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समर नीति : मालदीव और श्रीलंका में मोदी

मालदीव और श्रीलंका का  आठ और नौ जून को अपने दूसरे कार्यकाल का पहला विदेश  दौरा कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत की विदेश नीति को अपने पहले कार्यकाल की तरह जारी रखने  की शानदार शुरुआत  की है।  पिछले कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी मालदीव के दिवपक्षीय दौरे पर नहीं जा सके थे जिसकी भरपाई वह दूसरे कार्यकाल के कुछ दिनों के भीतर ही  कर चुके हैं।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  ने दूसरी बार सत्ता सम्भालने के बाद पहले की तरह ही भारत के पडोसी देशों को यह संकेत दिया  था कि उनके साथ रिश्ते प्रगाढ़ करना औऱ उनके हितों की देखभाल करना  भारत की विदेश नीति की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। जैसे अपने प्रथम कार्यकाल के शपथ ग्रहण समारोह  में प्रधानमंत्री मोदी ने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन( सार्क)  के नेताओं को आमंत्रित किया था उसी तरह दूसरे कार्यकाल में भी उन्होंने अपने पड़ोसी देशों के शिखऱ नेताओं  को आमंत्रित किया। एक बडा फर्क यही था कि पिछली बार सार्क के नेताओं को बुलाया गया और इस बार बिम्सेटक के नेताओं को ।





इसी नीति को जारी रखते हुए प्रधानमंत्री ने अपना पहला विदेश दौरा पड़ोसी देशों मालदीव औऱ श्रीलंका के लिये किया। रोचक बात यह है कि ये दोनों भारत के निकटतम द्वीप देश हैं और इन दोनों देशों के साथ भारत के ऐतिहासिक रिश्ते रहे हैं। दोनों सागरीय देश भारत के सामरिक नजरिये से काफी अहमियत रखते हैं। दोनों देशों को हाल तक चीन अपने चंगुल में फंसाने की कोशिश करता रहा है लेकिन अब न केवल मालदीव बल्कि श्रीलंका में भी राजनीतिक  हवा बदलने से भारत के लिये माहौल अनुकूल हो गया और यही वजह है कि करीब  आठ साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने मालदीव का दौरा किया। 2011 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मालदीव दौरा इसलिये मुमकिन हो सका था कि वहां एक जनतांत्रिक सरकार थी लेकिन 2012 में जब राष्ट्रपति नशीद की सत्ता गैरजनतांत्रिक तरीके से पलटी गई तो  भारत और मालदीव के रिश्ते खराब होते चले गए और वहां की सरकार चीन की पिट्ठू बन गई। ऐसे माहौल में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का मालदीव जाना मुमकिन नहीं  हो पाया।

भारत के पड़ोसी देशों में जहां भी जनतांत्रिक सरकारें रही हैं भारत के साथ रिश्ते बेहतर रहे हैं लेकिन इन देशों में अधिनकायकवदी नेताओं के सत्ता ग्रहण करने पर चीन के साथ उनकी नजदीकियां बढने लगती है। इन देशों की सरकारों द्वारा भारत के सामरिक हितों के खिलाफ नीतियां अपनाई जाने लगती हैं।

 लेकिन अब  मालदीव और श्रीलंका में  प्रधानमंत्री मोदी की   8 और नौ जून को जिस गर्मजोशी के साथ आवभागत हुई है वह दर्शाती  है कि ये दोनों देश एक बार फिर से भारत के नजदीक आ गए हैं। भारत किसी देश को अपना पिट्टू नहीं बनाना चाहता लेकिन वह यह भी नहीं चाहेगा कि कोई पड़ोसी  देश भारत के हितों को चोट पहुंचाते हुए चीन की गोद में बैठ जाए।

प्रधानमंत्री मोदी ने  मालदीव और श्रीलंका के दौरे में रक्षा, राजनयिक औऱ आर्थिक रिश्तों को प्रगाढ़ बनाने वाली  कई अहम घोषणाएं कीं जिससे यह उम्मीद की जा सकती है कि इन दोनों द्वीप देशों के साथ भारत के रिश्ते फिर पुराने दिनों जैसे पटरी पर आ जाएंगे। कोई बड़ा या ताकतवर देश अपने पडोसी देशों के साथ जब तक सौहार्दपूर्ण रिश्ता नहीं रखेगा वह विश्व रंगमंच पर प्रभावी भूमिका नहीं निभा सकता। भारत को  विश्व नेता बनने के पहले अपने क्षेत्र में नेता के तौर पर स्थापित करना होगा।  इसके लिये एक मंच सार्क के तौर पर भारत को मिला  था लेकिन इसके एक अहम सदस्य पाकिस्तान की आतंकवाद समर्थक नीति की वजह से भारत के लिये यह मुमकिन नहीं हो पा रहा था। अब भारत को बिम्सेटक के तौर पर एक विकल्प मिला है जिसका इस्तेमाल भारत को प्रभावी तरीके से करना होगा।

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