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समर नीति: समुद्री परमाणु क्षमता की जरूरत है क्या ?

आईएनएस अरिहंत

अरिहंत परमाणु पनडुब्बी को परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल से लैस करने और इसके सफल समुद्री परीक्षण का ऐलान करने के बाद भारत ने कहा है कि भारत अब त्रिआयामी परमाणु क्षमता से लैस हो गया है। जमीन, समुद्र औऱ आसमान से परमाणु बम दुश्मन के इलाके पर गिराने की क्षमता को ही त्रिआयामी परमाणु क्षमता कहा जाता है जिसकी बदौलत दुश्मन देश में यह खौफ पैदा करने की ताकत हासिल करने का दावा किया जाता है कि .यदि भारत पर परमाणु हमला हुआ तो भारत इसका जमीन, समुद्र या आसामान कहीं से भी दुश्मन देश पर जवाबी परमाणु हमला करने में सक्षम होगा। इस तरह दुश्मन देश को यह चेताया गया है कि भारत पर परमाणु हमला कर यदि जमीन पर मौजूद सभी परमाणु हथियार अड्डों को तहस नहस भी कर दिया जाता है तो भारत के पास समुद्र के भीतर छुपा कर रखी गई परमाणु बम से लैस बैलिस्टिक मिसाइल को दुश्मन देश पर गिराने से नहीं चूकेगा।





सवाल यह उठता है कि क्या जमीन पर एक ही स्थान पर भारत का परमाणु हथियार भंडार होगा जिसे दुश्मन देश अपने परमाणु हमले से तबाह कर देगा तो भारत के पास जवाब देने के लिये कुछ नहीं बचेगा। ऐसा नहीं होता। जमीन पर कई अड्डों पर परमाणु बम मिसाइलों में भर कर रखे जाते हैं। दुश्मन देश यदि भारत पर हमला करता भी है तो सभी परमाणु ठिकानों पर तो हमला नहीं कर सकता। यदि उसे भारत को निशाना बनाना भी होगा तो किसी बड़ी आबादी वाले महानगर को न कि किसी परमाणु हथियार अड्डे को। इसलिये यदि दुश्मन देश भारत के एक शहर को नष्ट कर देता है तो भारत के पास जवाबी परमाणु हमले का जवाब देने के लिये जमीन पर किसी दूसरे इलाके में तैनात परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल या फिर परमाणु बम से लैस किसी लड़ाकू विमान से दुश्मन के इलाके पर गिराया जा सकता है। जवाबी हमले के लिये जरूरी नहीं कि समुद्र के भीतर छुपा कर रखी गई परमाणु पनडुब्बी को ही निर्देश दिया जाए कि वह दुश्मन देश पर जवाबी परमाणु हमला करे।

चूंकि जमीन पर मौजूद मिसाइली बम या फिर लड़ाकू विमान में तैनात परमाणु बम को दुश्मन देश एक ही हमले में चुनचुन कर नष्ट नहीं कर सकता इसलिये यह मान कर चल सकते हैं कि एक दो परमाणु अड्डा तो जरूर बचा रहेगा ही जिसे दुश्मन देश पर हमला करने का निर्दश दिया जा सकता है। इसके मद्देनजर हम यह कह सकते हैं कि समुद्र के भीतर परमाणु ताकत का जो तीसरा आयाम विकसित करने की बात कही जा रही है उसकी विशेष जरुरत नहीं है। समुद्री परमाणु बम को तैनात करने के पर जो खर्च आएगा और भविष्य में इसे और मजबूत करते रहने की जो जरुरत होगी उसके मद्देनजर हम यह कल्पना कर सकते हैं कि इस क्षमता को व्यावहारिक रुप की शक्ल देने में अरबों डालर का खर्च तो होगा ही उसके सालाना मेनटेनेंस पर भी भारी खर्च होगा। फिलहाल परमाणु ताकत के तीसरे समुद्री आयाम के लिये भारत ने अऱिहंत परमाणु पनडुब्बी को ही समुद्र में उतारने में कामयाबी पाई है और इसमें 750 किलोमीटर दूर तक मार करने वाली के-15 परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल तैनात की जा सकी है जिसे समुद्र के भीतर छुपा कर रखा जा सकता है। लेकिन जिस तरह चीन खुद अपनी परमाणु पनडुब्बियों की क्षमता लगातार बढ़ाता जा रहा है और वह पाकिस्तान को भी एक परमाणु पनडुब्बी देने पर विचार कर रहा है उसके मद्देनजर समुद्री परमाणु क्षमता तैनात करने की होड़ आने वाले सालों में हम बढ़ने की ही सम्भावना देख रहे हैं। भारत इस होड़ में अनावश्यक फंसने जा रहा है। भारत को यदि जवाबी परमाणु क्षमता की ही चिंता है तो वह आसानी से जमीन आधारित परमाणु अड्डों से हासिल की जा सकती है।

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