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समर नीति: श्रीलंका से रिश्तों का नया दौर

राष्ट्रपति राजपक्षे गोताबाया और पीएम मोदी

श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपक्षे गोताबाया  द्वारा अपना पदभार ग्रहण करने के दो सप्ताह के भीतर ही सबसे पहला विदेश दौरा भारत को चुनना औऱ फिर भारत आ कर भारत की सामरिक चिंताओं को दूर करने वाला बयान देना भारतीय राजनयिक औऱ सामरिक हलकों के लिये राहत देने वाली बात है। लेकिन श्रीलंका इन वायदों को निभाने के लिये कितना स्वतंत्र है यह वक्त ही बताएगा। चीन पर अपनी  आर्थिक सार्वभौमिकता को काफी हद तक निर्भऱ बना देने के बाद श्रीलंका के लिये चीन के हितों की भी उपेक्षा करना आसान नहीं होगा। यही वजह है कि श्रीलंका के नये राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे जल्द ही चीन जाने का मन बना चुके  हैं। हालांकि  भारत आने के पहले श्रीलंका के नये राष्ट्रपति कह चुके हैं  कि वे भारत को रिश्तेदार मानते हैं तो चीन को आर्थिक साझेदार। श्रीलंका के राष्ट्रीय हितों के नजरिये से देखे तो उसका यह हक बनता है कि वह दुनिया के किसी भी देश के साथ अपने  आर्थिक व सामरिक रिश्तों को विकसित करे।





साफ है कि श्रीलंका के नये राष्ट्रपति भारत औऱ चीन के रिश्तों में संतुलन बनाने की रणनीति पर चल रहे हैं लेकिन भारत के नजरिये से यह संतुलन की कूटनीति भी भारत के हितों के अनुकूल नहीं होगी। श्रीलंका चीन के साथ सामान्य आर्थिक औऱ राजनयिक रिश्ते रखे तो इससे भारत को कोई परेशानी नहीं होगी लेकिन जब वह अपने पड़ोसी भारत के साथ दूरदराज के किसी देश के साथ संतुलन बनाने की बात करे तो यह भारत को नागवार गुजरता है।

हालांकि यह श्रीलंका का  सम्प्रभु अधिकार है कि वह भारत को भी नजरअंदाज करे औऱ दूर के किसी देश के साथ रिश्तेदारी बनाए लेकिन जब कोई देश श्रीलंका जैसे छोटे देश को झांसे में लेकर उसे अपने पर निर्भऱ बना दे तो भारत के लिये यह चिंता करना उचित होगा कि वह अपने पड़ोसी देश को आगाह करे। हमें पता है कि श्रीलंका अऱब सागर में ऐसे समुद्री व्यापारिक मार्ग पर स्थित है जहां से दुनिया के व्यापारिक जहाजों के अलावा नौसैनिक पोतों की भी आवाजाही होती है। इसलिये इसके मद्देनजर श्रीलंका की सामरिक अहमियत बढ़ जाती है और यही वजह है कि श्रीलंका के साथ सामरिक रिश्ते गहरे करने की चिता दूर दराज के देशों की रहती है। श्रीलंका में अपनी नौसैनिक मौजूदगी बना कर कोई भी देश यहां के नजदीक समुद्री व्यापारिक मार्ग पर अपना दबदबा स्थापित कर सकता है औऱ किसी भी देश के व्यापारिक पोतों की आवाजाही रोक सकता है।

भारत के लिये सबसे बड़ी अहमियत यही है कि भारत के नजदीक स्थित श्रीलंका द्वीप   कोई दूर का देश अपनी मौजूदगी बना कर भारत  की घेराबंदी नहीं करे। गोतबाया के बड़े भाई महीन्दा राजपक्षे की साल 2009 से 2015 तक चली सरकार के दौरान जब चीन की दो पनडुब्बियां श्रीलंका के तट पर पहुंची थीं तो भारत के कान खड़े हुए थे औऱ भारत  के आला सुरक्षा अधिकारियों ने श्रीलंका के राजनेताओं को साफ शब्दों में आगाह भी कर दिया था कि वह भारत का पड़ोसी है न कि चीन का औऱ यदि उसने भारत के सामरिक हितों पर किसी तरह की आंच डाली तो वह श्रीलंका के  लिये ठीक नहीं होगा।

भारत को भी देखना होगा कि वह श्रीलंका के साथ संजीदगी से पेश आए औऱ उसे भरोसा दिलाए कि वह श्रीलंका के अंदरुनी मामलों में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेगा औऱ न ही करना चाहेगा। दूसरी ओऱ श्रीलंका को भी देखना होगा कि वह अपने तमिल अल्पसंख्यकों के साथ मानवीय तरीके से पेश आए औऱ किसी तरह का भेदभाव नहीं करे। राष्ट्रपति गोतबाया ने यही भरोसा भारतीय नेताओं को दिया है।  इसी पृष्ठभूमि में भारत औऱ श्रीलंका के भविष्य के रिश्ते गहराई पकड़ने की गुंजाइश रखेंगे।

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