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घाटी में आतंकवाद का सिमटता दायरा

आतंकी
प्रतीकात्मक फोटो

सेना का यह दावा कि जम्मू-कश्मीर घाटी में इस साल अब तक 69 आतंकी मारे जा चुके हैं और जैश-ए-मोहम्मद आतंकी संगठन का नेटवर्क लगभग तबाह हो चुका है, इस बात की ओर संकेत करता है कि सब कुछ सामान्य रहा तो आने वाले दिनों में कश्मीर घाटी में हालात लगभग सामान्य होने की ओर बढ़ेंगे। यह शुभ संकेत है। लेकिन सुरक्षा बलों की संयुक्त कार्रवाई के साथ केंद्र व सूबे के राज्यपाल शासन तथा कश्मीर के बाशिंदों को भी एक समझदारी भरी जिम्मेदार भूमिका निभाने की जरूरत है। पिछले कई दशक में जम्मू-कश्मीर घाटी में बहुत खून-खराबा हो चुका है। लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ। पर्यटन खेती-बाड़ी, लिखाई-पढ़ाई, सामान्य जनजीवन लगभग सभी कुछ वहां पर असामान्य है। इस बीच घाटी के कई होनहार युवा ऑपरेशन ऑलआउट के तहत मारे गए और सुरक्षाबलों के जवान भी शहीद हुए। यह बात देश और कश्मीर से प्यार करने वाले सभी लोगों को बखूबी समझनी होगी और समझने के बाद पूरी शिद्दत तथा जवाबदेह जिम्मेदारी के साथ काम करना होगा।





सेना, सशस्त्र बल तथा जम्मू-कश्मीर पुलिस लगातार आतंकवाद से लड़ रही है। ऐसे में सेना का यह आंकड़ा कि इस साल घाटी में 69 आतंकी ढेर किए जा चुके हैं और 41 आतंकी पुलवामा हमले के बाद मारे गए हैं जिनमें 25 आतंकी जैश-ए-मोहम्मद गुट के हैं, सेना का घाटी में आतंकवाद के समूल्य नाश तक ऑपरेशन जारी रहने का यकीन सेना व सुरक्षाबलों की अटूट प्रतिबद्धता दर्शाता है। हकीकत तो यह है कि जम्मू-कश्मीर में पिछले साल सुरक्षा बलों ने जिस तरह आतंकवादियों के सफाए के लिए ऑपरेशन जारी रख 250 से ज्यादा आतंकी व उनके एक दर्जन सरगनाओं को मौत के घाट उतारा था उससे उम्मीद की जा रही थी कि जल्द ही पूरा सूबा आतंकवाद से मुक्त हो जाएगा। ऐसा इस साल होता दिखाई भी दे रहा है कि आतंकियों का दायरा सिमट रहा है और वह सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। पिछले साल जम्मू-कश्मीर में 261 आतंकी ढेर किए गए थे। ऐसा 10 साल में पहली बार हुआ था। आतंकियों के खिलाफ इस कार्रवाई के दौरान एक दर्जन टॉप कमांडर भी मारे गए थे।

पुलवामा हमले के बाद आज पूरा देश सेना और सुरक्षाबलों की कार्रवाईयों को देख सुन पा रहा है। सुरक्षा बलों की संयुक्त कार्रवाई से आतंकी संगठनों की लगातार कमर तोड़ी जा रही है। अब कोई भी कमांडर घाटी में किसी भी गुट की अगुवाई करने की हिम्मत इसलिए नहीं जुटा पा रहा है क्योंकि सेना का प्रहार बेहद आक्रामक है। पुलवामा हमले के पहले पिछले साल 2018 में हिज्बुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, गजवा-तुल-हिंद, उल-बदर जैसे आतंकी संगठनों के एक दर्जन आतंकी कमांडर मारे गए थे। जब कमांडर या 3-4 आतंकी एक साथ मारे जाते हैं तो उनका मनोबल टूटता है और आतंकियों के बीच भगदड़ मच जाती है। घाटी में ऐसा होता दिखाई बी दे रहा है। समाजिक तौर पर उन्हें बस्ती या गावं में पनाह नहीं मिल रही और कहीं किसी जानकार रिश्तेदार के यहां घुस भी गए तो सुरक्षा एजेंसियों का मजबूत खुफिया तंत्र उन्हें घेर कर सुरक्षा बलों के हवाले उन्हें कर दे रहा है।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सुरक्षाबल आतंकी और उनके सरगनाओं की सफाए का काम बेहद अचूक रणनीति के साथ कर रहे हैं लेकिन चुनौतियां अभी बरकरार है। इस बात को सेना भी मानती है कि आतंकी गुट अपने काडर को बचाने और लोगों में डर पैदा करने के लिए आतंकवादी कुछ सनसनीखेज घटनाओं को अंजाम देने और घाटी के आम नागरिकों को निशाना बनाने का प्रयास करते हैं। आतंकी लगातार खूनी इरादों से सनी रणनीति पर चलते हैं और हमारे बहादुर जवान शहीद हो जाते हैं ये गौर करने वाली बात है। ऐसे माहौल में जरूरी हो जाता है कि राज और समाज जवानों के परिजनों, शहीदों की घर परिवार की कतई अनदेखी न करें। उनका सर्वोच्च बलिदान आखिर देश की एकता और अखंडता के लिए है। वे जी-जान की बाजी लगाकर अपने सर्वोच्च कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। यह बात देश के हर नागरिक को समझनी होगी।

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