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समर नीति: जिधर भारत बैठेगा, उसका पलड़ा भारी होगा

मनीला में 4 देशों की बैठक

नवम्बर और दिसम्बर का महीना भारतीय राजनय के इतिहास में बहुपक्षीय वार्ताओं के लिये याद किया जाएगा।  गत 13 नवम्बर को मनीला में जब भारत, अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की चर्तुपक्षीय वार्ता की उद्घाटन बैठक हुई थी तब पूरी दुनिया में इसने ध्यान खींचा था। तब भारत ने कहा था कि भारत अपने हितों के मद्देनजर इस तरह की बहुपक्षीय वार्तोओं में भाग लेता है। इसके पहले भारत, जापान और अमरीका के साथ त्रिपक्षीय वार्ता कर चुका है। अब जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच भी एकत्रिपक्षीय वार्ता 13 दिसम्बर को हुई है। इन सभी वार्ताओं का दौर शुरू करने के पहले भारत रूस और चीन के साथ त्रिपक्षीय वार्ता का दौर चलाने के लिये पिछले दशक के शुरु में तैयार हुआ था। 11 दिसम्बर को हुई इस वार्ता के 15 दौर पूरे हो जाने के बाद भी भारत इन देशों के साथ सामरिक मसलों पर तालमेल नहीं बना सका है। मसलन भारत , रूस और चीन की त्रिपक्षीय बैठक में कभी भी भारत की इस इच्छा पर मुहर नहीं लगाई कि भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होना चाहिये।





आतंकवाद के मसले पर भी चीन और रूस काफी सम्भल कर केवल इशारों में ही कड़े बयान जारी करते रहे हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ जब पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद का नाम इस त्रिपक्षीय मंच से नहीं लिया गया। परमाणु तकनीक और सामग्री के मामले में अग्रणी देशों के क्लब न्युक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) की सदस्यता जैसे मसले पर भी चीन अपना समर्थन देने से बचता रहा है। भारत, चीन और रूस के बीच त्रिपक्षीय वार्ता केवल औपचारिकता निभाने के लिये साल में एक बार होती है और तीनों देश केवल मुहावरेबाजी वाले साझा बयान जारी कर संतोष कर लेते हैं फिर भी तीनों देशों के बीच इस त्रिपक्षीय वार्ता का जारी रहना इसलिये जरूरी है कि तीनों देश आपसी मतभेदों के मसले पर दो टूक बातचीत करते रहें।

दूसरी ओर चीन और रूस के प्रतिद्वंदी देश माने जाने वाले अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ जब त्रिपक्षीय और चर्तुपक्षीय वार्ताएं शुरू हुईं तो तीनों देशों ने कहा कि उनके सामरिक हित मेल खाते हैं और तीनों देश इन मसलों पर आपसी समन्यव बनाए रखेंगे। त्रिपक्षीय और चर्तुपक्षीय वार्ताओं का दौर चलते रहना इसलिये जरूरी है कि इनके इकट्ठा बैठने पर दूसरे पक्ष के देशों में खलबली मचती है। चीन की चिंता इस बात को लेकर होगी कि दक्षिण चीन सागर में उसकी आक्रामक सैन्य नीति का मुकाबला करने के लिये भारत समान विचार वाले देशों को साथ लेकर अपने सामरिक हितों की पूर्ति कर रहा है। वास्तव में यह भारत की ही सैनिक और आर्थिक ताकत है कि उसे दूसरे ताकतवर देश अपने पाले में रखने के लिए बेताब हैं। भारत जिस तरफ पांव रखेगा उसका पलड़ा भारी हो जाएगा। हिंद प्रशांत इलाके में भारत को एक स्थिरता प्रदान करनेवाली ताकत के तौर पर माना जाने लगा है और अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के विचार भारत के इन विचारेों से मेल खाते हैं कि हिंद प्रशांत के समुद्री इलाके में शांति व स्थिरता बनाए रखने और टकराव टालने के लिये नियम आधारित अंतर्राष्ट्रीय संधियों का पालन करना चाहिये। इस बयान का इशारा चीन की ओर होता है जो दक्षिण चीन सागर के इलाके में एकपक्षीय तौर पर अपनी समु्द्री सीमाओं का विस्तार करता जा रहा है।

 

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