामला सर्वोच्च न्यायालय में चल रहा है जहां उसने पहले ही सरकार को सीएपीएफ के लिए इसे कार्यान्वित करने का निर्देश दे रखा है।





इससे सभी वर्गों के बीच फैला आक्रोश स्पष्ट था। समिति में वे थे जिन्हें पहले ही इसे प्रदान कर दिया गया है और इसने उनकी अनदेखी कर दी जिनके लिए यह सर्वाधिक जरूरी है। समिति को सातवें केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों के विभिन्न पहलुओं की जांच का दायित्व सौंपा गया है। ऐसा माना जा रहा है  कि इस समिति का गठन पद्धतियों के निर्धारण के लिए किया गया है जिसके द्वारा यह सुनिश्चित किया जा सके कि दूसरों को यह न प्रदान किया जाए या फिर इसे मंजूरी देने में देरी की जाए। डीओपीटी द्वारा इस बाबत कोई स्पष्टीकरण न दिए जाने के कारण यही तर्क मजबूत दिख रहा है।

एनएफयू केवल वित्तीय लाभ के लिए ही नहीं है  लेकिन चूंकि इसने पद तथा विभिन्न सेनाओं के बीच परस्पर वरिष्ठता को प्रभावित करना शुरू कर दिया है, यह ओहदा तथा पदवी सुनिश्चित करने की लड़ाई भी है। सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने 2017 में तत्कालीन रक्षा मंत्री अरुण जेटली को एक पत्र में कहा था- स्पष्ट रूप से ऐसी धारणा बन रही है कि सेनाएं परिलब्धियों (पर्क्स) एवं विशेषाधिकारों के लिए एनएफयू की मांग कर रही हैं, जो सच नहीं है। यह मुद्वा सशस्त्र बलों के रुतबे में धीरे धीरे आ रही कमी से संबंधित है।

उन्होंने यह कहते हुए इसे और स्पष्ट किया कि बलों के पिरामिड के समान ढांचे के कारण बड़ी संख्या में सशस्त्र बलों के अधिकारी सिविल सेवाओं के अपने समकक्षों की तुलना में जूनियर हो गए हैं जिनमें उनकी खुद की कोई गलती नहीं है। इससे कार्यशीलता से संबंधित समस्याएं पैदा होती हैं। वर्ष 1979 में अंतिम बार जारी किया गया वरीयता का वारंट केवल औपचारिक उद्वेश्यों के लिए है। इसलिए, एनएफयू उनके न्यायोचित पद एवं मर्यादा को बनाये रखने के लिए अनिवार्य है। नौसेना प्रमुख द्वारा इसी प्रकार का एक पत्र केंद्रीय रक्षा मंत्री को भी लिखा गया। ऐसा लगता है कि दोनों ही पत्रों  की अनदेखी कर दी गई है।

सीएपीएफ के साथ भी यही मामला है। उन्हें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसकी मंजूरी दी गई है लेकिन सरकार ने इस मामले में भी आगे कोई कार्रवाई नहीं की है। सरकार, खासकर, नौकरशाही अदालत के आदेशों के बावजूद दूसरों को इस प्रकार की मंजूरी को बाधित करने में अपनी मनमानी कर रही है। क्या ऐसा इसलिए है कि वे खुद को उच्च ओहदेदार समझते हैं या वे महसूस करते हैं कि राजनीतिज्ञों के करीबी होने के कारण वे दूसारी सेवाओं की न्यायोचित मांगों को भी नजरअंदाज कर सकते हैं और बिना राजनीतिक मंजूरी के भी कदम उठा सकते हैं ?

