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समर नीति: युद्धस्तर पर सैन्य तैयारी की जरूरत

संयुक्त युद्धाभ्यास

इस साल के रक्षा बजट ने सैन्य और सामरिक हलकों को फिर निराश किया है। भले ही सरकार और प्रभारी वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने कहा हो कि जब जुलाई में अंतरिम बजट पेश होगा तब रक्षा बजट में और बढ़ोतरी की जाएगी। उन्होंने आम आदमी को आंकड़ों से प्रभावित करने की कोशिश की है कि रक्षा के लिये अब तक का सबसे अधिक तीन लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है और जरूरत पड़ने पर इसमें और बढोतरी की जाएगी लेकिन जानकार समझ रहे हैं कि अंतरिम बजट में जब लोकलुभावन प्रस्ताव करने का धन मुहैया कराया जा सकता था तब देश की रक्षा के लिये अहम जरूरी सेनाओं के आधुनिकीकरण का कार्यक्रम क्यों टाला जा रहा है।





रोचक बात है कि पिछले साल देश का रक्षा बजट 2,95,000 करोड़ रुपये था यानी तीन लाख करोड़ से कुछ कम। इसमें इस साल केवल पांच हजार करोड़ रुपये की ही बढ़ोतरी कर रक्षा बजट का आंकड़ा तीन लाख करोड़ रुपये कर दिया गया। दो साल पहले का रक्षा बजट 2.74,000 करोड़ रुपये का था। देखने में तो यह बजट काफी बड़ा लगता है लेकिन इसका आधा से अधिक बजटीय प्रावधान तो तीनों सेनाओं के करीब साढ़े 13 लाख सैनिकों के वेतन और भत्तों पर ही खर्च हो जाएगा। बाकी पैसा सेनाऔं के मौजूदा शस्त्र भंडार के रखरखाव पर ही चला जाएगा तो नये हथियारों की खरीद के लिये धन कहां से आएगा।

आज देश के सामने भीषण सामरिक चुनौतियां हमारे पडोसी प्रतिद्वंद्वी देशों द्वारा पेश की जा रही हैं। हमारे पड़ोसी देश भारत को डराने के लिये नई आधुनिक किस्मों की बैलिस्टिक मिसाइलें ,लड़ाकू विमान, युद्धपोत, पनडुब्बियों आदि हासिल करते जा रहे हैं। दूसरी ओर भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों की संख्या निरंतर घटती जा रही है और रक्षा मंत्रालय के सामने जो मौजूदा योजनाएं हैं उनसे नहीं लगता कि अगले एक दशक तक ल़डाकू विमानों के स्क्वाड्रनों की संख्या मौजूदा 30 स्क्वाड्रनों से बढ़ पाएगी।

इसी तरह एक दशक के उहापोह के बाद सरकार ने नौसेना के लिये छह नई डीजल पनडुब्बियां खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी तो दी है लेकिन इन्हें वास्तविक तौर पर नौसेना में शामिल करने में कम से कम एक दशक का वक्त लगेगा। दूसरी ओर पाकिस्तान ने चीन से आठ नई पनडुब्बियां हासिल करने का आर्डर दिया हुआ है जब कि चीनी नौसेना के पास 60 से अधिक पनडुब्बियां है। भारतीय नौसेना के पास फिलहाल 15 पनडुब्बियां ही हैं। इनमें से कुछ अगले कुछ सालों में रिटायर होंगी औऱ कुछ नई शामिल होंगी। ये फ्रांस के सहयोग से भारत में बन रही स्कारपीन पऩडुब्बियां हैं।

इन सब हथियार मंचों को हासिल करने पर कई हजार करोड़ रुपये निवेश करने होते हैं। जो कि रक्षा बजट के मौजूदा प्रावधानों से पूरा नहीं हो सकता। वास्तव में पिछले दो दशकों के दौरान भारत की रक्षा तैयारी पूरी तरह नजरअंदाज की गई जिसका असर सेनाओं की घटी हुई रक्षात्मक और प्रहारक क्षमता पर साफ दिखाई पड़ने लगा है।

हमारे पड़ोसी देशों द्वारा भारत के सामरिक हितों और प्रादेशिक अखंडता को पेश की जा रही चुनौती का मुकाबला करना है तो देश की रक्षा तैयारी को युद्धस्तर पर तेज करना होगा। इसके लिये आपात वित्तीय प्रावधान करना होगा और यह नहीं सोचना होगा कि सभी सैनिक साज सामान को देश में ही बनाएंगे। मेड इन इंडिया का कार्यक्रम तो अच्छा लगता है लेकिन केवल इसी पर हम निर्भर रहे तो हमारी सैन्य तैयारी पर भारी प्रतिकूल असर पड़ेगा औऱ हमारे दुश्मन देश इस मौके का लाभ उठाने से नहीं चूकना चाहेंगे।

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