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समर नीति: तालिबान लौटेगा तब क्या होगा ?

तालिबान

17 साल तक आतंकवाद से जूझने के बाद अमेरिका अब इसके सामने आत्मसमर्पण करता लग रहा है। 2001 में जब अफगानिस्तान में तालिबानी शासन की शह पर अल कायदा ने न्यूयार्क और वाशिंगटन में हवाई कहर ढाया था तब अमेरिका ने अफगानिस्तान से आतंकवादियों के सारे ठिकानों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई की थी कि उसके होश उड़ गए थे। तालिबानी सत्ता उखाड़ फेंकी गई थी और इसके बदले एक जनतांत्रिक सरकार को काबुल पर बैठाया गया था। करीब सात साल तक सब कुछ ठीक चलता रहा लेकिन इस बीच पाकिस्तानी सेना अपना खेल कर रही थी और उसने अपनी धरती पर तालिबान को फिर से सैनिक साज सामान और ट्रेनिंग दे कर उसे ताकतवर बना दिया और दूसरी ओर अमेरिका पाकिस्तान की इस चाल को नजरअंदाज करते हुए उसकी चिरौरी ही करता रहा।





हालांकि अमेरिकी अगुवाई में सवा लाख से अधिक अंतरराष्ट्रीय सैनिकों (आईएसएएफ) की वहां तैनाती की वजह से राष्ट्रपति हामिद करजाई के नेतृत्व में जनतांत्रिक सरकार को अपना पांव जमाने का भी मौका मिला लेकिन इस दौरान पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में अपना दबदबा बहाल करने के लिये तालिबान को हर सम्भव सहायता दी और वहां तालिबान ने पाकिस्तान को अपना अड्डा बना कर लगातार घातक आतंकवादी हमले जारी ऱखे और अब हाल यह है कि अफगानिस्तान के अधिकांश हिस्से पर तालिबान का ही प्रभुत्व है।

अमेरिका अब इसे सच्चाई मानते हुए उसी तालिबान से सीधी बातचीत की पहल कर चुका है जिसके आतंकवादियों को उसने ग्वांटानामा बे (Guantanamo Bay) जेल में रख कर असीम यातनाएं दी थीं। आखिर उस तालिबान से सीधी बातचीत का मतलब क्या है? तालिबान तो यही चाहता है कि काबुल की पूरी सत्ता उसके हाथों सौंप दी जाए। वह अशरफ गनी की जनतांत्रिक सरकार से किसी तरह सत्ता का बंटवारा नहीं चाहता है। तालिबान ने अमेरिका से सीधी बातचीत के लिये शर्त रखी है कि सबसे पहले सभी तालिबानी जेहादियों को रिहा किया जाए और उन पर संयुक्त राष्ट्र और अमेरिकी प्रशासन द्वारा जो प्रतिबंध लगाया गया है वह हटा लिया जाए। यानी जब ये तालिबानी आतंकवादी काबुल की सड़कों पर छुट्टे घूमने लगेंगे तो उसका वहां के लोगों और सुरक्षा बलों के मनोबल पर कितना प्रतिकूल असर पडेगा।

तालिबान यह भी चाहता है कि अफगानिस्तान से सभी विदेशी सैनिक हटा लिये जाएं उसके बाद ही अमेरिका से कोई सार्थक बातचीत होगी। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कह ही दिया है कि वह तालिबान से बातचीत के लिये अफगानिस्तान में अंतरराष्ट्रीय सैन्य बलों की भूमिका पर बातचीत को तैयार हैं। तालिबान ने अमेरिका के इस नये रुख का स्वागत किया है। यदि तालिबान और अमेरिका के बीच यह ताजा प्रेम प्रसंग जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब तालिबान का फिर काबुल पर राज होगा।

एक अहम सवाल यह उठता है कि अफगानिस्तान में भारत ने जो निवेश किया है उसका क्या होगा? अफगानिस्तान और वहां से मध्य एशिया तक जाने के लिये ईरान के जिस चाबाहार बंदरगाह का विकास भारत कर रहा है उसका क्या होगा? क्या तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद भारतीय रणनीति पर वहां कयामत नहीं आएगी। तालिबान के लौटते ही पाकिस्तान की सेना का मनोबल इतना ऊंचा हो जाएगा कि जम्मू कश्मीर में वह सैन्य कार्रवाई में और तेजी लाएगा। काबुल में तालिबान की वापसी से क्या वहां फिर अल कायदा अपनी जडें जमाने लगेगा ? हो सकता है कि इस बार तालिबान ऐसी गलती नहीं करे। लेकिन काबुल की सत्ता पर तालिबान के दोबारा लौटने की आशंका भारतीय समर नीति के लिये भारी उलटफेर पैदा कर सकती है और भारत के सामने एक नई सामरिक चुनौती पैदा हो सकती है जिससे दीर्घकाल तक भारत को निबटना मुश्किल होगा।

 

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