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कायर सैनिक पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम-कोर्ट, सेना
फाइल फोटो

देश की शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी बेहद सामयिक और सारगर्भित है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि देश की अखंडता को बचाने के लिए एक सैनिक को बढ़-चढ़कर अपना योगदान करना चाहिए। लेकिन अगर कठिन परिस्थितियों में वह चुनौतियों का सामना करने के बजाय अपनी पीठ दिखाकर भागता है तो यह कायरता है। दरअसल सुप्रीमकोर्ट की यह टिप्पणी एक सैन्य अफसर की याचिका को खारिज करते हुए सामने आई है। साल 2006 में जम्मू-कश्मीर में एक अभियान के दौरान चौकी पर जब आतंकियों ने गोलियां बरसाईं तो जवाबी कार्रवाई के बजाय यह अफसर चौकी छोड़कर भाग गया था। इस वजह से इसे नौकरी से निकाला गया। इस मुठभेड़ में इसका एक साथी शहीद हो गया था। इस अफसर पर यह भी आरोप है कि इसने अपनी एके- 47 राइफल व पिस्तौल का इस्तेमाल नहीं किया था। लिहाजा आतंकियों ने चौकी पर कब्जा कर लिया और अफसर को गोली मारकर लाइट मशीन गन हथिया ली थी।





सुप्रीमकोर्ट की एक सैनिक की कर्तव्यपरायणता को परिभाषित करने वाली इस टिप्पणी के साथ यह टिप्पणी भी गौर करने के लायक है जिसमें कहा गया है कि जवान को जवाबी कार्रवाई करने और राष्ट्र की अखंडता की सुरक्षा करने के लिए प्रशिक्षित करने पर संसाधन खर्च किए जाते हैं। जाहिर है कि एक सैनिक को हर परिस्थिति के लिए तैयार करने के लिए देश का अच्छा खासा संसाधन खर्च होता है और वह अगर चुनौतियों के बीच बीठ दिखाता है तो वह देश के साथ धोखा करता है। यह आचरण एक तरह से देशद्रोह की श्रेणी में आता है। सैनिक का धर्म है कि वह हर परिस्थिति में शौर्य, पराक्रम और वीरता का परिचय देकर अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़े। सरहद व देश की रखवाली में उसे पीठ दिखाने की ट्रेनिंग नहीं बल्कि दुश्मन की आंख में आंख डालकर मुंहतोड़ जवाब देना सिखाया जाता है। देश के तमाम वीरों, महावीरों व परमवीरों की गाथाएं इसलिए याद की जाती हैं कि वे उनके अदम्य साहस, असाधारण वीरता और यहां तक कि सर्वोच्च बलिदान से भरी हैं। ऐसे में सेना या अन्य सुरक्षाबल का सैनिक दुश्मन के सामने अगर पीठ दिखाता है तो वह न केवल सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करता है बल्कि सीधे तौर पर राष्ट्र के साथ गद्दारी करता है। यह संगीन और अक्षम्य अपराध है।

यहां पर यह बात खासतौर पर रेखांकित करने की है कि आज बदली हुई परिस्थितियों के बीच सेना और सशस्त्र बल पूरी निष्ठा व समर्पण के साथ अपने सैन्य धर्म का पालन कर रहे हैं। बर्फीली हवाओं और तपती रेत, दलदले इलाकों, जंगली-दुर्गम क्षेत्रों में फर्ज निभाते वक्त उन्हें अपनी जान की नहीं, देश की परवाह होती है। अवसर आता है तो इसी जोश-जुनून के साथ वह हंसते-हंसते प्राणों को न्यौछावर करने के लिए तत्पर हो जाते हैं। सेना का इतिहास ऐसे जांबाज सैनिकों की गाथाओं से भरा पड़ा है। देश के लिए मर मिटने वाले तमाम सैनिकों के नाम नेशनल वार मेमोरियल और इंडिया गेट पर देखे जा सकते हैं। इसी महीने 26 तारीख को देश करगिल विजय दिवस की 20वीं वर्षगांठ पर उन सैनिकों को याद करने जा रहा है जिन्होंने करगिल में जान की बाजी लगाकर वीरता की अकल्पनीय गाथाएं लिखी हैं। करगिल विजय के चार परमवीर चक्र विजेताओं के कारनामे रोंगटे खड़े करते हैं। भारत के प्रथम परवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा ने 03 दिसंबर, 1947 को अपनी जान गंवाकर श्रीनगर एयरपोर्ट को दुश्मनों से बचाया था। वह मोर्चे पर डटे रहे बाद में दुश्मनों के मोर्टार से उनके चीथड़े उड़ गए। जेब में रखी गीता से उनकी पहचान की जा सकी। यह है अनुकरणीय वीरता, सूझबूझ भरा पराक्रम और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान। जिसकी दरकार राष्ट्र को हर सैनिक से होती है।

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