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आतंक पर भारी पड़ा कश्मीर के किशोर का शौर्य

इरफान शेख को शौर्य पदक देते राष्ट्रपति
इरफान शेख को शौर्य पदक देते राष्ट्रपति कोविंद

केंद्र सरकार की यह पहल बेहद सराहनीय व सारगर्भित कही जाएगी जिसमें आतंक के गढ़ रहे जम्मू-कश्मीर के शोपियां के 16 साल के छात्र इरफान रमजान शेख को शांति के समय दिए जाने वाले वीरता पदक ‘शौर्य चक्र’ से नवाजा गया। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस मंगलवार को राष्ट्रपति भवन में यह सम्मान दसवीं कक्षा में पढ़ने वाले इस विद्यार्थी को दिया तो पूरे देश के नागरिकों ने कश्मीर के इस किशोर की असाधारण वीरता व परिपक्वता को सलाम किया। निश्चय ही पूरे देश के किशोरों तथा युवकों के लिए यह घटना इसलिए अनुकरणीय है कि मौजूदा दौर में आतंकवाद की केंचुलें इधर उधर बिखरी दिखाई दे रही हैं। देश के तमाम हिस्सों में आतंकी अपना जाल बिछाने के लिए कंटरपंथी विचारों और जेहाद का सहारा ले रहे हैं और किशोर मन के तमाम कश्मीरी व अन्य क्षेत्रों के युवा आतंक की अंधी खाई की ओर बढ़ा लेते हैं। ऐसे में शोपियां के किशोर इरफान को शौर्य चक्र से नवाजे गए सम्मान को बेहद प्ररेणादायी माना जाना चाहिए जिसने अपनी हिम्मत व हौसले के दम पर निहत्थे होकर भी एक आतंकी को मौत के घाट उतार दिया और बाकी को भागने पर विवश कर दिया। यह सही है कि इस हमले में उनके पिता की मौत हो गई और आतंकियों के डर से बहुत से रिश्तेदार व पड़ोसी जनाजे से दूर रहे।





दरअसल पिछले कुछ सालों में जम्मू-कश्मीर घाटी में आतंकी संगठन स्थानीय किशोरों-युवाओं को अपनी ओर मोड़ने में कामयाब हुए हैं। पुलवामा आतंकी हमले को जिस स्थानीय युवक ने अंजाम दिया वह एक साल पहले 11वीं कक्षा का छात्र था।  जैश ए मोहम्मद गुट का यह आतंकी पुलवामा के काकापोरा गांव का निवासी था। अलावा इसके जानकार बताते हैं कि कुछ समय से आतंकी संगठन अपनी रणनीति के तहत ब्रेनवाश कर स्थानीय युवाओं की भर्ती कर बंदूक हाथ में थामा रहे हैं। साल 2017 में जहां स्थानीय युवाओं के आतंकी बनने की यह संख्या 126 थी वहीं साल 2018 में यह संख्या 191 दर्ज की गई। यह स्थिति परेशान करने वाली और चिंताजनक है। खास बात यह है कि जो युवा बंदूक नहीं थाम रहे उन्हें हाथ में पत्थर थमाने की पुरजोर कोशिश आतंकी गुट कर रहे हैं। यह धारणा भी गलत साबित हो रही है कि गरीब व कम-पढ़े लिखे युवक आतंकवाद का रास्ता पकड़ते हैं लेकिन अच्छे घरों के संपन्न तथा इंजीनियरिंग व मैनेजमेंट के युवाओं का इस ओर रुख हाल की घटनाओं का गवाह बना है।

ऐसे में इस बात को फिर से रेखांकित करना जरूरी है कि कई दशक से जम्मू-कश्मीर में स्थितियां बेहद असामान्य हैं। मौजूदा दौर के किशोरों तथा युवाओं ने अपने आस-पास सामान्य जन-जीवन नहीं देखा। हिंसा, खून-खराबा, खौफ-दहशत ने अपना ताना-बाना बुन रखा है। शोपियां के 16 साल के इरफान (आतंकी घटना के समय 14 साल) एक अदम्य साहस की अनुकरणीय मिसाल उन स्थानीय युवकों के लिए है जो आतंक की राह पकड़ कर अंधी खाई की तरफ बेवजह बढ़ना चाहते हैं। केंद्र सरकार, सूबे के राज्यपाल शासन को राज्य में युवाओं के प्रति प्यार, सहानुभूति व सख्ती के साथ लगातार आगे बढ़ने की जरूरत है। लघु व लंबी अवधि के कदम बेहद कारगार साबित हो रहे हैं जिसमें स्थानीय युवाओं को शिक्षा, रोजगार, खेलकूद, सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़कर उन्हें मुख्य धारा से जोड़ा जा रहा है और पंचायतों व स्थानीय निकायों के वित्तीय अधिकार बढ़ाकर विकास कार्यों को बढ़ावा दिया जा रहा है। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि ऑपरेशन ऑल आउट के साथ आतंकियों का रोज ही सफाया हो रहा है पर मौजूदा माहौल बहुत सामान्य नहीं है। सधे कदमों से तेज चलने का काम राजनीतिक नेतृत्व को लगातार करते रहने की जरूरत है। सच तो यह है कि कश्मीर घाटी में राष्ट्र भाव के साथ उठाया गया हर कदम प्रभावशाली है। शोपियां के किशोर छात्र इरफान को दिया गया शौर्य चक्र इन्हीं कदमों में से एक है।

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