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समर नीति: दोनों विरोधी गुटों में भारत 

अर्जेन्टीना में पीएम मोदी
अर्जेन्टीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में 30 नवम्बर और एक दिसम्बर को जी- 20 देशों की शिखर बैठक के दौरान दुनिया की निगाहें भारत पर लगी रहीं। इस दौरान अमेरिकी और चीनी खेमे ने भारत को अपनी ओऱ खींचने की कोशिश की। भारतीय कूटनीतिज्ञों की दाद देनी होगी कि भारत ने दोनों नांवों पर अपने पांव रखे औऱ बड़ी कुशलता से दोनों की सवारी की। जहां भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहलीबार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो एबे के साथ त्रिपक्षीय शिखर बैठक का निमंत्रण स्वीकार किया वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका के प्रतिदवंद्वी चीन और रूस के राष्ट्रपतियों के साथ भी त्रिपक्षीय शिखर बैठक में शिरकत की। वास्तव में इस दौरान भारतीय प्रधानमंत्री चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग के साथ तीन बार मिले। एक मुलाकात दिवपक्षीय हुई जब कि रुस और चीन के साथ त्रिपक्षीय मुलाकात और पांच देशों के संगठन ब्रिक्स के साथ भी एक शिखर बैठक में भी प्रधानमंत्री मोदी ने मुलाकात की।
साफ है कि कभी निर्गुट आन्दोलन का अगुआ रहा भारत अब पृथ्वी पर मौजूदा दोनों ताकतवर गुटों के साथ अलग शिखर बैठक में भाग लेकर दुनिया को यह संदेश दे सका कि भारत अब ऐसी ताकत बन चुका है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जहां जापान, अमेरिका और भारत की शिखर बैठक में मुख्य विचारणीय मसला हिंद प्रशांत इलाके में किसी एक खास देश ( यानी चीन ) की दादागिरी का मुकबला करने के लिये चर्चा की गई वहीं दूसरे त्रिपक्षीय गुट रूस, चीन और भारत की शिखर बैठक में अमेरिका की दादागिरी से एकजुट होकर मुकाबला करने का मसला उठा। रुस ,चीन औऱ भारत तीनों देश अमेरिका के एकपक्षीय आर्थिक प्रतिबंधो से परेशान हैं इसलिये तीनों देश अमेरिका की दादागिरी से मुकाबला करने के लिये आपसी सहयोग का रिश्ता औऱ गहरा करना चाहते हैं। ब्रिक्स के मंच से भी भारत, चीन औऱ रूस ने अमेरिका को इसी आशय का संदेश देने की कोशिश की है।
अर्जेन्टीना में यह तो साफ हो गया कि दोनों ताकतवर गुटों के देश भारत को अपने खेमे में रखना चाहते हैं। भारत की दुविधा यह है कि वह रूस का सबसे पुराना सामरिक और रक्षा साझेदार है औऱ रूस पर भारत की सेनाएं 60 प्रतिशत से अधिक निर्भर हैं। इसलिये भारत रूस से दोस्ती में किसी तरह का तनाव नहीं पैदा सर सकता। दूसरी ओर चीन से भारत के गहरे सीमा विवाद हैं जिस वजह से दोनों देशों की सीमाओं पर तनाव पैदा होते रहते हैं। ऐसे वक्त जब चीन देख रहा है कि भारत अमेरिकी खेमे में गया तो हिदं प्रशांत इलाके में चीन के लिये मुश्किलें पैदा कर सकता है भारत भी देख रहा है कि हिंद प्रशांत इलाके में चीन की दादागिरी को चुनौती नहीं दी गई तो दक्षिण चीन सागर से होकर भारत का आना जाना मुश्किल हो जाएगा। दक्षिण चीन सागर से होकर भारत का आधा से अधिक व्यापार होता है इसलिये भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि भारत की समुद्री व्यापारिक आवाजाही निर्बाध तरीके से होती रहे। इसलिये भारत का अमेरिका और जापान के साथ मिल कर चलना जरुरी है लेकिन दूसरी ओर अमेरिका जब ईरान और रूस पर प्रतिबंध लगाता है तो भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिये रूस और चीन का साथ लेना जरुरी हो जाता है। भारत के कूटनीतिज्ञों की दाद देनी होगी कि अपनी कुशल रणनीति से दोनों पक्षों का ला़डला बन गया है। इससे इस बात का भी अहसास होता है कि भारत की मान्यता ऐसी ताकत के तौर पर होने लगी है जिसे सभी पक्ष अपने खेमे में रखने में अपना पलड़ा भारी होता देखते हैं।





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