गुस्से और हताशा में सीएपीएफ के 30 हजार से अधिक जवानों ने उनके लिए एनएफयू कार्यान्वित करने की सरकार से मांग करते हुए change.org पर एक ई-याचिका पर दस्तखत किए। हस्ताक्षरों को हासिल करने में उन्हें 15 दिनों से भी कम समय लगा। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एनएफयू पर सीएपीएफ के असंतोष पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है।

चूंकि सारा राजनीतिक नेतृत्व अभी आम चुनाव में मशगूल है, वर्तमान में सरकार निष्क्रिय सी हो चुकी है। कोई भी बड़ा राजनीतिक निर्णय नहीं लिया जा रहा है। नई सरकार के कार्यभार संभालने से पहले कोई भी कदम उठाए जाने की कोई संभावना नहीं है जो जून के पहले सप्ताह तक जाकर संपन्न होगा। इसलिए, सोच समझ कर समिति को मई के आखिर तक का समय दिया गया है। डीओपीटी ने वर्तमान राजनीतिक स्थिति का लाभ उठाया और यह सर्कुलर जारी कर दिया। इसके पीछे के कारणों को स्पष्ट करने की उसकी अनिच्छा सं यही संकेत मिलता है कि उसका कदम अवैध और अनुचित है।

इस गतिरोध के लिए सरकार भी जिम्मेदार है। उसने सेनाओं की मांग पर विचार करने और एनएफयू के लिए दबाव डालने से इंकार कर दिया है। हालांकि वह दावा कर सकती है कि मामला अभी सर्वोच्च न्यायालय में है, लेकिन सीएपीएफ की तरफ से अदालत के फैसलों को लागू करने में उसकी देरी निराश करती है। वर्दीधारी सेनाओं का राजनीतिक नेतृत्व से विश्वास उठाना शुरू हो गया है क्योंकि वे नौकरशाही द्वारा अपने ऊपर शासन किया जाना गवारा कर रहे हैं। हालांकि आम लोगों के साथ परस्पर बातचीत में रक्षा मंत्री हमेशा ही बहादुरी की बातें करती रहती हैं।

अनुशासित वर्दीधारी सेनाओं के लिए इससे यही साबित होता है कि उन्हें एक ही साथ कई मोर्चों पर लड़ाई लड़नी होगी।  एक तरफ दुश्मन तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय नौकरशाही। उन्हें उनका अधिकार तक आसानी से हासिल नहीं होता। उन्हें हल्के में इसलिए लिया जाता रहा है कि क्योंकि अपने आत्म सम्मान और प्रतिष्ठा की वजह से उन्होंने कभी भी सरकार और राष्ट्र का सर झुकने नहीं दिया है। यह वही सरकार है जो सैन्य अभियानों की सफलता को भुनाते हुए चुनाव लड़ती है फिर भी केवल कलम हिलाने वाली नौकरशाही के बहकावे में आ जाती है।

पता नहीं राजनेता कब समझेंगे कि उन्हें वैसे संगठन के खिलाफ कार्य करने को मजबूर किया जा रहा है जिसने हमेशा उन पर भरोसा किया है तथा हरेक कदम पर उनकी जीत सुनिश्चित की है। पता नहीं वे कब समझेंगे कि एक तरफ वैसे लोग हैं जिन्हें सभी प्रकार की सुख-सुविधाएं हासिल हैं और आज तक उन्होंने अपने एयरकंडीशन वाले कक्षों से बाहर भी नहीं झांका है। दूसरी तरफ वैसे लोग हैं जो अपनी जान दांव पर लगा रहे हैं और उन्हें अपने ही अधिकारों के लिए लड़ना पड़ रहा है। मुझे पूरी उम्मीद है कि नई सरकार में वैसे नेता शामिल रहेंगे जो इन केवल पेन हिलाने वाली नौकरशाही को प्रभावित कर सकेंगे और वर्दीधारी सेनाओं के साथ खड़े रहेंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो देश बर्बादी की राह पर आगे बढ़ जाएगा क्योंकि नौकरशाही तो केवल सभी सेवाओं के बीच के प्रेम और सद्भाव को तोड़ने का ही काम करती है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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