vishesh

समर नीति: चाबाहार के सामरिक फायदे  

हसन-रूहानी

किसी जमाने में ईरान का आज का चाबाहार बंदरगाह तीस के नाम से जाना जाता था और वहां तक भारत की समुद्री सीमाएं छूती थीं। दसवीं सदी के फारसी इतिहासकार अल बिरूनी ने अपनी किताब में लिखा है कि तीस ईरान का पूर्वी समुद्री तट माना जाता था। पाकिस्तान के गवादार बंदरगाह से महज 85 किलोमीटर दूर तीस समुद्र तट पर चाबाहार शहर बसा है जिसके नाम से आज का आधुनिक चाबाहार बंदरगाह जाना जाता है। इसी चाबाहार पर आधुनिक बंदरगाह बनाने की परिकल्पना कई दशकों से रही है लेकिन पिछले दशक के शुरू में ईरान और भारत की सरकारों ने इसके विकास पर सोचना शुरू किया। कई वजहों से भारत ने इसका काम देर से हाथ में लिया लेकिन ईऱान ने इसका पहला चरण पूरा कर इस बंदरगाह को माल परिवहन के लायक बना दिया है जहां से भारत ने अफगानिस्तान के लिये एक लाख टन गेंहूं की पहली खेप रवाना की। इसी बंदरगाह पर भारत भी दो बर्थ बना रहा है जो अगले दो-तीन वर्षों में जब पूरा हो जाएगा तब चाबाहार बंदरगाह की क्षमता काफी बढ़ जाएगी।





भारत ने चाबाहार पर दो बर्थ बनाने की पेशकश इसलिये की थी कि इस रास्ते न केवल अफगानिस्तान बलिक वहां से मध्य एशिया और यूरोप के देशों तक माल परिवहन का समुद्री, जमीनी और रेल सम्पर्क स्थापित कर इन देशों के साथ भारत के आयात-निर्यात को सुगम और सस्ता बनाया जा सकता था। एक दूसरी वजह यह भी थी कि पाकिस्तान अपनी जमीन से होकर भारत को अफगानिस्तान तक माल आयात-निर्यात की इजाजत नहीं देता है।

चाबाहार से आगे ईरान की मदद से ही इंटरनैशनल नार्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कोरिडोर बनाने पर भी काम चल रहा है जिसके पूरा हो जाने के बाद भारत के मध्य एशियाई देशों, रूस और वहां से आगे यूरोपीय देशों के बीच न केवल आर्थिक रिश्ते मजबूत हो सकेंगे बल्कि इस इलाके के देशों के साथ भारत के सामरिक रिश्ते भी गहरे हो सकेंगे। यह कारिडोर 72 सौ किलोमीटर लम्बा होगा, जो भारत, ईरान, अफगानिस्तान, अजरबैजान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप को जमीन, रेल और समुद्री मार्ग से जोड़ेगा।

जमीन, रेल और समुद्री रास्ते से देशों को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग पर चीन भी काम कर रहा है लेकिन वह पूरी तरह से चीन के कब्जे में रहेगा जब कि भारत दूसरे देशों को साथ लेकर इसी तरह के महत्वाकांक्षी परिवहन प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है जिसे लेकर किसी तरह का विवाद भागीदार देशों के बीच पैदा नहीं हुआ है। दूसरी ओर चीन ने पिछले जून महीने  मे पेइचिंग में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाकर भारी तमाशा किया और इस पर अंतरराष्ट्रीय सामरिक हलकों में काफी चिंता जाहिर की जा रही है। चीन अपने इस वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट के जरिये पूरी पृथ्वी पर अपने नियंत्रण वाली सड़कों का जाल बिछाना चाहता है ताकि उसकी अर्थव्यवस्था चमक सके और छोटे देशों को अपने कर्जजाल में फंसा कर उस पर अपना राजनीतिक प्रभुत्व जमा सके।

व्यापार मार्गों के जरिये सामरिक प्रभुत्व स्थापित करने की यह होड़ आने वाले सालों में और जोर पकड़ेगी। भारत यह प्रयास छोटे बड़े देशों को साथ लेकर समान भागीदारी के आधार पर कर रहा है लेकिन जिस तरह चीन अपने धन बल की ताकत पर इस तरह के राजमार्ग बनाने की महत्वाकांक्षी योजनाओं को जिस फुर्ती के साथ लागू कर लेता है भारत के रणनीतिकारों को इससे सबक लेना होगा।

Comments

Most Popular

To Top