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और संवेदनशील बनना होगा रक्षा मंत्रालय को

डोगरा रेजीमेंट के संजू राम

सेना के एक पूर्व जवान संजू राम का मामला हाल ही में सोशल मीडिया पर चर्चित हुआ है जिससे संकेत मिलता है कि किस प्रकार लालफीताशाही से ग्रस्त नौकरशाही ने रक्षा मंत्रालय को बुरी तरह जकड़ रखा है। डोगरा रेजीमेंट का संजू राम बारूदी सुरंग के विस्फोट में अपने दोनों पांव गवां बैठा। उसे कृत्रिम अंगों के एक सेट के साथ लगभग एक वर्ष पूर्व सेना से सेवामुक्त कर दिया गया।





उसने हिमाचल प्रदेश स्थित अपने गांव और अपनी मां के पास जाना छोड़ दिया क्योंकि उस पहाड़ी क्षेत्र में उसे लाद कर ले जाना पड़ता था और यह उसे गवारा नहीं था। उसे कृत्रिम अंगों का एक अपग्रेडेड सेट उपलब्ध कराए जाने में देरी का कारण सेवानिवृत्ति के एक वर्ष बाद भी उसे पेंशन पेईंग ऑर्डर (पीपीओ) का प्राप्त नहीं होना था जो उसे सभी प्रकार के लाभों का हकदार बनाता। हैरत की बात यह है कि अभी तक उसका पेंशन भी जारी नहीं किया गया है।

पीपीओ जारी करने की जिम्मेदारी संबंधित रिकॉर्ड कार्यालय एवं प्रिंसीपल कंट्रोल ऑफ डिफेंस अकाउंट्स (रक्षा लेखा प्रधान नियंत्रक यानी पीसीडीए) की है तो खुद को खुदा से कम नहीं समझते क्योंकि वे सैनिकों एवं सैन्य अधिकारियों के सभी वित्तीय पहलुओं को नियंत्रित करते हैं।

यह स्थिति सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद बनी हुई है जिसने ऐसे ही एक् मामले मे कहा है कि ‘ हम सेवामुक्त होने वाले सेना के जवान के लिए पीपीओ जारी करने में होने वाली देरी को गंभीर चिंता का विषय मानते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद सेना का जवान जिन भुगतानों का हकदार है, यह समय पर उसे प्राप्त होना उसका अधिकार है जिससे कि वह एक सम्मानपूर्ण जीवन व्यतीत कर सके। वर्तमान मामले में इसे लगभग नकारा ही जा रहा है।‘

नवदीप सिंह कानूनी मामलों के एक बड़े और चर्चित जानकार हैं जो अक्सर अदालतों में इस प्रकार के मुकदमे लड़ते रहते हैं। उन्होंने इस मामले में ट्वीट किया, ‘ यह कोई अकेला मामला नहीं है। मैं आपके सामने इस प्रकार के कई उदाहरण रख सकता हूं। ‘ संजू राम के मामले में सोशल मीडिया को धन्यवाद दिया जाना चाहिए जिसकी वजह से उसे बिना किसी कीमत के और तत्काल सर्वश्रेष्ठ सुविधाएं दिए जाने के अनगिनत ऑफर आ रहे हैं।

ऐसी ही देरी का सामना उन्हें भी करना पड़ता है जो सैन्य अभियानों में अपनी जानें गवां बैठते हैं। जहां सेना बीमा एवं ग्रैच्यूटी सहित सभी बकाया राशि तुरंत जारी कर देती है, नौकरशाही वाली पीसीडीए पेंशन की शुरुआत करने के लिए पीपीओ जारी करने में लगभग एक वर्ष का समय ले लेती है। वैसे सैनिकों के परिवारों की स्थिति तो और भी बुरी है जिनके शव हिमस्खलनों, बाढ़ों या हिमदरारों में फंस जाने के कारण प्राप्त नहीं हो पाते। उनकी परिलब्धियां उन्हें जारी करने से पहले साक्ष्य प्रस्तुत करने के सामान्य बहानों के नाम पर उनके परिवारजनों को बहुत अधिक भाग दौड़ करने को मजबूर होना पड़ता है।

