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समर नीति: पाकिस्तान-अमेरिका के रिश्तो में यू-टर्न चिंताजनक

इमरान खान और डोनाल्ड ट्रंप
फाइल फोटो

पाकिस्तान और अमेरिका के बीच रिश्तों ने अचानक यू-टर्न यानी उलटा मोड़ ले लिया है। साल 2001 में 9-11 के  भयंकर आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को चेतावनी दी थी कि नहीं सुधरा तो पाषाण युग में भेज देंगे। इसके तुरंत बाद जिद्दी पाकिस्तान ने न केवल अमेरिका से वादा किया कि वह अपनी धरती  पर अल-कायदा और तालिबान सहित विभिन्न आतंकवादी गुटों को पनाह नहीं देगा बल्कि 2004 में पाकिस्तान के घमंडी राष्ट्रपति औऱ सेनाध्यक्ष जनरल परवेज मुशर्रफ ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से भी लिखित वादा किया कि अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी आतंकवादी हरकतों के लिये नहीं करने देंगे। कुछ साल तक तो पाकिस्तान  न केवल अमेरिका के भय से सहमा रहा औऱ तालिबान और अलकायदा पर अंकुश लगाया बल्कि भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों पर भी लगाम लगाया रहा जिससे जम्मू-कश्मीर में शांति व स्थिरता का माहौल रहा।





 लेकिन जैसे जैसे अमेरिका ने पाकिस्तान पर  से लगाम ढीला करना शुरू किया पाकिस्तान फिर पुराने तेवर में लौटने लगा औऱ भारतीय जम्मू कश्मीर से लगी अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी तेज कर दी। संघर्षविराम के वादे को तोड़ने लगा और भारतीय इलाके में आतंकवादी हमले तेज होने लगे।  अमेरिका ने इन सबकी अनदेखी की और अब अमेरिका जब अफगानिस्तान से पलायन करने को आतुर है पाकिस्तान को समझ में आ गया है कि  न केवल अमेरिका बल्कि भारत पर दबाव बढाया जा सकता है।

अमेरिका  की पलायन नीति से पाकिस्तान के सामरिक रणनीतिज्ञ खुश हैं और तालिबान को उकसा  रहे हैं कि  अमेरिका के साथ किसी तरह का समझौता नहीं करे क्योंकि अमेरिकी प्रशासन ने खुद ऐलान कर दिया है कि वह अगले राष्ट्रपति चुनाव के पहले अफगानिस्तान से अपनी फौज हटा लेगा। इसी पृष्ठभूमि में जब दिवालिया हो रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने गत 24 जून को वाशिंगटन  का दौरा किया तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के अपमानजनक  स्वागत के बावजूद उन्हें खुश करने में कामयाब हुए।

इस दौरे के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को सैन्य सहायता रोकने के अपनी पुरानी नीति को रद्द कर दिया और पाकिस्तान को सैनिक मदद बहाल करने का ऐलान किया। अमेरिका पाकिस्तानी वायुसेना के बेड़े में शामिल करीब 72 एफ-16 लड़ाकू विमानों की देखरेख के लिये करीब 15 करोड़ डालर की सहायता का पैकेज घोषित कर दिया। रोचक बात यह है कि अमेरिका पाकिस्तान के दुश्मन समझे जाने वाले भारत को भी पिछले एक दशक से हथियारों की सप्लाई करने लगा है औऱ इसके पीछे यही समझ भारत में बनी थी कि वह भारत के दुश्मन पाकिस्तान की सैन्य ताकत मजबूत करने वाली सहायता किसी भी हाल में नहीं देगा।

अमेरिका के इस फैसले से पाकिस्तान का मनोबल मजबूत हुआ है। उसे लगने लगा है कि अफगानिस्तान में तालिबान के बहाने फिर उसका राजनीतिक प्रभुत्व होगा और अफगानिस्तान उसके लिये सामरिक गहराई की भूमिका निभाएगा। अमेरिका इन चेतावनियों को नजरअंदाज कर रहा है कि तालिबान के शासन वाला अफगानिस्तान एक बार फिर तालिबान औऱ अल कायदा का गढ़ बन सकता है। उसे तो किसी भी हाल में अफगानिस्तान से निकल भागना है।

भारत के लिये अमेरिका और पाकिस्तान के तेजी से पलटते रिश्ते काफी चिंताजनक साबित होंगे। फिर वे ही दिन लौटने की शंका पैदा हो गई है जब अमेरिका कहता था कि पाकिस्तान को एफ-16 लड़ाकू विमानों की सप्लाई से भारत को चिंतित होने की जरुरत नहीं क्योकि पाकिस्तान इसका इस्तेमाल केवल आतंकवादियों के खिलाफ  हमले के लिये ही करेगा। सबको पता है कि गत 27 फरवरी को  बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान ने जब भारतीय इलाके में अपने लडाकू विमान भेजे तो उनमें एफ-16 विमान भी शामिल थे। तब अमेरिका ने इन सवालों पर चुप्पी साध ली थी।

अमेरिका की  इस दोहरी नीति का खामियाजा यह होगा कि भारत पर पाकिस्तान का सामरिक  दबाव बढ़ेगा और भारत के लिये अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान सीमा तक नई मुश्किलें पैदा होंगी।

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