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समर नीति: चीन, जापान और भारत एक मंच पर हों

India,-China-&-Japan

अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में टोक्यो और पेइचिंग में भारत-जापान और जापान-चीन की दो अहम शिखर बैठकें हुई हैं। अब तक यह माना जा रहा था कि भारत और जापान एकजुट होकर चीन के खिलाफ खड़ा होने की रणनीति बनाने में जुटे हैं। लेकिन पेइचिंग में चीन और जापान के शिखर नेताओं ने जो उद्गार व्यक्त किये हैं उनसे लगता है कि चीन अब जापान के साथ मेलजोल बढ़ाने को तैयार हो रहा है। दूसरी ओर 28-29 अक्टूबर को टोक्यो में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शिखर बैठक के दौरान हिंद प्रशांत इलाके में चीन के उग्र होते तेवरों को लेकर गहन चर्चा हुई और यह माना गया कि चीन की सागरीय चुनौतियों का मुकाबला करने के लिये भारत और जापान को अमेरिका और अन्य साथी देशों का साथ लेना होगा।





पेइचिंग और टोक्यो में हुई शिखर बैठकों के छह महीने पहले अप्रैल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति शी चिन फिंग की चीन के वूहान शहर में बहुचर्चित शिखर बैठक के दौरान भारत और चीन के रिश्तों को नये सिरे से व्यवस्थित करने पर भी बातचीत हुई। साफ है कि पेइचिंग, टोक्यो और नई दिल्ली में तीनों देशों के नेताओं की जो मुलाकातें हो रही हैं वे शांति, सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चत करने के लक्ष्य घोषित करती हैं।

लेकिन यह लक्ष्य तब तक हासिल नहीं हो सकते जब तक कि चीन और जापान और भारत औऱ चीन के बीच चल रहे भूभागीय विवाद हल नहीं हो जाएं। भारत और चीन के बीच पिछले साल भूटान के दावे वाले डोकलाम इलाके में जो सैन्य तनातनी पैदा हुई उससे भारत औऱ चीन के बीच तनाव अपने चरम पर पुहंचा। दूसरी ओर सेंकाकू (त्यावु ) द्वीप को लेकर चीन और जापान के बीच भी सैन्य तनातनी चल रही है जिस वजह से पिछले सात साल से चीन औऱ जापान के शिखर नेताओं के एक दूसरे के यहां दौरे नहीं हुए। अब जबकि डोकलाम के बाद भारत और चीन ने अपने तनाव कम करने की कवायद शुरू कर दी है चीन औऱ जापान ने भी अपने रिश्तों को नया मोड़ देने का संकल्प जाहिर किया है।

ऐसे में क्या यह उम्मीद की जाए कि भारत, जापान औऱ चीन जब आपसी द्विपक्षीय रिश्ते तनाव रहित बना रहें हों तो एशिया में तीनों देशों के बीच त्रिपक्षीय सहयोग का एक नया युग शुरू हो सकता है। वास्तव में चीन जिस तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा छेड़े गए व्यापार युद्द से परेशानी में पड़ गया है उसके मद्देनजर चीन का जापान और भारत के प्रति रुख कुछ नरम हुआ लगता है। चीन को यह समझना होगा कि अमेरिका की दादागिरी से मुकाबला करने के लिये एशिया के दोनों महारथियों भारत और जापान को साथ ले कर चलना होगा। इसके लिये उसे भारत औऱ चीन के साथ सामरिक मोर्चे पर होड़ रोकनी होगी औऱ दोनों देशों के साथ अपने सीमा व भूभागीय विवादों का जल्द हल खोजना होगा। भारत औऱ चीन व चीन और जापान के बीच प्रादेशिक भूभागीय विवाद हल हो जाएं तो तीनों देशों के बीच आपसी रंजिश औऱ तनाव की कोई वजह नहीं बनती है।

भारत, जापान और चीन तीनों एशिया की अग्रणी ताकतें हैं औऱ यदि तीनों साथ मिल जाएं तो एशिया में शांति, सुरक्षा व समृदिध में आपसी सहयोग औऱ योगदान गहरा कर सकते हैं। तीनों देशों का एशिया में जो आर्थिक व सामरिक प्रभाव है उसके समन्वित इस्तेमाल से न केवल एशिया बल्कि पूरे विश्व पर सकारात्मक असर पड़ेगा।

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