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समर नीति: सामरिक साझेदारी की नीति फेल क्यों ?

भारतीय लड़ाकू विमान

बडे शस्त्र मंचों जैसे लड़ाकू विमान, पनुब्बियां , मुख्य युद्धक टैंकों , हेलीकाप्टर आदि का उत्पादन देश में ही करने के  लिये रक्षा मंत्रालय ने  करीब एक साल पहले एक सामरिक साझेदारी नीति ( एसपी पालिसी ) की घोषणा की थी और उम्मीद की थी कि  अब अरबों डालर वाले बड़े हथियार  मंचों का देश में ही उत्पादन हो सकेगा। लेकिन इस नीति के तहत अब तक एक भी प्रोजेक्ट का शुरु नहीं होना यह दर्शाता है कि  इस नीति में बड़ी खामी थी जिस वजह से कोई भी विदेशी कम्पनी किसी भारतीय कम्पनी के साथ भारत में अपने हथियार मंचों का उत्पादन करने के लिये भारत में कारखाना लगा सकी। हालांकि पिछले साल 31 मई को जब सामरिक साझेदारी की नीति का ऐलान हुआ तो इसके बाद अमेरिकी और स्वीडिश कम्पनियों ने भारत की कई अग्रणी कम्पनियों जैसै टाटा, एल एंड टी, रिलायंस , अडानी आदि के साथ साझेदारी का ऐलान भी कर दिया लेकिन चूंकि रक्षा मंत्रालय की सामरिक साझेदारी की नीति में कई विरोधाभास थे इसलिये रक्षा मंत्रालय सामरिक साझेदारी के तहत किसी को बड़े हथियार बनाने का ठेका नहीं दे सका।





सरकार की सामरिक साझेदारी नीति की वजह से रक्षा महकमे में भ्रम का माहौल रहा और इस वजह से सेनाओं को जो बड़े शस्त्र मंच अब तक मिल जाने चाहिये थे वे कितने साल बाद मिलेंगे इसका कोई निश्चत जवाब नहीं दिया जा सकता। मसलन वायुसेना को  126 लड़ाकू विमान मुहैया कराने की प्रक्रिया 2007 में औपचारिक तौर पर शुरू कर दी गई थी हालांकि इसकी योजना पर विचार सन 2000 से ही शुरु हुआ था लेकिन अब तक ये लड़ाकू विमान वायुसेना को नहीं दिये जाने से भारत की हवाई आक्रामक क्षमता में भारी ह्रास हुआ है और जिस तरह से लड़ाकू विमानों के स्क्वाड्रन रिटायर होते जा रहे हैं उससे तो यही लगता है कि  वायुसेना की हमलावर क्षमता लगातार गिरती  जाएगी। करीब तीन महीना पहले रक्षा मंत्रालय ने जिस 110 लड़ाकू विमानों को हासिल करने का शुरुआती टेंडर (आरएफआई) जारी किया है वह भी कब तक वायुसेना के हाथ लगेगा शक है क्योंकि अब देश में आगामी संसदीय चुनावों की आहट शुरू हो चुकी है और राफेल लडाकू विमानों के सौदे में विपक्षी कांग्रेस द्वारा लगाए गए आरोपों से तिलमिलाई सरकार संसदीय चुनावों के पहले किसी बड़े रक्षा सौदे को अंजाम देगी इसमें संदेह है।

वायुसेना की तरह ही नौसेना भी आधुनिक पनडुब्बियों के लिये तरस रही है।  2006 में फ्रांस से छह स्कारपीन पनडुब्बियों का सौदा सम्पन्न करने के बाद  ही प्रोजेकेट-75-आई के तहत देश में छह पनडुब्बियों को बनाने पर सरकार ने सहमति दी थी  लेकिन आज तक इसकी फाइलें कहां अटकी है कहा नहीं जा सकता।  नौसेना के पास फिलहाल 15 पनडुब्बियां बची हैं और इतने से पूरे हिंद महासागर की समुचित चौकसी मुमकिन नहीं हो सकती। खासकर जब हिंद महासागर में चीन ने अपने युद्धपोतों और पनडुब्बियों का बेड़ा भेजना शुरू कर दिया है भारतीय नौसेना को औऱ भी चौकन्ना रहने की जरूरत है। न केवल  हिंद महासागर बल्कि दक्षिण चीन सागर औऱ प्रशांत सागर तक के इलाके में भारत को अपनी नौसैनिक मौजूदगी दर्ज कराने के लिये अपने युद्धपोतों का बेड़ा तुरंत बढ़ाने की जरूरत है।   इसी तरह थलसेना को भी आधुनिक तोपों और कई अन्य हमलावर प्रणालियों की जरुरत है लेकिन इन्हें हासिल करने की प्रक्रिया भी बड़ी जटिल चल रही है।

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