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समर नीति: सामरिक समीकरण फिर बदल सकते हैं

प्रधानमंत्री मोदी
प्रधानमंत्री मोदी

कुछ महीनों पहले तक ऐसा लग रहा था कि अमेरिकी अगुवाई वाला चीन विरोधी हिंद प्रशांत गठजोड़ जमीन पकड़ने लगा है लेकिन जिस तरह से अमेरिकी प्रशासन ने खुद अपने राष्ट्रीय सामरिक हितों की कीमत पर रूस और ईरान के खिलाफ दंडात्मक कदम उठाए हैं औऱ हिंद प्रशांत गठजोड़ के एक अग्रणी सदस्य भारत को प्रभावित करने वाला रूस विरोधी कैटसा कानून लागू किया है उससे हिंद प्रशांत गठजोड़ में दरार पड़ना औऱ चीन व रूस की अगुवाई वाले शांघाई सहयोग संगठन में मजबूती आना स्वाभाविक लगने लगा है। एक तरफ अमेरिका यह कहे कि एशिया में भारत को चीन के मुकाबले खड़ा करने में सहयोग देगा और दूसरी तरफ भारत की सामरिक ताकत को कमजोर करने वाला कदम उठाते हुए भारत को मजबूर करे कि रूस से अपना चिरस्थायी पारम्परिक सामरिक रक्षा रिश्ता तोड़ दे तो यह मुमकिन नहीं लगता।





हालांकि सिंगापुर में हुई चार देशों के हिन्द प्रशांत समूह की बैठक में भारत ने फिर भाग लिया, वहीं  भारत शांघाई सहयोग संगठन में भी अपनी प्रभावी भूमिका निभाने को तैयार लग रहा है। कहा जाता है कि शांघाई सहयोग संगठन अमेरिकी अगुवाई वाले सैन्य गुट नाटो के समकक्ष के तौर पर उभर सकता है। शांघाई सहयोग संगठन के सदस्य देश भारत, चीन और पाकिस्तान की सेनाएं साझा अभ्यास में भी भाग लेंगी लेकिन फिलहाल इसे नाटो के समकक्ष कहना जल्दबाजी होगा। शांघाई सहयोग संगठन के सदस्यों के बीच आपस में और क्षेत्रीय व अंतरराष्ट्रीय मसलों पर गहरे मतभेद हैं इसलिये एससीओ के सदस्य देश सांकेतिक तौर पर तो साथ दिख सकते हैं लेकिन वक्त आने पर वे एकजुटता दिखाएंगे इसमें शक है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने अति राष्ट्रवादी होने के चक्कर में अपने सगे सामरिक दोस्तों के साथ भी रिश्तों में तनाव पैदा कर दिया है और भारत जैसे नवसाझेदार देशों को भी अपने फैसलों से आर्थिक और सामरिक सम्बन्धों में दरार पैदा करने वाले कदम उठाए हैं। यदि यह कहा जाए कि मौजूदा विश्व माहौल में भारत अमेरिका या रूस में से किसके साथ रहना पसंद करेगा तो भारत का रुख रूस के पक्ष में ही झुका रहेगा। अमेरिकी कैटसा कानून रूस को इस तरह अपनी चपेट में ले लेगा कि रूस के साथ रिश्ता रखने वाले देशों को भी उसका खामियाजा भुगतना होगा। अमेरिका यह कहे कि रूस से एस- 400 एंटी मिसाइल प्रणाली नहीं खऱीदे क्योंकि वह अमेरिकी कैटसा कानून का उल्लंघन होगा तो भारत को यह मान्य नहीं होगा। भारत ने साफ कहा है कि वह केवल संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को ही मानता है।

स्वाभाविक है कि कैटसा और ईऱान विरोधी प्रतिबंधों की वजह से भारत और अमेरिका के बीच टकराव का माहौल विकसित हो सकता है जो अंततः भारत और अमेरिका के बीच सामरिक और आर्थिक रिश्तों में भी दरार ही पैदा करेगा। अमेरिका के हाल के प्रतिबंधात्मक कानूनों का फायदा चीन और रूस उठाएंगे और भारत का अपना हित भी चीन और रूस के साथ ही रहने में रहेगा। यही वजह है कि भारतीय रणनीतिकारों ने चीन और रूस के साथ एकजुटता दिखानी शुरू कर दी है। इसका परिणाम यह हो सकता है कि हिदं प्रशांत का चार देशों का उभरता गठजोड़ केवल कागजी शेर ही बन कर रह जाएगा। अपने राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर भारत को काफी सोच-समझ कर किसी खास समूह के देशों के साथ नजदीकी बनानी होगी। आखिरकार अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों में रिश्ते कभी स्थायी नहीं होते। स्थायी केवल राष्ट्रीय हित होते हैं।

 

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