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समर नीति: चीन से मुकाबले के लिये चार देश

पीएम मोदी और जिनपिंग

हिंद प्रशांत के चार प्रमुख देशों भारत, अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के बीच सिंगापुर में तीसरी बैठक सम्पन्न हो चुकी है। इस बैठक पर सामरिक हलकों की विशेष निगाह थी क्योंकि ये चारों देश हिंद प्रशांत के दक्षिण और पूर्वी चीन सागर के इलाके में चीन के बढ़ते विस्तारवाद और प्रभुत्ववादी नीति के खिलाफ एकजुट हो कर साझा रणनीति अपना पर आपसी सहयोग से काम करना चाहते  हैं। हालांकि हिंद प्रशांत के ये चारों देश आपसी बैठक को  गुट या गठजोड़ या संधि या और किसी तरह का नाम नहीं दे रहे हैं लेकिन इस बैठक की अहमियत इसी में है कि चारों देश हिंद प्रशांत इलाके में शांति व स्थिरता को चीन द्वारा पेश चुनौती का एकजुट हो कर विरोध कर रहे हैं। हालांकि चारों देशों  में खासकर भारत यह आभास नहीं देना चाहता कि वह चीन के खिलाफ किसी मोर्चेबंदी में शामिल हो रहा है और सिंगापुर में 15 नवम्बर को हुई बैठक के बाद इस पहलू पर अपना रुख पहले से काफी नरम कर लिया है लेकिन भारत  भी यही चाहता है कि दक्षिण चीन सागर में चीन  अपना दादागिरी का रवैया समाप्त करे।





चीन न केवल दक्षिण चीन सागर बल्कि हिंद महासागर में भी  अपने पांव पसार रहा है और भारत सहित दुनिया की सभी जनतांत्रिक ताकतों के लिये यह भी चिंता का मसला बन चुका है कि चीन की  इस समुद्री विस्तारवादी रणनीति  का किस तरह मुकाबला करे। चूंकि भारत और चीन के रिश्ते काफी संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं और चीन से रिश्ते सुधार कर आपसी विवाद के मसलों को हल करने को भारत प्राथमिकता दे रहा है इसलिये  भारत ने खुल कर चीन के खिलाफ बोलना अब बंद कर दिया है लेकिन हिंद प्रशांत के चार देशों के ग्रुप में शामिल होना ही इस बात का सूचक है कि  हिंद प्रशांत इलाके में चीन के विस्तारवादी रवैये का मुकाबला करने के लिये भारत बाकी तीन देशों के साथ है।

शायद चीन के साथ संवेदनशील रिश्तों के मद्देनजर ही  भारतीय रणनीतिकारों ने कुछ वक्त से यह कहना शुरु कर दिया है कि  भारत हिंद प्रशांत इलाके के सभी देशों को साथ ले कर चलना चाहता है। भारत का मुख्य इरादा इस पूरे इलाके में शांति व स्थिरता सुनिश्चित करना है औऱ यह चीन को भी साथ लेकर हासिल किया जा सकता है। चीन यदि इसमें शामिल हो जाए तो बाकी देशों के लिये भी यह राहत की बात होगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या चीन  दक्षिण चीन सागर के इलाके में अपने विस्तारवादी रुख का त्याग करेगा और इस सागरीय इलाके के बड़े हिस्से पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का सपना त्याग देगा?  जब तक चीन इस इलाके में कृत्रिम द्वीपों का निर्माण बंद नहीं कर देगा और कुछ द्वीपों पर अपने दावे को छोड़ नहीं देता है तब तक प्रशांत सागर के इलाके में तनाव का माहौल बना ही रहेगा। दक्षिण चीन सागर के इलाके से  होकर ही भारत का आधा से अधिक समुद्री व्यापार होता है इसलिये भारत के नजरिये से यह काफी अहम है कि  यह इलाका  पोतों के आवागमन के लिये खुला रहे। इस इलाके से नौवहन की गतिविधियां बिना किसी रोकटोक के चलें औऱ इस इलाके से होकर हवाई  उड़ानों पर किसी तरह की पाबंदी नहीं हो। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चीन जब तक यह भरोसा नहीं देगा कि उसका इस समुद्री इलाके पर प्रभुत्व स्थापित करने का कोई इऱादा नहीं है और वह अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का समुचित आदर करता रहेगा तब तक हिंद प्रशांत इलाके को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता बनी रहेगी और चारों देशों भारत, आस्ट्रेलिया , अमेरिका औऱ जापान को अपनी एकजुटता और मजबूत करते रहने का संदेश चीन को देते रहना होगा औऱ इसके लिये जरुरी जमीनी कदम भी उठाकर चीन को यह संदेश देना होगा कि पूर्वी औऱ  दक्षिण चीन सागर के इलाके पर उसकी दादागिरी नहीं चलने देंगे।

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