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समर नीति: छह नई पनडुब्बी, लेकिन कब तक ?

इंडियन सबमरीन
फाइल फोटो

साल 2007 में जिन छह डीजल पऩडुब्बियों को प्रोजेक्ट-75-आई के तहत  हासिल करने की मंजूरी दी गई थी उनके बारे में 12  साल बाद एक ठोस कदम उठाया जा सका है लेकिन इन पनडुब्बियों के बनने और उन्हें भारतीय नौसेना को सौंपने  में कितने साल लग जाएंगे कहना मुश्किल है। वास्तव में करगिल युद्ध के बाद 1999 में ही सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति ने देश में पनडुब्बी निर्माण की दो लाइनों को स्थापित करने की सिफारिश की थी। एक थी प्रोजेक्ट-75 और दूसरी प्रोजेक्ट-75-आई। इन दोनों के तहत 6-6 पनडुब्बियों के देश में निर्माण करने का फैसला लिया गया था। प्रोजेक्ट-75 के तहत स्कॉरपीन वर्ग की छह पनडुब्बियों को फ्रांसीसी डीसीएन कम्पनी के सहयोग से मुम्बई स्थित मझगांव गोदी पर बनाने का काम 2006 में शुरू करने का ठेका दे दिया गया था जिसके तहत अब तक दो स्कॉरपीन पनडुब्बियां सौंपी जा चुकी हं और बाकी चार निर्माण की विभिन्न अवस्था में हैं। इसलिये अब अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रोजेक्ट-75 आई के के तहत पहली डीजल पनडुब्बी कितने साल बाद नौसेना को सौंपे जा सकेगी। पहली लाइन के तहत पहली पनडुब्बी को सौंपने में करीब 12 साल लगे तो दूसरी लाइन के तहत पहली पनडुब्बी सौंपने में कम से कम एक दशक तो लग ही जाएंगे।





 भारतीय रक्षा कर्णधारों ने 1999 में तय किया था कि  सन 2030 तक भारतीय नौसेना के पास 24  पनडुब्बियां होनी चाहिये। लेकिन  अगला दशक पूरा होने में 11 साल बचे हैं और भारतीय नौसेना के पास फिलहाल 15 डीजल और दो परमाणु पनडुब्बियां ही है। भारतीय नौसेना के पास रूसी  किलो वर्ग  की जो नौ पनडुब्बियां हैं वे  दो दशक से अधिक  पुरानी हो चुकी हैं और जर्मन टाइप-209 वर्ग की जो चार पनडुब्बियां  आई थीं वे भी दो दशक से अधिक पूरानी हो चुकी हैं। इसलिये अगले दशक के अंत तक इन दोनों वर्ग की पनडुब्बियों को रिटायर करना होगा। इसलिए साफ है कि तब तक भारतीय नौसेना के पास केवल स्कारपीन वर्ग की छह पनडुब्बियां ही बचेंगी और इनके अलावा रूस से लीज पर ली गई एक परमाणु पनडुब्बी को रूस को लौटाना होगा और भारतीय नौसेना की एकमात्र अरिहंत परमाणु पनडुब्बी के अलावा दो और परमाणु पनडुब्बी  2030 तक भारतीय नौसेना में शामिल हो सकेंगी। इसलिये साफ है कि अगले दशक के अंत तक भारतीय नौसेना के पास करीब एक दर्जन पनडुब्बियां  ही बचेंगी। जिन छह  नई डीजल पनडुब्बियों को  प्रोजेक्ट-75 आई के तहत भारत में ही निर्णाण किया जाना है उनके बारे में यही कहा जा सकता है कि ठेके पर हस्ताक्षर के बाद कम से कम एक दशक का वक्त उनके स्वदेशी निर्णाण में तो लगेगा ही। इसलिये साफ है कि अगले दशक के अंत तक ही इनका उत्पादन शुरू हो सकेगा।

सवाल यह उठता है कि सन् 2030 तक जब भारतीय नौसेना की हिंद महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक के इलाके में निरंतर चौकसी का स्तर काफी बढ़ाने की जरूरत है भारतीय नौसेना के पास तब तक आज से भी कम संख्या में पनडुब्बियां रहेंगी। भारतीय नौसेना को अपने विशाल समुद्री इलाके में पनडुब्बियों की क्षमता निरंतर बढाते रहने की जरूरत है। क्योंकि तब तक हिंद महासागर का इलाका बड़ी ताकतों का एक बड़ा अखाड़ा बनने की पूरी सम्भावना है।

साल 1999 में भारतीय नौसेना के पास जिन 24 पनडुब्बियों को हासिल करने की योजना थी उसे पूरा करने में हम कोसों दूर हैं। चूंकि फिलहाल नई पनडुब्बियों को हासिल करने की कोई और योजना नहीं है इसलिये हम कह सकते हैं कि भारतीय नौसेना हिंद महासागर में टोह लेने की अपनी वांछित क्षमता से कहीं पीछे रहेगी।

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