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समर नीति: तालिबान अब अछूता नहीं रहा

तालिबान
फाइल फोटो

मानवीय मूल्यों की धज्जियां उड़ाने वाला और खूंखार चेहरे वाला तालिबान इन दिनों कई ताकतवर देशों का लाडला बना हुआ है। इस तालिबान से अमेरिका जैसे देश बातचीत के लिये चिरौरी कर रहे हैं और तालिबान अपनी शर्त पर अमेरिका से बातचीत करने की बात करता है। इसी तालिबान से बात करने के लिये अब भारत सरकार का भी मन बदलने लगा है। इसका संकेत यहां भारत के थलसेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने रायसीना डायलॉग के दौरान दिया है। उन्होंने सुझाव दिया है कि भारत को तालिबान से बातचीत से दूर नहीं रहना चाहिये। तालिबान को शामिल करने वाली अंतरराषट्रीय बैठकों में भारत ने अबतक गैर आधिकारिक तौर पर भाग लिया है लेकिन आधिकारिक तौर पर तालिबान से बातचीत के लिये कोई प्रतिनिधि नहीं भेजा है। भारत की मजबूरी है कि यदि तालिबान फिर सत्ता में आया तो उसके साथ सम्बन्ध बनाना जरूरी होगा क्योंकि अफगानिस्तान में भारत के हजारों लोग विकास कार्यों में जुटे हैं और वहां भारत ने तीन अरब डॉलर से अधिक के निवेश किये हैं।





यह वही तालिबान है जिसने पिछली सदी में 90 के दशक में अपनी जनता को अपने शासन काल में घोर रुढिवादी समाज में तब्दील कर दिया था और जहां शरियत कानून के नाम पर देश को सैंकड़ो साल पीछे धकेल दिया गया था। आज वही तालिबान के लोग पाकिस्तान की शह पर अपनी बंदूक की ताकत पर काबुल की सत्ता पर फिर बैठने को बेताब हैं। इसी तालिबान को अमेरिकी सेना ने 2001 में काबुल छोड़कर भागने को मजबूर किया था और काबुल में जनतांत्रिक शासन की स्थापना कर वहां विकास और पुनर्निर्माण के काम चलाने में भारतीय विकास कार्यों को सुरक्षा प्रदान किया था।

अमेरिका ने वहां एक लाख से अधिक सैनिक तैनात किये थे औऱ तालिबान को पूरी तरह पस्त कर दिया था लेकिन अमेरिकी गलतियों की वजह से तालिबान आज फिर फन उठाने लगा है और बाकी दुनिया को डराने में कामयाब हो रहा है। अमेरिकी अधिकारी जब तालिबान से बात करने का तर्क ढूंढ़ने के लिये गुड तालिबान और बैड तालिबान की बात करते थे तब भारत कहता था कि कोई भी आतंकवादी गुड औऱ बैड नहीं होता वह बैड ही होता है। आज उसी तालिबान से बात करने के लिये अमेरिका जैसी ताकत तालिबानी नेताओं की चिरौरी कर रही हैं और इस तालिबान की प्रवर्तक पाकिस्तानी सेना फूले नहीं समा रही। आखिरकार तालिबान को उसी ने 90 के दशक में इसलिये खड़ा किया था कि अफगानिस्तान उसका सामरिक पिछवाड़ा बनेगा।

आज करीब दो दशक बाद पाकिस्तान की तालिबानी आतंकवाद समर्थक नीति कामयाब होती लग रही है। अब लगता है कि सभी देश यह मान कर चलने लगे हैं कि तालिबान जल्द ही सत्ता में लौटेगा और वहां से जनतांत्रिक सरकार की जमी जडें उखाड़ फेंकेगा। इस सम्भावित सच्चाई को देखते हुए अमेरिका फिर पाकिस्तान से बेहतर रिश्ते बहाल करने की बात करने लगा है और बाकी ताकतें इस आशंका को सच मान कर तालिबान से रिश्ता बहाल करने की रणनीति तैयार करने लगी हैं।

इसी के मद्देनजर भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल रावत ने कहा है कि यदि अफगानिस्तान से भारत के हित जुड़े हैं तो भारत को तालिबान के साथ विभिन्न देशों की चल रही बातचीत से दूर नहीं रहना चाहिये। अफगानिस्तान में लोगों को जनतांत्रिक माहौल में विकास का फल चखाने में भारत की कामयाबी की दुनिया भर में सराहना हुई है। भारत ने न केवल वहां स्कूल और अस्पताल चलाने में अपना योगदान दिया है बल्कि उसे विकास के पथ पर तेजी से आगे बढाने के लिये 220 किलोमीटर के राजमार्ग भी बना कर सौंपें हैं। भारत ने वहां सलमा बांध बनाया है , संसद का भवन बनवाया है, बिजली की ट्रांसमिशन लाइन बनवाई है जिससे आम अफगानी बिजली की आधुनिक दुनिया देखने लगे हैं। भारत की चिंता है कि तालिबान से कामकाजी रिश्ता बनाए रखने के लिये किस तरह रिश्तों के तार जोड़े जाएं ताकि भारत का निवेश बेकार नहीं जाए।

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