vishesh

समर नीति: ओसाका में मोदी- दो विरोधी गुटों में भारत

PM-Modi

जापान के ओसाका शहर में 27 व 28 जून को जी-20 शिखर बैठक में दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच भारत ने अपनी विशेष जगह बनाई। ट्रिलियन डालर से ऊपर की अर्थव्यवस्था वाले देशों में शुमार होने के बाद  दुनिया की बड़ी ताकतों के लिये भारत के साथ  गहरे रिश्ते बनाना एक विशेष मजबूरी हो गई है।  जिस देश में एक अरब 35 करोड़  उपभोक्ता रहते हों उस देश में अपनी जगह बनाने के लिये  दुनिया के ताकतवर देशों के बीच होड़ लगी है। ओसाका में जिस तरह चीन, अमेरिका औऱ रूस ने भारत को अपने पाले  में रखने की कोशिशें कीं वह भारत की बढ़ती अहमियत को दिखाता है।





ओसाका में वैसे तो प्रधानमंत्री मोदी दुनिया के 20  विकसित और विकासशील देशों की शिखर बैठक में भाग लेने के लिये गए थे लेकिन सब की नजर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड  ट्रम्प के साथ होने वाली बैठक पर लगी थी। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण वे तीन बहुपक्षीय बैठकें थीं जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाग लेकर  भारत की अहमियत बढाई। पहली त्रिपक्षीय बैठक थी भारत, जापान और अमेरिका की। दूसरी त्रिपक्षीय बैठक थी भारत, रूस औऱ चीन की। और इसके अलावा ब्रिक्स के पांच सदस्य देशों की एक बहुपक्षीय बैठक भी हुई जिसमें नरेन्द्र मोदी की अहम भागीदारी रही।

यह रोचक बात है कि अमेरिका के विपरीत खेमे वाले देशों चीन और रूस के  नेताओं के साथ भी प्रधानमंत्री मोदी  ने  जिस शहर में शिखर बैठकें की  वहीं वे अमेरिका और जापान के नेताओं के साथ भी मिले। इन दोनों  विपरीत हितों वाले देशों के गुटों की बैठक में भाग लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की ही अहमियत दिखाई है। एक और जापान औऱ अमेरिका भारत को अपने पाले में रखना चाहते हैं औऱ दूसरी ओर इनके विरोधी रूस और चीन भारत को अपने पाले में खींचने को आतुर दिखे।

भारत का राष्ट्रीय हित कहता है कि भारत को किसी एक गुट से बंध कर नहीं रहना चाहिये। भारत को सभी देशों के साथ संतुलन बना कर रखना है ताकि अपने राष्ट्रीय आर्थिक और सामरिक हितों की रक्षा की जा सके।  जहां भारत की रूस  के साथ पारम्परिक सामरिक साझेदारी का रिश्ता है और इस वजह से रूस ने भारत को एक सैन्य ताकत बनने में अपना अहम योगदान दिया है वहीं चीन भी भारत का पड़ोसी है जिसके साथ भारत को रिश्ते बना कर रखना होगा।  चीन के साथ भी भारत के 70 अरब डालर से अधिक के व्यापार हैं इसलिये चीन भी नहीं चाहेगा कि वह भारत के बडे बाजार से हाथ धो ले।

एक तरफ अमेरिका और जापान औऱ दूसरी तरफ चीन औऱ रूस।  अपने राष्ट्रीय हितों के संवर्द्धन के लिये भारत को दोनो गुटों  को खुश रखना होगा। इसलिये भारत जहां हिंद प्रशांत के इलाके के चार देशों के गुटों में अपनी जगह बना चुका है वहीं वह आठ देशों वाले  शांघाई सहयोग संगठन ( एससीओ)  में भी अपनी जगह बना चुका है। इसी महीने उजबेकिस्तान की राजधानी बिश्केक में प्रधानमंत्री मोदी ने एससीओ की शिखर बैठक में अग्रणी भूमिका निभाई। यही वजह है कि  भारत दोनों गुटों के देशों का लाड़ला बना हुआ है।  पर भारत को यह देखना होगा कि एक गुट के  देशों  के अधिक नजदीकी के लालच में   भारत दूसरे गुट के ताकतवर देशों  के साथ  अलगाव की भावना नहीं पैदा करे।

जिस तरह से भारत को दोनों गुटों में खींचने की कोशिश की जा रही है उससे साफ है कि 21 वीं सदी का भारत वास्तव में दुनिय़ा में संतुलनकारी भूमिका में पेश होने लगा है। भारत को अपनी इस नवअर्जित ताकत का लाभ उठाने के लिये समग्रता में एक रणनीति बना कर चलना होगा।

Comments

Most Popular

To Top