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अर्धसैन्य बलों में बीच में नौकरी छोड़ना चिंता का विषय

ऐसे हालात में जब सरहद और देश के भीतरी हिस्सों में चुनौती भरा माहौल है, अर्धसैनिक बलों के जवानों और अफसरों का बीच में ही नौकरी छोड़ देने का चलन एक बेहद गंभीर विषय है। इस पर सरकार और समाज दोनों को ही खुले मन से सोचने की जरूरत है। आखिर क्या वजह है कि सशस्त्र बलों में कड़ी मेहनत, पसीना बहाने के बाद ये जाबांज जवान और अफसर ट्रेनिंग लेते हैं। पूरे जज्बे के साथ अपनी ड्यूटी निभाते हैं और बाद में बीच में ही अपनी नौकरी छोड़ देते हैं। यह चिंता का विषय है। खास बात यह है कि नौकरी छोड़ने के मामले लगातर बढ़ रहे हैं। संसद में पेश गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 में अर्धसैनिक बलों के 3,422 अफसरों तथा जवानों ने स्वैच्छिक रिटायरमेंट लिया। जबकि वर्ष 2016 में यह आंकड़ा 8,912 था और वर्ष 2017 में 14,857 कर्मचारियों ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली।





आंकड़े इस बात का साफ-साफ खुलासा करते हैं कि पिछले तीन वर्षों में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वाले अफसरों-जवानों की संख्या तीन गुना तक बढ़ गई। हमें याद रखना होगा कि कठिन मेहनत-मशक्कत और भर्ती के उच्च मानदंडों के आधार पर अर्धसैन्य बलों में किसी जवान अथवा अधिकारी की नियुक्ति होती है। इस पूरी प्रक्रिया में कर्मचारी और सरकार दोनों को ही अपनी-अपनी कीमत अदा करनी पड़ती है। ऐसे में कोई बलकर्मी नौकरी छोड़ता है तो इस पर नए सिरे से विचारकर, गहन चिंतन कर योजनाबद्ध तरीके से काम करने की तत्काल जरूरत है। हालांकि गृह मंत्रालय की रिपोर्ट कर्मचारियों द्वारा बीच में ही नौकरी छोड़ देने के कारणों का ज्यादा खुलासा नहीं करती पर देखने में यही आता है कि वेतनमान में कमी और नौकरी के दौरान मूलभूत सुविधाओं का संतोषजनक न होना ही स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति का कारण बनता है। वैसे और भी कारण जैसे घरेलू जमीन के झगड़े, वैवाहिक संबंधों में तनातनी, माता-पिता की देखभाल, बच्चों की पढ़ाई, अवसाद आदि भी होते हैं। पर पैसा व मूलभूत सुविधाओं में कमी मोटे तौर पर उन्हें नौकरी छोड़ने पर विवश करती है।

चिंता की बात यह भी है कि नौकरी छोड़ने वाले ज्यादातर जवान और अधिकारी सीमा सुरक्षा बल (BSF) और केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल(CRPF) से हैं। खास बात यह है कि दोनों ही सुरक्षा बलों की सीमा और देश की आंतरिक सुरक्षा में अहम भूमिका है। गत तीन वर्षों में इन सुरक्षा बलों की चुनौतियां भी बढ़ी हैं। चाहे वह सरहद की रखवाली हो या फिर देश के भीतर के नक्सलवाद या ऐसी ही गतिविधियां। लिहाजा, केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को ऐसा ढांचा विकसित करना चाहिए कि न केवल कर्मचारी पूरे कार्यकाल के दौरान देश की सेवा कर सकें बल्कि उत्साही ऊर्जावान युवा इन बलों की वर्दी पहनने के लिए उन्मुख हों। समाज को भी सेना तथा इन सुरक्षा बलों को बेहद सम्मान भरे नजिरए से देखना होगा। आखिर इन्हीं के जज्बे से हम त्योहार मनाते हैं, सुरक्षित रहते हैं और चैन की नींद लेते हैं।

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