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समर नीतिः भारत सार्क से दूर क्यों ?

SAARC सम्मेलन में पीएम मोदी
SAARC सम्मेलन में पीएम मोदी (फाइल फोटो)

आतंकियों के जिस देश में कोई भी देश क्रिकेट के मैच नहीं खेलना चाहता है उसी तरह आठ सदस्य देशों वाले सार्क यानी दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन की इस्लामाबाद में आयोजित शिखर बैठक में भी भाग लेने को सार्क के कई सदस्य राजी नहीं हो रहे। पिछली बार नवम्बर, 2016 में इस्लामाबाद में सार्क की शिखर बैठक आयोजित होनी थी लेकिन उसी साल उड़ी में पाकिस्तान की ओर से हुए आतंकी हमले में पाकिस्तान का हाथ बताकर भारत ने जब शिखर बैठक में भाग लेने से इनकार किया तब सार्क के अन्य पांच सदस्यों बांग्लादेश,  अफगानिस्तान,  श्रीलंका, भूटान और मालदीव  ने भी इस्लामाबाद जाने से मना कर दिया। तब से सार्क शिखर बैठक अधर में लटकी है।





सार्क के दूसरे सदस्य देशों पर पाकिस्तान दबाव डाल रहा है कि 19 वीं शिखर बैठक के आयोजन के लिये हवा बनाए लेकिन भारत ने साफ किया है कि जब तक पाकिस्तान सार्क के सदस्य देशों के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को बंद नहीं करवाता पाकिस्तान की मौजूदगी में सार्क की छत के नीचे सहयोग की मीठी बातें नहीं की जा सकतीं।

वास्तव में पाकिस्तान की आतंक समर्थक नीतियों से न केवल भारत बल्कि अफगानिस्तान भी त्रस्त है और बांग्लादेश की भी शिकायत है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई उसके यहां उग्रवादी तत्वों के साथ सांठगांठ कर बांग्लादेश में अस्थिरता पैदा करना चाहती है।

सार्क के सदस्यों के आरोपों के बावजूद पाकिस्तान अपने यहां आतंकी तत्वों को शरण औऱ संरक्षण देने के साथ उन्हें तरह-तरह की वित्तीय औऱ सैनिक मदद देने से बाज नहीं आ रहा। सार्क में सहयोग का माहौल तभी बन सकता है जब तक सार्क के आठों सदस्यों के बीच एक-दूसरे पर पूरा भरोसा नहीं बने। सार्क की छत के तहत आठ सदस्य देशों के एक साथ आने का एक बड़ा उद्देश्य यही था कि सभी देशों के बीच निर्बाध व्यापार हो। लेकिन पाकिस्तान इसे नहीं मानता। जब वह भारत को विश्व व्यापार संगठन द्वारा दिये गए सर्वाधिक पसंदीदा देश (एमएफएन) का दर्जा भी देने को तैयार नहीं हो तो पाकिस्तान किस मुंह से सार्क का एजेंडा आगे बढ़ाने में अपने योगदान का दावा करता है। यही नहीं अफगानिस्तान और भारत के बीच जमीनी व्यापार में भी वह अडंगा डाल रहा है। अफगानिस्तान अपना व्यापारिक माल सड़क के रास्ते भारत तो ला सकता है लेकिन वही छूट भारत को नहीं दी गई है। आखिर सहयोग की यह कैसी भावना है। पाकिस्तान को यदि सार्क की सहयोगी भावना से अपना योगदान करना है तो उसे न केवल राज्य की नीति के तौर पर आतंकवाद को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना बंद करना होगा बल्कि सदस्य देशों के बीच खुला व्यापार में भी सक्रिय भागीदारी करनी होगी। 1985 में जब सार्क की स्थापना हुई थी तब सोचा गया था कि सार्क के सदस्य देशों में खुला आर्थिक व्यापार होगा, खुली आवाजाही होगी और एक दूसरे के लिये निवेश और व्यापार का खुला प्रतिस्पर्द्धी माहौल होगा। लेकिन पाकिस्तान ने व्यापार के लिये अपने सभी दरवाजे बंद किये हुए हैं। उसके यहां यदि कोई उद्योग पनपा है तो वह आतंकवाद का जिसकी बदौलत पाकिस्तान ने पिछले 17 वर्षों में अमेरिका से 33 अरब डालर की फिरौती वसूल की है। आज जरूरत इस बात की है कि सार्क के सदस्य देश मिल कर पाकिस्तान पर दबाव डालें कि वह आतंक समर्थक नीति त्यागने का भरोसा पैदा करेगा तभी इस्लामाबाद में सार्क  की 19वीं शिखर बैठक आयोजित हो सकती है।

 

 

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