सवाल उठता है कि डिजिटल दस्तावेजीकरण के इस युग में  जब सारे विवरण आसानी से प्राप्त हो जाते हैं तो फिर पेंशन जारी करने के लिए एक साल या उससे भी अधिक समय की आवश्यकता क्यों पड़ती है? जब सेना ने किसी सैनिक के गायब हो जाने, उसे मृतक मान लिए जाने की घोषणा कर दी है तो  सारहीन आधारों पर पेंशन देने में देरी क्यों की जानी चाहिए?

यह बात भी कम आश्चर्यजनक नहीं है कि किसी भी रक्षा मंत्री या रक्षा सचिव ने इस नाजायज देरी के लिए कभी भी इस विभाग को फटकार नहीं लगाई जिसका प्रमुख रक्षा मंत्रालय का ही एक हिस्सा है। अलावा इसके  बिना किसी जिम्मेदारी या जवाबदेही के तथा प्रत्यक्ष रूप से अप्रभावित रहते हुए, पीसीडीए बिना किसी सहानुभूति, देखभाल या किसी चिंता के इसमें अपना पूरा समय लेता है। क्या इन संगठनों का वजूद केवल सैन्य व्यय की गलतियां निकालना है और सैनिकों की उन जरूरतों का नजरअंदाज करना है जिनपर अविलंब ध्यान दिय जाने की आवश्यकता है? इस बाबत अदालत का आदेश भी है  फिर भी वे खुलेआम इसकी अवज्ञा और अवहेलना कर रहे हैं  जैसाकि संजू राम के मामले से संकेत मिलता है।

अगर ऐसी कार्रवाईयां  रक्षा मंत्रालय की नौकरशाही की लालफीताशाही के खिलाफ देश के जनाक्रोश को नहीं बढ़ाएंगी तो भला और क्या बढ़ाएंगी ? ऐसे मामलों के निष्पादन में एक वर्ष लगा देना जबकि उनका समाधान कुछ ही दिनों में किया जा सकता है, चिंता पैदा करने वाला दृष्टिकोण है। इसका अस्तित्व इसलिए है क्योंकि रक्षा मंत्रालय में सेना का कोई प्रतिनिधि नहीं है और अपनी तमाम कमियों के बावजूद यह सेना मुख्यालय के साथ एकीकरण में विलंब कर रहा है क्योंकि यह अपने आप को उनसे श्रेष्ठ समझता है और खुद को उनके प्रति जवाबदेह नहीं मानता। यह तभी कोई कदम उठाता है जब उसके अपने हित दांव पर लगे होते हैं, तब नहीं जब सशस्त्र बलों से संबंधित कोई मामला हो।

रक्षा मंत्री द्वारा पीसीडीए को कार्रवाई करने और अपने नजरिये में बदलाव के लिए बाध्य करना तथा ऐसे प्रत्येक मामले में सख्त समय सीमा निर्धारित करना चुनाव आयोग के नियमों का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। वास्तव में यह बहुत पहले ही कर लिया जाना चाहिए था। राष्ट्र के लिए श्रद्धेय माने जाने वाले सैनिकों के प्रति ऐसी घोर उदासीनता  पूरी तरह ढीलेपन एवं बेरुखी का प्रतीक है और संपूर्ण रूप से अस्वीकार्य है। इस डिजिटल युग में साधारण पेंशन की प्रोसेसिंग में एक वर्ष से अधिक का समय लेना एक अबूझ पहेली है। अब समय आ गया है कि पूरे सिस्टम की पूरी तरह जांच एवं मरम्मत की जाए जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि नौकरशाही की देरी की वजह से सेना के जवानों का उत्पीड़न न हो।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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