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सीआरपीएफ जवान ने पेश की कर्तव्य के साथ मानवता की मिसाल

जवान राजकमल

केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवान का यह मानवीय आचरण बेहद सराहनीय है जिसमें कोबरा बटालियन के जवान राज कमल ने बुरी तरह घायल खूंखार नक्सली की जान बचाने के लिए अपना खून दिया। जबकि इसी नक्सली की टुकड़ी ने कोबरा बटालियन के इन्हीं जवानों पर हमला किया था और गोलियां बरसाई थीं। सीआरपीएफ जवान का यह मानवता भरा उदाहरण है। देश के कई राज्यों के तमाम जिलों में अपना आधार खो चुके नक्सलियों को अब यह बात समझनी होगी कि मानवीय मूल्यों तथा लोकतांत्रिक मूल्यों से बढ़कर कुछ और नहीं है। आदमी का वजूद इन्सानियत और लोकतांत्रिक मूल्यों से ही है। नक्सलियों को ठंडे दिमाग से सोचना होगा कि जिस कोबरा बटालियन के जवानों पर जवाबी कार्रवाई में वे अंधाधुंध गोलियां बरसा रहे थे, उन्हीं में से एक जवान ने नक्सली की जान बचाने के लिए अपना खून इसलिए दिया कि उसकी नजर में मानवता सर्व प्रथम है।





दरअसल बदले हालात में नक्सलियों का दायरा कम होता जा रहा है और वह लगभग सिमटने के कगार पर हैं। लगातार उनके स्थानीय कमांडर मौत के घाट उतारे जा रहे हैं। इसका श्रेय सरकार की रणनीति, आला अफसरों की कार्यनीति तथा सुरक्षाबलों के जज्बे को जाता है। रात-दिन, अंधेरे-खतरनाक जंगलों में रहकर नक्सलियों की चालबाजियों के बीच वे अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं और कई बार अपना सर्वोच्च बलिदान कर रहे हैं। वे न केवल नक्सलियों से मुठभेड़ करते हैं बल्कि उनके प्रभाव वाले क्षेत्रों में विकास के ऐसे कार्य कर रहे हैं। जिसका परिणाम यह है कि स्थानीय नागरिकों की जिंदगी में बदलाव आया है।

खास बात यह है कि विकास योजनाओं के शुरू होने से नक्सल प्रभावित जिलों का तमाम हिस्सा व अधिकांश आबादी मुख्य धारा से जुड़ी है और नागरिक नक्सलियों की बात को कम, विकास की बात को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। इन इलाकों में सड़क, पुल निर्माण, टेलीफोन टावर लगाने से हर तरह की संचार व्यवस्था में तेजी आई है जिससे नक्सलियों की निशानदेही होने से सुरक्षाबलों और पुलिस को काम करने में आसानी हुई है। एक महत्वपूर्ण बात और है कि आईटीबीपी तथा सीआरपीएफ ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में आदिवासी बच्चों को शिक्षा तथा रोजगार से जोड़ने की प्रशंसनीय पहल की है। दोनों सशस्त्र बलों ने छत्तीसगढ़ व झारखंड के सैकड़ों गांव में ‘स्किल इंडिया कार्यक्रम’ के तहत किशोरों-युवाओं को मुख्य धारा से जोड़ा है।

अलावा इसके नक्सलियों को यह बात भी गांठ बांधनी होगी कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तैनात सीआरपीएफ, आईटीबीपी, बीएसएफ, सशस्त्र सीमा बल इन इलाकों में समग्र विकास के लिए अपने कर्तव्य का निर्वहन इसलिए कर रहे हैं कि यहां के किशोर युवा समेत सभी नागरिक मूलभूत सुविधाओं के साथ आराम से रह सकें और मुख्य धारा से जुड़ सकें। स्कूल संचालित करने से लेकर आम नागरिकों की सेहत तक का ये अर्धसैनिक बल ध्यान रखते हैं। बीती 26 जनवरी को सीआरपीएफ के जवानों ने यहां के नागरिकों को 1100 यूनिट खून दिया था। सीआरपीएफ का ध्येय वाक्य ही है- ‘सेवा और निष्ठा’ जिसपर वह हमेशा खरी उतरती है। इस संदर्भ में आज से ठीक से एक साल पहले उस घटना का उल्लेख करना बेहद प्रसांगिक होगा जब 8 फरवरी, 2018 में झारखंड के पलामू में 134 बटालियन के जवानों के साथ बदले की आग में महिला नक्सली मंजू बैगा गंभीर रूप से घायल हो गई थी। तब अस्पताल में भर्ती महिला नक्सली को इसी बटालियन के कांस्टेबल गुलजार ने अपना खून दिया था। यह बात नक्सलियों को समझनी चाहिए और अपने गले उतारनी चाहिए। सशस्त्र बलों की तैनाती पूरी तरह से सभी की रक्षा के लिए होती है। यह बात जम्मू-कश्मीर के पत्थरबाजों को भी समझनी होगी जो सैन्य बलों को निशाना बनाते हैं।

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