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समर नीति: अमेरिका के साथ रिश्तों का गिरता ग्राफ

Nikki Haley

बराक ओबामा भारत अमेरिका रिश्तों को जिस मुकाम पर छोड़ गए थे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सत्ता सम्भालने के बाद रिश्तों का ग्राफ निरंतर नीचे गिरता दिख रहा है। भारत और अमेरिका के विदेश और रक्षा मंत्रियों का जो संयुक्त टू प्लस टू डायलाग छह जुलाई को तय था और जिसके लिये दोनों पक्ष जमीन तैयार करने में जुटे थे कि अचानक इसे स्थगित करने का ऐलान अमेरिका ने कर भारत अमेरिका रिश्तों को झटका दे दिया। हालांकि कहा यही गया कि डायलाग स्थगित होने के पीछे आपसी रिश्तों के मसले कोई वजह नहीं है लेकिन इससे एक बात तो झलकती ही है कि अमेरिका की प्राथमिकताओं में अब भारत नहीं रहा। अन्यथा भारत के साथ वार्ता स्थगित कर अमेरिकी नेता उत्तर कोरिया जाने का क्यों कार्यक्रम बनाते ।





हालांकि डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति पद सम्भालने के बाद भारत से रिश्तों को और गहराई देने के लिये बड़ी-बड़ी बातें कही थीं और उनके पाकिस्तान विरोधी बयानों औऱ चेतावनियों से ऐसा लगने लगा था कि डोनाल्ड ट्रम्प अपने पूर्ववर्ती बराक ओबामा को पीछे छोड़ते हुए भारत के साथ सामरिक साझेदारी का ऐसा रिश्ता निभाएंगे जिससे पाकिस्तान और चीन से जुड़ी भारत की सामरिक चिंताएं दूर हो जाएंगी।

इस साल के शुरु में तो राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपना ट्वीटर खाता पाकिस्तान को कोसने वाले बयान से ही खोला था लेकिन ऐसा लग रहा है कि पाकिस्तान ने आतंकवाद का जो हथियार हाथ में पक़ड़ रखा है वह अमेरिका के सभी सैनिक औऱ कूटनीतिक हथियारों पर भारी पड़ रहा है और अमेरिका इसके आगे झुकता हुआ लग रहा है। जिस अफगानिस्तान से आतंकवाद की समाप्ति के लिये अमेरिका ने भारत को साथ लेकर चलने की बात कही थी वहां अब अमेरिका फिर से पाकिस्तान का दामन पक़ड़ता हुआ दिख रहा है।

न केवल पाकिस्तान बल्कि जिन देशों के साथ प्रगाढ़ रिश्ते बनाकर भारत अपने सामरिक और आर्थिक हितों का संवर्द्धन करना चाह रहा है उस पर भी अमेरिका की छाया पड़ने लगी है। अमेरिका ने जहां भारत के साथ वीजा और आव्रजन मसलों को छेड़ा है वहीं ईरान और रूस के साथ रिश्तों पर भी अमेरिकी फैसलों की वजह से आंच आ सकती है। अमेरिकी फैसले भारत को बाध्य कर रहे हैं कि या तो रूस या ईरान के साथ रहे या फिर अमेरिका के साथ।

हालांकि संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की स्थायी प्रतिनिधि निकी हेली ने 27-28 जून को भारत दौरे में पाकिस्तान को चेतावनी देने वाला कड़ा बयान दे कर भारतीय मीडिया की सुर्खियों में छायी रहीं लेकिन उनके भारत दौरे का उद्देश्य तो यही था कि ईरान से तेल व्यापार खत्म करने के लिये भारत पर दबाव डाले। लेकिन भारत यदि ऐसा करता है तो ईरान में भारत द्वारा बनाए जा रहे चाबाहार बंदरगाह पर ईरान आंच डाल सकता है। इस बंदरगाह के जरिये ही भारत न केवल अफगानिस्तान के साथ अपने आपसी व्यापारिक सम्बन्ध गहरे करना चाहता है बल्कि यह बंदरगाह मध्य एशिया के देशों के साथ भी आर्थिक और राजनयिक रिश्ते गहरे करने का पुल साबित हो सकता है।

डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के सामने दुविधा पैदा कर दी है कि रूस और ईरान के साथ अपने रिश्ते किस तरह पहले की तरह प्रगाढ़ बनाए रखे। यदि भारत अमेरिकी धमकियों के आगे झुक जाता है तो ईरान और रूस क्या भारत के साथ सहयोग का स्तर कम नहीं कर देंगे?  ईरान भारत का निकट- पड़ोसी है और रूस भारत का पारम्परिक सामरिक साझेदार है। ईरान भारत को तेल सप्लाई करने वाला बड़ा निर्यातक है और रूस पर भारतीय सेनाओं की निर्भरता बनी हुई है। दूसरी ओर बदले हुए विश्व माहौल में भारत के लिये अमेरिका के साथ भी रिश्ते गहरे बनाने की जरूरत है।

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